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ISSN 2292-9754

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11.04.2017


एक संवेदनात्मक पड़ताल

सूरज के आते ही
दुबक गया है अँधेरा
एक कोने में

आसमान में
फिर से पसर रहा है सिंदूरी रंग
चिड़ियों के कलरव से
गुंजयमान है वातायन

चाँद की चाँदनी में
थिरक रही हैं
गेहूँ की बालियाँ
ताज़ी बयार संग
महिलायें
ऊसर रही हैं धान

रेलगाड़ी की छुक-छुक के साथ
छूटती जा रही है पीछे
चाँदनी
पीछे जा रहे हैं
पेड़-पौधे, नदी और तालाब

समंदर की कुछ लहरें
खेल रही हैं अठखेलियाँ
तो कुछ
उतावलेपन में
लाँघ जाना चाहती हैं
अपनी सीमा

अनंतकाल से
राग बागेश्वरी और भीम पलासी
के आरोह-अवरोह में
झूम रहे हैं जड़-चेतन

चंचल है नदी की धारा
अनवरत बहना है
उसका स्वभाव
पर अचानक!
अनगढ़ ऊर्जा की सनक में
हथेली पर
सरसों उगाने की
ज़िद कर बैठी है वह

क्या
जीवन के छाया-लोक में
मिट्टी में मिट्टी बनकर
पानी में पानी बनकर
हवा का बयार बनकर
नदी की तरह शोख़ बनकर
या फिर सरल-सहज बनकर
नहीं रह सकता मैं

क्यों
उत्तुंग शिखर पर
आरूढ़ होने की कामना में
रचनात्मक मौलिकताओं से
दूर जा रहा हूँ
और
क्षुद्रताओं-लिप्साओं,
पूर्वाग्रहों-महिमामंडनों
के सहमेल के साथ
एक गहरी ऊब, जड़ता,
निरर्थकता से भरा जीवन
जीने को अभिशप्त हूँ


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