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ISSN 2292-9754

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11.30.2014


गोगाजी लोकगाथा में नारी जीवन की अभिव्यक्ति
सरिता विश्नोई
जे. आर. एफ. शोधछात्रा
हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ

किसी समाज की धुरी नारी और पुरुष पर टिकी होती है। नारी के बिना पुरुष तो पुरुष के बिना नारी अधूरी व अपूर्ण है। सृष्टि के विकास में दोनों का समान महत्त्व है, परन्तु नारी की समानता भारतीय जनमानस ने कभी स्वीकार नहीं की। यद्यपि वैदिक युग में नारी की स्थिति ज़रूर अच्छी कही जा सकती है। इसीलिए कहा गया है ‘यत्र नार्यस्तु पूजन्ते रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। ऐसा नहीं हैं कि तद्युगीन समाज में नारी पर कोई वर्जनाएँ नहीं थी, स्वयं नारी की पूजा करने की बात कहने वाले मनु कहते हैं स्त्री कभी स्वतन्त्र नहीं रह सकती, बचपन में उसे पिता के आधीन युवावस्था में पति के आधीन और वृद्धावस्था में पुत्रों के आधीन रहना चाहिए। परन्तु फिर भी नारी को अनेक स्वतन्त्रताएँ भी प्राप्त थी। वह शिक्षा प्राप्त कर सकती थी, स्वेच्छा से पति का वरण सकती थी, आर्थिक क्षेत्र में परिवार का सहयोग करती थी तथा धार्मिक क्षेत्र में भी पूर्णतः पुरुष की सहभागी थी। पत्नी के बिना पति का कोई भी धार्मिक कृत्य पूर्ण नहीं समझा जाता था। इस सम्बन्ध में डॉ. मीनाक्षी व्यास का कथन है कि "भारतीय संस्कृति में उसे सम्मान के सर्वोच्च शिखर पर इतना ऊँचा बढ़ाया गया कि अर्द्धनारीश्वर ने पार्वती को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। भारतीय संस्कृति में उसे लक्ष्मी, अन्नपूर्णा आदि विभूषणों से विभूषित किया गया तथा वह पूज्या और आराध्या मानी गई। कदाचित इन्हीं कारणों से उसे श्री शक्ति एवं चित्ति कहा गया पर सम्मान का स्वर्णिम काल मुख्य रूप से वैदिक काल ही कहा जा सकता है।"1 वैदिक युग के पश्चात् उतरोत्तर नारी की महत्ता कम होती गई और उसकी स्थिति में गिरावट आती गई। एक समय ऐसा भी आया जब नारी को मात्र उपभोग की वस्तु माना गया। उसे घर की चारदीवारी में कैद कर लिया गया। उसके सारे अधिकार छीन लिए गये, परन्तु कर्त्तव्यों की कोई सीमा नहीं रही। उसके खान-पान, शिक्षा-दीक्षा, इच्छा-अनिच्छा का कोई महत्त्व नहीं था। जिसके साथ उसे विवाह बंधन में बाँध दिया जाता था, वही उसका आजन्म संरक्षक था, वह चाहे तो उसने प्रति सहिष्णु भी हो सकता था और क्रूरता की भी कोई सीमा नहीं थी। "नारी प्रकृति का सुन्दरतम उपहार है। नारी सृष्टि का आधार होने के कारण उसे विधाता की अद्वितीय रचना कहा जाता है। नारी समाज, संस्कृति और साहित्य का महत्त्वपूर्ण अंग है। मानवीय गुणों की दृष्टि से विचार किया जाये तो नारी अधिक मानवीय है। इन सारे गुणों के होते हुए भी नारी को समाज और संस्कृति में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह अधिकारिणी है, पुरुष प्रधान व्यवस्था ने नारी को सदैव अधिकारों से वंचित रखा और उसे मात्र अपने भोग की वस्तु बनाने का प्रयत्न किया।"2

