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ISSN 2292-9754

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09.30.2014


अपराजय निराला के व्यक्तिगत जीवन के संघर्ष और विरोध की करुण अभिव्यक्ति: ‘सरोज स्मृति’
सरिता विश्नोई
जे.आर.एफ. शोधछात्रा
हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान (भारत)

संपादक : सुमन कुमार घई
तिथी : ३० सितम्बर, २०१४

किसी भी रचनाकार की रचना उसके जीवन और वातावरण की उपज होती है। सूर्यकान्त निराला का सम्पूर्ण काव्य उसका उत्कृष्ट उदाहरण है। वे हिन्दी साहित्य में छायावाद युग के आधार स्तम्भ हैं। उनके जीवन की ही तरह उनका लेखन भी बहुआयामी रहा है, इसलिए वे साहित्य में महाप्राण निराला, आत्महन्ता निराला, विद्रोही कवि निराला आदि अनेक नामों से याद किए जाते हैं। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला की ’सरोज स्मृति’ उनके द्वारा रचित प्रबन्धकाव्यों में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। यह हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ शोकगीत है। शोकगीत आमतौर पर किसी प्रियजन की मृत्यु पर लिखा जाता है। साथ ही शोकगीत विचारप्रधान कविता भी हो सकती है, जिसकी प्रकृति गम्भीर एवं दुखपूर्ण होती है। इसमें वेदना का उद्रेक कलात्मक ढंग से किया जाता है। इसमें भावों का तीव्र उच्छ्वास होता है। निराला ने इसकी रचना 1935 में अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु पर की थी। सरोज की मृत्यु कवि निराला के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है और यही घटना सरोज स्मृति का आधार बनी। निराला का सम्पूर्ण जीवन कष्टों व तकलीफों से भरा हुआ था। बचपन में माँ, बाद में पत्नी और अन्य परिवारजनों की मृत्यु और अन्त में अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु ने निराला के जीवन को दुख से भर दिया था किन्तु उनका अपराजय व्यक्तित्व टूटता नहीं है। कवि निराला आम आदमी की तरह अपने दुख की अभिव्यक्ति न करके अपने को अटूट बनाए हुए अपने दुःख व वेदना की अभिव्यक्ति को उदात्त रूप से शोकगीत लिखकर अपनी पुत्री सरोज का तर्पण करते हैं। यह शोकगीत निराला के मन की एक सफल अभिव्यक्ति कही जा सकती है। पूरी कविता में वेदना और शोक की सफल व्यंजना है। कवि पिता अपनी पुत्री सरोज के जीवन के संबधित एक-एक घटना का स्मरण करता है और उसके हृदय से दारुण वेदना उठती है। पुत्री के प्रति पिता का दायित्व पूर्ण रूप से निर्वाह न कर पाने की कसक भी कवि को सालती है। दूधनाथ सिंह अपनी पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ में लिखते हैं कि उनकी दूसरी कथात्मक कविताओं से बिल्कुल अलग ‘सरोज-स्मृति’ में कोई ऐतिहासिक, अर्ध-ऐतिहासिक या लोक आख्यान पर आधारित इतिवृत्त नहीं उठाया गया है। यह वस्तु के स्तर पर सर्वथा एक आत्म-चरितात्मक कविता है।’’1 सरोज स्मृति केवल कवि के दुःख, वेदना और क्षोभ की ही कविता नहीं है वरन् इसमें कवि ने अपने व्यक्तिगत जीवन की अभिव्यक्ति व संघर्षों और विद्रोही को वाणी देकर इसे अधिक सफल बनाते हैं। इसमें कवि समाज की अनेक विसंगतियों का भी पर्दाफाश करते हैं।

