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ISSN 2292-9754

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03.17.2016


हिन्दी साहित्य में समकालीन परिवेश की चुनौतियाँ

आज भूमण्डलीकरण के दौर में उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण सारा विश्व बाज़ार के रूप में स्थापित हो चुका है। बाज़ारवाद से आज समाज का कोई वर्ग, क्षेत्र अछूता नहीं है। बाज़ारवाद का प्रभाव साहित्य समाज, सिनेमा आदि प्रत्येक क्षेत्र में देखा जा सकता है। मानवीय सम्बन्धों, भावनाओं और संवेदनाओं पर बाज़ार हावी है। वर्तमान में मीडिया में, साहित्य में, विभिन्न मंचों पर उत्तर आधुनिकता पर चर्चा-परिचर्चा और बहसें हो रही है। डॉ. सुधीर पचौरी ने बाज़ारवाद के इस उत्तर आधुनिक दौर की अत्यन्त बेबाक पूर्ण ढंग से वकालत की है, उन्होंने उत्तर आधुनिकता की संकल्पना के अति विस्तार को साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रेखांकित करते हुए कहा है कि, "भारत में शुरू होने वाला अस्मिता विमर्श, दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, भाषा संचेतना आदि की स्वीकार्यता उत्तर आधुनिकता की स्वीकार्यता है। सच है उत्तर आधुनिकता के इस दौर में साहित्य में, समाज में या फिर फ़िल्मों में, व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को स्वतन्त्रता के मनमाने अवसर मनमाने ढंग से तलाशे गए हैं। समाज में भी एक-दूसरे से अधिक आधुनिक होने की दौड़ ने हमारे जीवन मूल्यों को दरकने की स्थिति में पहुँचा दिया है। मूल्यहीनता ने भी इन्सानी वजूद को बौना साबित कर दिया है। अब इन्सान इस ग्रह का नियंता और ईश्वर को सबसे ख़ूबसूरत रचना नहीं बल्कि उपभोक्ता है। यहाँ सबके लिए सब कुछ है, लेकिन फिर भी किसी को कुछ हासिल नहीं होता। उत्तर आधुनिक के इस कालखण्ड को सकारात्मक पहचान देने के लिए स्वस्थ और सार्थक बहस को परिणाम तक पहुँचाना ही होगा।"1 अन्य चीज़ों के तरह आज ज्ञान का भी बाज़ारीकरण हो गया है। "आज बाज़ार का दबाव बढ़ रहा है। आज यदि बाज़ार के ख़िलाफ़ भी लिखा जाना है तो वह बाज़ार की समझी जाने वाली शैली और भाषा में। बाज़ार को परास्त करने के लिए बाज़ार के उपकरण ही काम में लाये जाने चाहिए। बाज़ारू हुए बगैर पुरानी फ़्रेम को तोड़कर तस्वीर लगाई जानी है तो नई और चमकती फ़्रेम के साथ। तस्वीर भी स्पष्ट, साफ़ और आधुनिक या कहा जाना चाहिए नई होनी चाहिए।"2