राजस्थानी समाज में नारी का स्थान महत्त्वपूर्ण है। नारी को यहाँ की संस्कृति में माता, पत्नी, बहिन, पुत्री, बहू आदि अनेक रूपों में यथा सम्मान व पूज्य स्थान प्राप्त है। नारी को यहाँ पुरुष की सहचरी माना गया है। वह परिवार का आधार होती है साथ ही राजस्थानी लोकसंस्कृति की वाहक भी मानी गई है। वह अपने त्याग से परिवार व समाज की धूरी बनती है। राजस्थान के लोकजीवन में प्रचलित गोगाजी लोकगाथा में भी नारी की स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। यहाँ नारी को समाज में उचित स्थान प्राप्त हैं साथ ही गाथा में नारी जीवन की समस्याओं पर प्रकाश पड़ता है। नारी की पूर्णता उसकी सन्तानोत्पति के बाद ही मानी जाती है। उसके अभाव में नारी का जीवन की विवशत, पत्नी रूप में नारी के उत्तरदायित्व, माता व पत्नी रूप में उसकी मनःस्थिति स्थिति को गाथा में भलीभांति दिखाया है। गोगाजी लोकगाथा में नारी मातृत्व की अभिव्यंजना करती है क्योंकि नारी का माता रूप सर्वाधिक गरिमामय और महिमामय है। इस रूप में नारी के त्याग तपस्या, उत्सर्ग, वात्सल्य, धैर्य और सहनशीलता की कोई सीमा नहीं। अपनी सन्तति के लिए नारी एक ओर असहृय कष्टों को सहन करती है तो दूसरी ओर उसकी किलकारियों, बाल-सुलभ क्रीड़ाओं तथा उसके जीवन की सफलताओं से अप्रतिम आनन्दानुभूति भी अनुभव करती है। संतान के अभाव में उसका नारीत्व अपूर्ण रहता है। सन्तान के कारण ही वह परिवार में आदर पाती है। सन्तान प्राप्ति के लिए नारी हर समय प्रयास करती है। अनेक देवी-देवताओं, साधु-संन्यासियों आदि की शरण में जाती है। गोगाजी लोकगाथा में तत्कालीन समाज में नारी जीवन के इस पक्ष का मार्मिक वर्णन मिलता है। गाथा में बाछल पुत्र प्राप्ति के लिए हर संभव प्रयत्न करती है। किन्तु उसकी पुत्र अभाव में सूनी गोद नहीं भरी। गाथा में बाछल के मुख से नारी की इसी पीड़ा का उल्लेख मिलता है। नारी की इस संवेदनात्मक व समाजिक स्थिति पर पूरा प्रकाश पड़ता है। झंवर और बाछल सद्गृहस्थ है, किन्तु उनके कोई सन्तान नहीं है। सन्तान प्राप्ति के लिए अनेक देवी-देवताओं, पीरों-साधु-महात्माओं का पूजन किया, अनेक तीर्थ स्थानों पर गये किन्तु सन्तान की प्राप्ति नहीं हुई। भाई-बन्धुओं और कुटुम्ब उन्हें बांझ समझकर उन्हें अपने बच्चों से दूर रखते थे। उत्सव समारोह में उन्हें कभी आगे आने के लिए नहीं कहा जाता था। पुत्रवती स्त्रियाँ प्रातःकाल उसे देखकर मुँह फेर लेती थी। ऐसी स्थिति में बाछल अपने पति झंवर के चरणों में बैठ की फूट-फूट कर रोकर अपने दुःख को अभिव्यक्ति देती थी।