‘सरोज स्मृति’ में निराला का दुख करुण भूमि के साथ-साथ यर्थाथ की ठोस भूमि पर विद्यमान है। अपनी पुत्री सरोज की असमसामियक मृत्यु ने निराला के पूरे व्यक्तित्व को हिलाकर रख दिखा था। जीवन के संघर्षों से कभी भी निराश न होने वाले कवि का सारा भाव जगत् इस कविता में जैसे करुणा के दायरे में आकर सिमट गया। उनके दुख की अनुभूति यथार्थ के धरातल पर खड़ी होकर जीवन-संघर्षों का साकार रूप प्रस्तुत करती है। मलयज के शब्दों में कहे तो -‘‘सरोज स्मृति में पहली बार दुख एक सौन्दर्यानुभूति के स्तर से लग कर कठोर वास्तविकता के रूप में व्यक्त होता है और इस दुख के बखान में कवि का कण्ठ किसी अन्तःसंगीत से नहीं, बाह्य विषमताओं के बोध से फटा-फटा सा हो गया है। यहाँ दुख का उसके निपट नंगेपन में साक्षात्कार है, उसे भुलावा देने या मधुर-मधुर बनाने की चेष्टा नहीं।......‘सरोज स्मृति’ दुख को लेकर उड़ने या उसमें खोने के लिए नहीं बल्कि दुख को याद करने, उससे भीतर ही भीतर मर्माहत होने और बीच-बीच में बाहर कभी व्यंग्य-विद्रूप में तो कभी आत्माधिकार में चीख पड़ने के लिए है।’’2 उन्हें यह बात बार-बार सालती हैं कि अपनी एक मात्र पुत्री के प्रति पिता का दायित्व अच्छी तरह निभा नहीं सके। इस कविता में निराला ने सरोज की मृत्यु से पहले की घटनाओं को संजोया है। सरोज की मृत्यु के समय निराला की आर्थिक परिस्थिति निराशाजनक थी। सरोज की आवश्यक सेवा-सुश्रूषा भी निराला नहीं करा पाये इसकी वेदना ही कवि निराला को कचोटती है। ‘सरोज स्मृति’ में कवि ने इसी वेदना को सरोज और स्वयं अपने जीवन के कतिपय खण्डों के माध्यम से वाणी दी है।

कविता का आरम्भ सरोज की मृत्यु पर उसकी स्मृति से होता है। कविता दुख की परछाई से परे है और कवि ने इसमें काव्योचित भव्यता के लिए एक रूपक बाँधा है। यह दुख के परे जीवन सत्य का दर्शन उपस्थित करता है। इसमें करुणा का उत्ताप नहीं है बल्कि एक शांत और गम्भीर चिन्तन का स्वर है। कविता में कवि निराला अपनी पुत्री की असमय मृत्यु को अमरतत्व देते हैं। वे सरोज की मृत्यु बीमारी और समुचित चिकित्सा के कारण होना न मानकर यह मानते हैं कि उसके जीवन के अट्ठारह अध्याय पूरे हो चुके थे। सरोज का मरण जीवन के ‘शाश्वत विराम’ की ओर जाने की यात्रा है। क्योंकि उसने अपने जीवन के अठ्ठारह वर्ष जो गीता के अठ्ठारह अध्याय के समान है, जिसे उसने पूर्ण कर लिया, उसके बाद तो नामरूप का त्याग कर अमर शाश्वत विराम प्राप्त करना ही शेष रहता है। उसे वे मरना न मानकर सरोज का ज्योतिर्गमन मानते हैं। कवि ने अपने गहन दार्शिनक विचारों के द्वारा आरम्भ में ही कविता में महाकाव्योचित औदात्य की गरिमा को अभिव्यक्ति प्रदान की है- ‘‘उनविंश पर जो प्रथम चरण/तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण/ तनये, ली कर दृक्पात तरुण/ जनक से जन्म की विदा अरुण!/ गीते, मेरी तज रूप-नाम/ वर लिया अमर शाश्वत विराम/ पूरे कर शुचितर सपर्याय/ जीवन के अष्टादशाध्याय/ चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण/ कहा-‘‘पितः पूर्ण-आलोक-वरण/ करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,/ ‘सरोज’ का ज्योतिःशरण-तरण।’’3

