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ISSN 2292-9754

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09.07.2014


इस ज़मीं के बागवाँ

इस ज़मीं के बागवाँ भी, क्या करें?
बिन बुलाये ख़ामख़ां भी, क्या करें?

अब ये जूता और थप्पड़ ही सही!
इस वतन के नौजवां भी, क्या करें?

भौंकने पर इस कदर नाराज़ हो
ये बेचारे, बेजुबां भी, क्या करें?

हाले धरती, देख कर ही रो पड़े,
दूर से ये आस्मां भी, क्या करें?

लगता इस घर में कोई बूढा नहीं
अब हमारे मेज़बाँ भी, क्या करें?

झाँकने ही झाँकने, में फट गए,
ये हमारे गिरेबां भी, क्या करें?
तालियाँ, वे माँग कर बजवा रहे
ये ग़ज़ल के कद्रदां भी, क्या करें?


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