तत्कालीन समाज में सती नारी का समाज में उचित स्थान प्राप्त था। एक बार जब उनके नगर ददेरवा में साधु कण्हपा घूमते घूमते आये। वे सतियों का पता पूछते-पूछते सती बाछल के दरवाजे पर आये। बाछल चावल मूँगा की भिक्षा लेकर साधु के सामने उपस्थित होती है। साधू अपना भिक्षा पात्र हटा लेता हैं और कहने लगता है कि देवी! चवल मूँगों की आवश्यकता तो गुहस्थियों को होती है। मुझे तो बालक की जूठन भिक्षा के रूप में दो। यथा- "चावळ मूँगाँ री भिख्या लाई/ लेवो रावळिया जोगी/ चावल मूँगाँ री भिख्या लेसी घरबारी/ गुरु मेरे फरमावै/ बालै रा जूठा टुकड़ा घालो/ जोगी अलख जगावै।"3 यह सुनकर बाछल फूट फूटकर रोने लगी क्योंकि उसकी कोख अनेकानेक मनौतियों के बाद भी सूनी थी। जोगी को बालक की जूठन कहाँ से लाकर दे। सिसकियाँ भरते हुए कहती हैं कि हे जोगी! बालक का नाम मत लो। बालक तो भाग्यशालियों के यहाँ जन्मते हैं। गाथा में वात्सल्य के अभाव में नारी हृदय की पीड़ा में इन शब्दों में अभिव्यक्ति पाती हैं। यथा- "बालै रो नांव मत ले रै रावळिया जोगी/ बालै रो नांव मत लेवो/ लियो कँवर रो नांव जोगी/ बाछल झर बर रोवै/ छाती भरीजै हियो ऊमटै/मेरा रावळिया जोगी/ बालै रो नांव मत लेवो।"4 नारी माता के रूप में सदैव अपनी सन्तति के सुख-दुःख के लिए चिन्तित दिखाई देती है। वह असीम वात्सल्य व ममत्व से युक्त मातृत्व के लिए लालायित रहती है। तत्कालीन समय में पुत्र प्राप्ति के लिए ईश्वर की उपासना, साधु-सन्तों की सेवा, पीर-पैगम्बर की मनौती पर लोकमानस का विश्वास था। इस सन्दर्भं में साधु बाछल से पूछते हैं कि क्या तुमने साधु-सन्तों, पीर-पैगम्बरों की आराधना नहीं की- ‘साच बता दै मैया बाछल तैं कोण जोगी सेया’ । इस पर बाछल अपनी तपस्या का वृतान्त इन शब्दों में सुनाती हैं। यथा- "सेया मैं लकड़नाथ/ मेरी लकड़ होगी काया/ सेवा में फळ कोनी पाया/ सेया मैं दूधधारी/ मेरी दूध होगी काया/ सेवा में फळ कोनी पाया रावळिया जोगी/ सेया में जलंधरना मैं/ मेरी जळ तो होगी काया/ सेया में धूणी नाथ/ मेरी धूण होगी काया/ सेया में मछंदर नाथ/ मेरी मछर होगी काया/ सेवा में फळ कोनी पाया रावळिया जोगी/ सेवा में फळ कोनी।"5 साधू कान्हया ने उसे गोरखनाथ की सेवा करने का निर्देश दिया- ‘म्हें तनैं कैवां अम्मा बाछल/ गुरु गोरख री सेवा लै।"6 बाछल तन-मन से गुरु गोरख नाथ की सेवा में लग जाती है। वरदान स्वरूप उन्हें गोगा पुत्र रूप में प्राप्त होते हैं। यथा- "सेयो गुरु गोरख नाथ मैं/ गोगों एक फळ पायो।"7