कवि निराला यह भी कहते हैं उन्होंने जीवन-भर साहित्य की सेवा कर ‘ज्योतिस्तरणा’ के चरणों में बैठकर ‘अशब्द अधरों’ की भाषा को सुनने-समझने की आभा प्राप्त की है। इसीलिए वे सरोज के मन की बात जान गए। जीवन के यथार्थ पथ पर अपनी सहचरी का साथ वे बहुत पहले ही खो चुके थे। इसीलिए सरोज परलोक के कठिन मार्ग में उनकी सहायक बनने के लिए ही उनसे पहले स्वर्ग गई। जब पिता असक्षम हो कर मृत्यु के इस मार्ग को पार करेगें तो उन्हें दिव्य सहारा प्रदान कर अंधकार से भरा हुआ दुस्तर भवसागर पार कर सके। इसीलिए वे लिखते हैं - ‘‘जब पिता करेंगे मार्ग पार/ यह अक्षम अति, जब मैं सक्षम/ तरूगी कर गह दुस्तर तम ?/ कहता मेरा प्रयाण सविनय/ कोई न अन्य था भावोदय।’’4 निराला के मन में यह पीड़ा भी थी कि वे अपनी पुत्री सरोज के जीवन के लिए कुछ भी न कर सके। वे सरोज को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे पुत्री सरोज! मैं व्यर्थ ही तुम्हारा पिता बना। कारण कि मैं कभी भी तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाया। यद्यपि धन उपार्जित करने के सभी उपाय मालूम थे, पर मैं उन उपायों को औजार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सका क्योंकि ऐसे धन कमाने के रास्ते में अनेक बुराइयाँ थीं। इसलिए स्वार्थसिद्धि के संग्राम को मैं हमेशा हारता रहा हूँ। उनकी यही पीड़ा ‘सरोज स्मृति’ में इन शब्दों में व्यक्त होती है- ‘‘धन्ये, मैं पिता निरर्थक था/ कुछ भी तेरे हित न कर सका/ जाना तो था अर्थागमोपाय,/ पर रहा सदा संकुचित-काय/ लख कर अनर्थ आर्थिक पथ पर/ हारता रहा मैं स्वार्थ समर।’’5 इसी तरह ‘‘अस्तु में उपार्जन को अक्षम, कर न सका पोषण उत्तम’’6 कह कर सरोज स्मृति में निराला ने अपनी आर्थिक विपन्नता की ओर भी संकेत किया है। वास्तव में कवि ने जीवन-भर संघर्ष का डटकर सामना किया। इस कविता में इस बात का स्पष्ट निदर्शन है कि निराला का जीवन विसंगतियों, विडम्बनाओं और उपेक्षाओं से आपूर्ण था। ‘गद्य-पद्य’ में समाभ्यस्त होने के बावजूद निराला को साहित्यिक जीवन में आलोचक वर्ग के ‘शर-क्षेप’ का शिकार होना पड़ा। सम्पादकगण उनकी रचनाओं को बिना पढ़े ही वापिस लौटा देते थे। कविता में इस कटु सत्य को बड़ी स्पष्टता के साथ उद्घाटित किया गया है: ‘‘एक साथ जब शत घात घूर्ण/ आते थे मुझ पर तुले तूर्ण,/ देखता रहा मैं अपल/ वह शर-क्षेप, वह रण-कौशल।’’7 कवि अपनी उपेक्षा से निराश होकर भी हार नहीं मानते हैं: ‘‘सोचा है नत हो बार-बार- ‘यह हिन्दी का स्नेहोपहार,/ है नहीं हार मेरी, भास्वर, यह रत्न-हार लोकोत्तर बर।’’8 कवि को इस बात का गर्व भी हैं कि हिन्दी साहित्य संसार को उन्होंने बहुत कुछ दिया है: ‘‘अन्यथा, जहाँ है भाव शुद्ध, साहित्य कला-कौशल प्रबुद्ध/ है दिए हुए मेरे प्रमाण, कुछ नहीं प्राप्ति का समाधान/ पाश्र्व में अन्य रख कुशल हस्त, गद्य में पद्य में सभाभ्यस्त।’’9