आधुनिकता के तनाव हमारे साहित्य में भी दिखाई दे रहे हैं। अब वे अपनी मुक्ति, अस्मिता के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इन रचनाकारों की कृतियों ने समकालीन विमर्श को दूर तक बदल दिया है। "पालगोमरा का स्कूटर", "कुरू कुरू स्वाहा", "हरिया हरकुलीज़ की हैरानी", "डूब", "पार", "मुझे चाँद चाहिए", "एक ज़मीन अपनी", "बाज़ार", "महानगरी में गिलहरी", "इन्द्रजाल", "विश्व बाज़ार का ऊँट", "बच्चे गवाह नहीं हो सकते", "कलि का सत", "दूसरे किले में औरत", "प्रोटोकाल", "हलफ़नामा", "दौड़", "हमारा शहर", "उस चाँदनी की वर्तनी", "बरस", "उन्माद" आदि रचनाएँ उत्तर आधुनिकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है जिनमें उत्तर आधुनिक मूल्यों के तनाव देखे जा सकते हैं। राजेश जोशी "चाँद की वर्तनी" में बाज़ार के ख़तरे की ओर संकेत करते हुए कहते हैं- "बाज़ार पहले ही चुरा चुका था हमारी जेब में रखे सिक्कों को/ और अब सौदा कर रहा था हमारी भाषा का/ और हमारे सपनों का"3 हिन्दी के प्रख्यात टिप्पणीकार गिरीश मिश्र का मानना है कि, "मानव इतिहास में एक नया युग शुरू हुआ है जिसमें राष्ट्रीय सीमाएँ निरर्थक हो गई हैं और राष्ट्र राज्य की अवधारणा कूड़ेदान में चली गई है। भूमण्डलीय बाज़ार के तर्क की माँग है कि सभी देश अपने दरवाज़े वस्तुओं और पूँजी के उन्मुक्त प्रवाह के लिए खोल दें। उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं। कथाकार सुभाष पंत अपनी "बाज़ार" कहानी में बाज़ारवाद और भूमण्डलीकरण के द्वारा सामाजिक और वैयक्तिक जीवन में तूफान आने की कहानी है। आनन्द हर्षुल की कहानी "महानगर में गिलहरी" अपने फंतासी शिल्प में एक बड़ा कैनवास लेती है। कथा गाँव से क़स्बा, क़स्बा से महानगर के विकासक्रम में पेड़ों, परिन्दों, आकाश, मुक्त हवा की बात करती है, बच्चों की बात करती है,.........पेड़ कम हुए तो फलों का लोप हुआ, मुस्कान लुप्त हुई, चिड़िया और आकाश लुप्त हुए। अब वह सब डिब्बों में है, बड़े-बड़े विज्ञापनों में है जो पोस्टर ग्लोसाइन बोर्ड, इलेक्ट्रोनिक डिस्प्ले बोर्ड में हैं, टी.वी. में हैं, कम्प्यूटर में हैं।"4 साहित्य में भी इस बदलाव को रेखांकित किया गया है।