राजस्थानी समाज में नारी अपने परिवार के अधीन रहती है। पुत्र प्राप्ति के लिए जब बाछल साधु-सन्तों की सेवा करने लगती है तो वह भी उसके परिवारजनों को सहन नहीं होता। उसकी ननदें इसकी शिकायत अपने पिता से कर देती है। उनके परिणाम के विचार में बाछल जोगियों की सेवा में रहकर चौहान वंश की प्रतिष्ठा गिरा रही थी। अतएव एक दिन ननदों ने दादा ऊमर से कहा कि आपकी पुत्रवधू कलंकिनी है। यथा- "भरी कचेड़ी दादै ऊमर की बैठी/ कँवर छबीली चुगली खायी/ तेरी तो राणी राजा! स्याम्यां नै सेवै/ सांझ पड़ी घर आव/ आपणै चौहान में सरम घणैरी/ बाछल सरम गमावै।"8 यह सुनकर बाछल के ससुर राजा ऊमर और पति झंवर क्रोधित हो उठते हैं। उन्होंने निश्चय किया कि ऐसी पुत्रवधू को मेरे घर में स्थान नहीं दिया जा सकता। किसी भी बहाने वे बाछल को पीहर भेजना चाहते थे। उन्होंने बाछल से कहा कि उसे पीहर जाना है, उसके भाइयों का पत्र आया है। यथा- "दादो उमर तो इसड़ो कोप्यो/ राणी नैं पिवरियै पुगादै/ नीं तो देसूँटो दिरादै/ पिता तो झेवर इसड़ो कोप्यो/ राणी ने हुकम सुणावै/ तेरे पीवर से राणी कागद आयो/ परवानो आयो/ थे थाँरे पीवर उठ जावो।"9 इस प्रकार एकाएक पीहर भेजे जाने का कारण जब बाछल को पता चलता है तो उसे दुख होता है। बाछल अपने ससुराल वालों के इस षडयंत्र को समझती है। किन्तु तत्कालीन समाज में नारी का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वो अपने परिवार पर निर्भर है। बाछल को जब पुत्र प्राप्ति की आशा होती है, उसी दौरान उसके ससुराल वाले छल द्वारा उसे निष्कासन की योजना बनाने लगते हैं। वह कहती है कि, ‘नहीं तो पीवर से कागद आया, ना आयो परवानो। इस पर उसका पति झेवर उसे कहता हैं कि, ‘तेरे भैया का राणी ब्याह मँड्यो छै, थे थांरै पीवर जावो।"10

यदि हम भारतीय नारी के पत्नी रूप पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय नारी को संस्कार रूप में ही यह शिक्षा मिलती है कि पति उसका सर्वेसर्वा है उसका परमेश्वर है और उसे सदैव एक पतिव्रता ही रहना है। यदि हम राजस्थान की नारी के पत्नी रूप पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट होता है कि यहाँ की नारी पति की अनन्य एकनिष्ठा है। पति के विरुद्ध वह सोच भी नहीं सकती, जिस प्रकार उसे बच्चों की चिन्ता सताती है उसी प्रकार वह पति के सुख के लिए भी चिन्तित दिखाई देती है। तत्कालीन समय में विवाह के बाद नारी का घर उसका ससुराल ही समझा जाता था। वह अपने नारी सम्मान को बनाए रखने के लिए अपने ससुराल वालों से दासी रूप में रहने को भी तैयार रहती हैं किन्तु उसके ससुराल उसकी इस विनती को भी स्वीकार नहीं करते है। इसीलिए बाछल कहती हैं- "नहीं तो भैया रो राजा ब्हाया मँड्यो छै/ नां कोई आयो समाचार/ तेरे महलां में राजा दासी तो रैसूँ/ लीलै री लीद उठासूँ।"11 उसने अपने श्वसुर को निवेदन किया कि मेरा पाँव भारी है, ऐसी अवस्था में इतना लम्बा मार्ग पार करना कैसे संभव हो सकेगा। उसके विरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता और उसे जाने पर विवश किया जाता है। उसे दासी बनकर भी नहीं रहने दिया जाता है। राजा झंवर रानी से कहते हैं। यथा- "दासी रैवण नैं राणी और घनैरी/ थे थाँरै पीवर उठ जावो।"12 ऐसी स्थिति में बाछल को वापिस पीहर भेजा जाना उसके जीवन में कष्टों से भर देता है। फिर भी वह कुछ नहीं कर पाती है। वह ससुराल वालों के कहे अनुसार अपने पीहर जाने के लिए मजबूर होती है। अबला बाछल अपने असह्य स्थिति को इन शब्दों में अभिव्यक्ति देती हैं। यथा- "झरबर रोवै अमाँ बाछल रे/ मेरे बाली वारस कोनी/ कोनी माय’र बाप रे/ कोनी कुटम कबीलो।"13