सरोज स्मृति में कवि पुत्री मृत्यु शोक और वेदना को तो अभिव्यक्ति देते हैं साथ ही अपने व्यक्तिगत जीवन की घटनाओं को भी अभिव्यक्ति देते हैं। वे अपने पत्नी के निधन से लेकर सरोज की मृत्यु तक के जीवन का वर्णन करते हैं। कवि की पत्नी की मृत्यु के पश्चात् सरोज व उसके भाई का लालन-पालन नानी के घर में हुआ, कवि के पुनर्विवाह सम्बन्धी के सम्बन्ध में परिवारजनों का दृष्टिकोण, किसी प्रकार वे पुनर्विवाह के प्रस्ताव को ठुकराते हैं, अपनी पुत्री सरोज का विवाह किन परिस्थितियों में करते हैं ये सार उनके व्यक्तिगत जीवन के पहलु उनकी इस कविता को पढ़ने से स्पष्ट हो जाते हैं। इन प्रसंगों से निराला के व्यक्तिगत जीवन के संघर्ष और विरोध पूर्ण रूप में अभिव्यक्ति पाते हैं। साहित्यिक जीवन के संघर्ष को भी व्यक्त करता है। वे अपने साहित्य क्षेत्र के संघर्ष को इन शब्दों में अभिव्यक्ति देते हैं- ‘‘तब भी मैं इसी तरह समस्त/ कवि जीवन में व्यर्थ ही व्यस्त/ लिखता अबाध गति मुक्त छन्द/ पर सम्पादक गण निरानन्द/ वापस कर देते पढ़ सत्वर/ दे एक पंक्ति दो में उत्तर/ लौटी रचना लेकर उदास/ ताकता हुआ मैं दिशाकाश/ बैठा प्रान्तर में दीर्घ प्रहर/ व्यतीत करता था गुन गुन कर/ सम्पादक के गुण यथाभ्यास/ पास की नोचता हुआ घास/ अज्ञात फेंकता इधर उधर/ भाव की चढ़ी पूजा उन पर।’’10

निराला ने ‘सरोज स्मृति’ में एक तरह से अपनी पुत्री सरोज के जन्म से मृत्यु तक का घटनाक्रम प्रस्तुत किया है। सरोज सिर्फ सवा साल की चपल बालिका थी और अपनी कोमलता और चपलता में माँ का मुख पहचान ही रही थी कि उसकी माँ अपना जीवन चरित्र पूरा कर चली गई। मातृहीन सरोज नानी के घर पली। वहीं बाल्यकाल के सारे विनोद कौतुक करती रहीं। कवि को वो दिन याद आते है जब कवि दूर स्थित प्रवास से चलकर करीब दो वर्ष बाद उसे देखने के लिए अपने ससुराल जाते हैं। वहाँ वे जब फाटक के बाहर आँगन में मोढ़े पर बैठे थे, उनके हाथ में उनकी जन्म कुण्डली थी जिसमें दो विवाह लिखे थे। पुत्री को देख कर पिता के मन में अपने भाग्य अंक खण्डित करने की चाह जागी। प्रियजनों और आत्मीयजनों के द्वारा दूसरा विवाह करने के प्रस्ताव को स्वयं को मांगलिक कह कर टालते रहे। स्वयं की कुण्डली को अपनी पुत्री को खेलने के लिए देते हैं, बालिका सरोज कुण्डली को फाड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर देती है। निराला के सामने अपने भाग्य अंक को खण्डित करने का इससे बेहतर कोई उपाय नहीं था: ‘‘पढ़ लिखे हुए शुभ दो विवाह/ हंसता था, मन में बढ़ी चाह/ खण्डित करने को भाग्य-अंक/ देख भविष्य के प्रति अशंक।’’11

अपनी पत्नी के असमसामियक निधन के कारण निराला ही माता-पिता दोनों का कर्तव्य निर्वाह करते हैं। निराला ने जितनी सुन्दरता व वात्सल्य भाव के साथ उसके बाल्यकाल कौतुक-विनोद का वर्णन किया उतनी ही तटस्थता, निस्संगता और निर्वैयक्तिकता का परिचय का सरोज के यौवनागमन के वर्णन में दिया है, यह हिन्दी साहित्य का अकेला उदाहरण है। अपनी पुत्री सरोज के तारुण्य का वर्णन कवि ने जिन शब्दों में किया है, वह सहज, स्वाभाविक, यथार्थ और मार्मिक तो है ही साथ ही एक पिता द्वारा अपनी पुत्री के सौन्दर्य-शृंगार-वर्णन में तटस्थ-निस्संग होकर सौन्दर्य और शृंगार का उदात्त रंग भी है- ‘‘धीरे-धीरे फिर बढ़ा चरण,/ बाल्य की केलियों का प्रांगन/ कर पार, कुंज-तारुण्य सुघर/ आई, लावण्य-भार थर-थर/ काँपा कोमलता पर सस्वर/ ज्यों मालकोश नव वीणा पर।’’12 कवि ने यह भी स्पष्ट किया है कि सरोज के व्यक्तित्व का विकास अपनी माता और पिता दोनों के महत् गुणों को लेकर हुआ था: ‘‘फूटा कैसा प्रिय कण्ठ स्वर, माँ की मधुरम व्यंजना भर/ हर पिता-कण्ठ दृप्त धार, उत्कल रागिनी की बहार!/ बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वन्हि।’’13 सरोज के नख-शिख निरूपण में कवि का शृंगार वर्णन तो हिन्दी का अद्वितीय वर्णन है। पिता द्वारा पुत्री के यौवनागमन के पर्दापण तथा उसकी शारीरिक परिवर्तन की सूचना देना हिन्दी कविता में अन्यत्र नहीं मिलता। इस सन्दर्भ में जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव अपनी पुस्तक ‘निराला का काव्य’ में लिखते हैं, ‘‘सरोज स्मृति में कवि अपनी पुत्री के यौवनागमन और रूप-दीप्ति का चित्रण नैतिक वर्जनाओं से ऊपर उठ कर मुक्त हृदय से करता है।’’14 जिस तरह निराला अपनी पुत्री सरोज के यौवनागमन का वर्णन करते उसी प्रकार विवाह के समय भी कलश का जल पड़ने पर सरोज के सौन्दर्य का वर्णन करते हैं- ‘‘प्रिय की अशब्द शृंगार-मुखर/ तू खुली एक-उच्छवास-संग/ विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग,/ नत नयनों में आलोक उतर/ काँपा अधरों पर थर-थर-थर।’’15

निराला अपने शोकगीत ‘सरोज स्मृति’’ में सामाजिक जीवन के यथार्थ का भी चित्र अंकित करते हैं। उस समय का कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के रीति-रिवाज, विवाह संबंधी लेन-देन, विवाह की प्रणाली, विद्रोही व्यक्ति के प्रति उनका रवैया आदि अनेक बातों इस कविता से प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्ति पाती है। ये कविता सिर्फ कवि की व्यक्तिगत जीवन की सीमा में नहीं बँधती है वरन् सामाजिक दशाओं को भी प्रतिबिम्बत करता है। ‘सरोज स्मृति’ में कवि का व्यक्तित्व उभर कर आया है। निराला का कान्यकुब्ज समाज उस समय दहेज जैसी कई तरह की बुराईयों, रूढ़ियों और सड़ी-गली मान्यताओं से ग्रस्त था। निराला की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी और न ही निराला जैसे प्रगतिशील व्यक्तित्व के लिए यह सम्भव था कि वे इन रूढ़ियों का समर्थन करते हुए ऐसे लोगों से अपनी कन्या का विवाह कर सके। निराला ने ऐसे समाज पर बड़ा तीखा व्यंग्य प्रहार किया है- ‘‘ये कान्यकुब्ज-कुल-कुलांगार/ खाकर पत्तल में करें छेद/ इनके कर कन्या, अर्थ खेद,/ इस विषय-बेली में विष ही फल/ यह दग्ध मरुस्थल-नहीं सुजल।’’16 निराला ने अपने पूरे साहस और दृढ़ता के साथ इन बुराईयों का बहिष्कार किया और परम्परागत विवाह के नियमों को तोड़कर एक नवीन तरीके से अपनी पुत्री का विवाह किया। जिस तरह कण्व ऋषि ने अपनी पुत्री शकुन्तला का विवाह किया, उसी तरह निराला ने सरोज का विवाह किया। निराला ने माता-पिता दोनों की भूमिका सरोज के जीवन में अदा की थी। विवाहोपरान्त पुत्री की पुष्प-सेज भी स्वयं रची- ‘‘माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,/ पुष्प सेज तेरी स्वयं रची।’’17 डॉ. नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘छायावाद’ में इस संबध में लिखा हैं, ‘‘यह निराला ही है, जो तमाम रूढ़ियों को चुनौती देते हुए अपनी सद्यः परिणीता कन्या के रूप का खुलकर वर्णन करते हैं और यह कहना नहीं भूलते कि ‘पुष्प सेज तेरी स्वयं रची।’’18 कविता के अन्त में निराला निपट पिता की भूमिका में है। जिस पुत्री के प्रति निराला के हृदय में अगाध स्नेह एवं वात्सल्य रहा हो, उसका असमय निधन निराला के लिए असह्य आघात था, इसमें आश्चर्य नहीं। जिस कवि ने अपने हाथों से मातृहीना सरोज की पुष्प सेज सजाई, उसे ही उसकी चिता सजानी पड़ी, भाग्य की इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है। इसीलिए कवि का व्यक्तिगत दुख कविता के इस अंश में स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है। ‘‘दुख ही जीवन की कथा रही/ क्या कहूँ आज जो नहीं कहीं’’19 निराला अपनी पुत्री सरोज को अपने गत कर्मो का अर्पण कर तर्पण करते है- ‘‘कन्या गत कर्मो का अर्पण/ कर, करता मैं तेरा अर्पण।’’20