गर्भस्थ शिशु गोगा अपनी माँ की पीड़ा को समझ रहे थे। उन्होंने अपनी माता बाछल से कहता है कि माँ! तुम क्यों रोती हो? तुम्हारा पीहर जाना व्यर्थ है। यद्यपि मेरे दादा ने तुम्हें देश निकाला दे दिया है, किन्तु मैं अपने ननियाल में जन्म नहीं लूँगा। अब तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। सारी परिस्थितियाँ ठीक हो जायेंगी। जन्म लेकर मैं पीर के रूप में प्रसिद्ध पाऊँगा। यथा- "नानेरै मत जावो मेरी बाछळ माता/ नाहो नांव कढावै/ पाछी ददेरवौ नैं चलो मेरी बाछळ माता/ प्रिथवी पीर कैवाऊँ।"14 सती बाछल का रथ जब पुनः राजा ऊमर के द्वार पर आ जाता है तो राजा अब भी पुनः उसे उसके पीहर भेजना चाहते हैं किन्तु रथ सती बाछल के कारण व गोगा के चमत्कार के कारण उनसे हिल नहीं पाता है। यथा- "इतरी कैंता माता रथड़ो मोड्यो/ रथड़ो पोळयां आयो इण रथडै़ रै हाथी जोड़ाया/ घोड़ा जोड़ाया/ रथड़ो हलणा न पावै/ इण रथड़ै रै दादो ऊमर लाग्यो/ पिता झेवर लाग्यो/ सारो कुटम लाग्यो/ रथड़ो ड्योढ़यां छायो।"15 यह देखकर सब स्तब्ध हो जाते हैं। रानी बाछल को पुनः ससम्मान राजमहल में पहुँचाया जाता है – "आमा तो सामा पड़दा तणाया/ राणौ नैं महल पुगावो।"16 पुत्र प्राप्ति के बाद ही नारी को ससुराल में उचित सम्मान प्राप्त होता है।

गोगाजी लोकगाथा में तत्कालीन समय में नारी की समाज में स्थिति पर पूरा प्रकाश पड़ता है। यहाँ नारी सिर्फ अबला रूप में ही चित्रित नहीं हैं बल्कि अपने प्रति हो रहे अत्याचार के प्रति विद्राह करने का भी साहस रखती है। गोगाजी और उसके भाइयों अरजन-सरजन के मध्य वैर बढ़ता है तो वे अपनी शत्रुता केलमदे का अपमान करके करते है। केलमदे अरजन-सरजन को कहती भी हैं, "थे तो लागो देवर जेठलजी/ मतीनां लगाजो म्हांरै हाथ/ हाथ लगानाँ पाप लागसी जी/ छतरी धरम हट जाय।"17 स्त्री का अपमान क्षत्रिय धर्म के विरूद्ध है फिर भी अरजन-सरजन अपने अपमान का बदला गोगाजी की पत्नी केलमदे का अपमान करके लेते है। यथा- "अरजन तो लूँटया कँठी काँठला/सरजन तो झपटयो दिखणी चीर।"18 इस पर केलमदे चुपचाप अपना अपमान नहीं सहती। वह अपने को अबला स्त्री न मानकर एक क्षत्राणी मानती है, अतः अरजन-सरजन को चुनौति देते हुए कहती हैं कि, "खाली तो हाथाँ में खड़ी ए जोडाँ/ कोनी हाथ में हथियार/ खांडो तो दे दो थाँरै हाथ रो जी/ फिर देखो तिरिया रो हाथ।"19 इतने पर भी वह चुप नहीं बैठती है। वह अपनी सास को अपने अपमान की बात बताने का साहस भी करती हैं। यथा- "देखो सासूजी थारा भाणजा जी/ फाड़यो है दिखणी रो चीर।"20 किन्तु जब उसकी सास अपनी बहू केलमदे को ही इस बात का दोषी मानते हुए से कहती हैं कि, "मैं तन्है बहुवड़ बरजियो जी/ आयी तूँ बैर जगाय।"21 इस पर केलमदे अपनी सास को यह तक कहने का साहस रखती हैं कि, "तैं तो जाये अे सासू अकेली जी/ जोड़ा है भाई दोय/ का तो रह जाती सासू बाँझड़ी अे सासु/ का जणती दोय च्यार/ दोय तो भाई रण में जूझता अे सासू दोय तो भाई रण में जूझता अे सासू/ दोय तो करता घर राज।" 22