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि ‘सरोज-स्मृति’ का अन्त एक रचना का अन्त नहीं था, कवि इस रचना में अपनी शोकानुभूति के साथ-साथ समाज की विद्रूपताओं को यथार्थ रूप में सामने लाते हैं। कवि ने नितान्त व्यक्तिगत जीवन-प्रसंगों को उठा कर भी वस्तुपरक तटस्थता द्वारा इसे कलात्मक रचना बना दिया है। शृंगार के आंशिक चित्रों के बावजूद शोक की गहरी अनुभूति ने इस कविता में करुण रस के साथ-साथ हास्य, शृंगार, एवं वात्सल्य का सुन्दर प्रयोग किया है। केवल ‘दुख ही जीवन की कथा रही’ कहकर कवि ने पूरी करुणा इसी पंक्ति में उड़ेल दी है। कवि-हृदय के सहज उद्गार ही शब्द बनकर कर निकले हैं साथ ही निराला कविता के मुख्य भाव के संयोजन के लिए ‘पूर्व दीप्ति शैली’ का प्रयोग करते हैं। उपमा, रूपक, आदि अलंकारो से युक्त बिम्ब का चित्रण कर कवि इस कविता में विराटत्व की सर्जना करते हैं। सरोज स्मृति में विभिन्न भावों का समाययोजन की विविधता और बहुलता है। कथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टि में सरोज स्मृति अप्रतिम है।

सन्दर्भ:

1.  दूधनाथ सिंह, निराला : आत्महंता आस्था, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2009, पृ. 166
2.  सं. परमानन्द श्रीवास्तव, निराला की कविताएँ, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2007 पृ. 110
3.  सं. रामविलास शर्मा, राग विराग सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, लोकभारती प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2008 पृ. 79
4.  वही, पृ. 70
5.  वही, पृ. 70
6.  वही, पृ. 82
7.  वही, पृ. 71
8.  वही, पृ. 81
9.  वही, पृ. 81
10.  वही, पृ. 73
11.  वही, पृ. 74
12.  वही, पृ. 90
13.  वही, पृ. 86
14.  डॉ. जगदीश श्रीवास्तव, निराला का काव्य, पृ. 20
15.  सं. रामविलास शर्मा, राग विराग सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, पृ. 90
16.  वही, पृ. 88
17.  वही, पृ. 91
18.  डॉ. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2009, पृ. 22-23
19.  सं. रामविलास शर्मा, राग विराग सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, पृ. 91
20.  वही, पृ. 91

सरिता विश्नोई
जे.आर.एफ. शोधछात्रा
हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान (भारत)


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