बाछल ने अपने पुत्र गोगा को अनेक मन्नतों के पश्चात् प्राप्त किया है। उसी पुत्र की जब मृत्यु का समाचार वह सुनती है तो उसका हृदय के दुःख को शब्दों में व्यक्त करना असम्भव हो जाता है। उसे अपनी पूर्व स्मृति और भी पीड़ित करती है। उसे अपने पुत्र को कटु वाक्य कहने का दुःख भी होता है। उसकी आन्तरिक वेदना अपने पुत्र के चिह्नों को देख कर उसके आँसू नहीं रुकते है। यथा- "देख सैनाणी ए अम्मा झरबर रोवै/ कुरजाँ ज्यूँ कुरळाय/ सासु रोवै बड़ा धीरज बँधावै/ रोयगुमावै चन्दा नैण/ जे रोयाँ सूँ सासू जाहर आवै/ जो रोय भरूँ ए तळाव।"23 गाथा में गोगाजी की नववधू की भावनाओं का भी वर्णन मिलता है। गोगाजी की नववधू अनेक उमंग के साथ अपने ससुरल आयी। उसकी हाथ में अभी मेहंदी का रंग नहीं छूटा था। शरीर से अभी तक उबटन की सुगंध भी नहीं गई। किन्तु विवाह के कुछ समय बाद ही गोगाजी के वीरगति प्राप्त करने पर वह अपने हृदय की पीड़ा को इन शब्दों में अभिव्यक्त करता है- "बारह बरस की मनै ब्याह कर लायो/ बालपनै में करग्यो रांड/ हाथां की मेहंदी सासू हाथ में रैगी/ आवै उबटणै री बास।"24 चन्द्रदान चारण गोगाजी लोकगाथा में चित्रित नारी भावों के विषय में लिखते हैं कि, "कहीं नारी की विवशता के आँसू हैं, कहीं माता का पुत्र के लिए विलाप है, कहीं पत्नी का पति के लिए रोना है।"25

निष्कर्षतः गोगाजी लोकगाथा में नारी जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश पड़ता है। नारी अपने परिवार और समाज में रहकर किस प्रकार अपने दुःख को सहती हुई परिवार में रहकर अपने सुखों का त्याग करती है। इसका जीवन्त उदाहरण गोगाजी लोकगाथा है। एक ओर बाछल के रूप माता के हृदय को अभिव्यक्ति मिलती है तो दूसरी ओर वहीं पत्नी रूप में नारी हृदय के वियोग और पीड़ा भी अभिव्यक्ति पाती है। समाज व परिवार में उसकी विवशता और साहस दोनों का चित्रण गाथा में मिलता है। यहाँ नारी सिर्फ अबला रूप में ही चित्रित नहीं है। गोगाजी की पत्नी अपने अपमान का विरोध करते हुए दिखती हैं तो गोगाजी की माता बाछल मन्नौतों से प्राप्त अपने पुत्र को निष्कासित करने का साहस भी दिखाती है।

सन्दर्भ:

1. नारी चेतना और सामाजिक विधान – डॉ. मीनाक्षी व्यास, पृ. 7
2. साठोत्तरी हिन्दी लेखिकाओं की कहानियों में नारी - डॉ. सौ मंगल कप्पीकेरे, भूमिका, पृ.8
3. गोगाजी चैहान री राजस्थानी लोकगाथा, चन्द्रदान चारण, पृ. 40-41
4. वहीं, पृ. 41
5. वहीं, पृ. 41-42
6. वहीं, पृ. 42
7. वहीं, पृ. 42
8. वहीं, पृ. 43
9. वहीं, पृ. 43
10. वहीं, पृ. 43
11. वहीं, पृ. 44
12. वहीं, पृ. 44
13. वहीं, पृ. 44
14. वहीं, पृ. 45
15. वहीं, पृ. 45-46
16. वहीं, पृ. 46
17. वहीं, पृ. 68
18. वहीं, पृ. 68
19. वहीं, पृ. 68
20. वहीं, पृ. 68
21. वहीं, पृ. 68
22. वहीं, पृ. 69
23. वहीं, पृ. 33
24. वहीं, पृ. 75
25. वहीं, पृ. 34


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