इस सदी के रचनाकारों ने समाज में अपना पैर पसार चुकी उपभोक्तावादी संस्कृति के साथ व्यक्ति के बीच पनपने वाले सम्बन्धों को एक नया आयाम दिया है। अलका सरावगी की रचना "दूसरे किले में औरत" में लोग औरत को वस्तु बनाकर दिखाने में उद्धत हो गए हैं। यहाँ स्त्री भी शामिल हो चुकी है। इसी क्रम में जयनन्दन की "प्रोटोकाल" की नायिका ज्यूसी अपने जिस्म बेचकर अपने ग्लोबल पति के उपभोक्ता संस्कृति के तहत नैतिक मूल्यों के सम्बन्ध में नई परिभाषाएँ देने लगी है। प्रियदर्शन मालवीय "प्रेम न हाल बिकाय" में बाज़ार के दबाव में जी रहे युवक "मजहर खाँ और युवती सोनी के मध्य का प्रेम अनायास ही बाज़ारवादी तंत्र के ढांचे में ढलता है। गिरीराज किशोर "उसका बीजमंत्र" कहानी में "भौतिक उपभोक्ता संस्कृति के बीजमंत्र" को अत्यन्त गंभीर स्तर पर खोलते हैं। इसी प्रकार संजीव की "नस्ल" कहानी का प्रतिभाशाली युवक बाज़ार और बाज़ारवाद द्वारा सिर्फ उपयोग के लिए खरीदा जाता है। कैरियर की जद्दोजहद में इस ख़रीद-फ़रोख़्त के चलते वह युवक न जाने कब अपने रिश्तों से ही विमुख होने लगता है यही नहीं वह "हाइपरटेंशन" का रोगी बन जाता है। "नस्ल" कहानी आज के आपाधापी के ज़माने में मनुष्य के मानवीय अवदान का मूल प्रश्न बड़ी शिद्दत से उठाती है। बाज़ारवाद के नकारात्मक पहलुओं को भी कहानी बड़े अर्थपूर्ण ढंग से उठाती है।"5 प्रसिद्ध कथा लेखिका मृदुला गर्ग "कलि का सत" में पौराणिक पात्रों की मानसिकता को उत्तर आधुनिकतावादी विचारों के परिवेश में दिखाती है। पौराणिक पात्र भरत और उर्मिला आधुनिक पीढ़ी के वारिस के रूप में आते हैं। इनमें पर्यावरण और संस्कृति की सुरक्षा के नाम पर जंगलों का अस्तित्वविहीन करके गार्डन, पेप्सी फाउंटेनों और रेस्टोरेंटो आदि का विस्तार बताया है। पर्यावरण आज की सुपर बिकाऊ चीज़ है। कथाकार सुरेन्द्र वर्मा, उदयप्रकाश, मनोहरश्याम जोशी बाज़ारू ताक़तों द्वारा स्त्री के पतन की कहानी को कहते हैं। वैश्वीकरण और उत्तर आधुनिकता ने स्त्री शोषण के नये आयाम खोल दिए हैं, मुनाफ़े का बाज़ार पुरानी रूढ़ियों को फिर से ज़मीन देने लगा है। स्त्री सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग और सामान बेचने में सहायक बना दी गई है। डॉ. शिवकुमार मिश्र ने अपने लेख "रमैया की दुलिहन ने लुटा बाज़ार" में इस सत्य को अभिव्यक्ति करते हुए कहते हैं, "आज उत्पाद है, उपभोक्ता हैं, वस्तुएँ हैं और वस्तुओं में बदलता आदमी और उसकी आदमीयत है।.......टी.वी. चैनलों पर चौबीस घंटे छाये रहने वाले विज्ञापनों पर एक निगाह डालिए- दैहिक भौतिक सुखभोगवाद के साधनों का प्रचार करते बच्चे-बूढ़े, किशोर-जवान, स्त्री-पुरुषों की एक भीड़, उनके हाव-भाव, उनकी भाषा, उनका हर ढंग और ढब जो उनका नहीं, उन लोगों के द्वारा तय किया गया है जो उनका इस्तेमाल कर रहे हैं।"6

साहित्य में यह दौर अनुपस्थिति की तलाश का दौर है। यह "अनुपस्थिति की तलाश" मानवीय समाज, संस्कृति और संवेदना के स्तर पर छूटे, उपेक्षित या तिरस्कृत को उपस्थित कर पूर्ववर्ती मानवजनित कमियों को पूरा करती है। बीसवीं सदी के आख़िरी दशक में भारत में नए सामाजिक आन्दोलनों का उभार हुआ। स्त्री, किसान, दलित, आदिवासी और जनजातियों की नई एकजुटता ने ऐसी माँग और मुद्दे उठाए। इन समूहों ने अपनी अस्मिता के लिए और शोषण व भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष किया। इन विमर्शों की गूँज ने साहित्य में खलबली मचा दी है। स्त्री विमर्श से साहित्य में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। नारी ने साहित्य में महत्वपूर्ण जगह बना ली है। समकालीन साहित्य में स्त्री चेतना व अस्मिता के संकट व पहचान से जुड़े संघर्ष को उषा प्रियंवदा, ममता कालिया, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान, मृदुला गर्ग, कृष्णा सोबती, मालती जोशी, अलका सरावगी, नासिरा शर्मा, कुसुम अंसल, मेहरुन्निसा परवेज, अनामिका, क्षमा शर्मा आदि महिला लेखिकाओं ने को अपने साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत कर रही है। इन लेखिकाओं ने नारी जीवन के विविध प्रश्नों, अस्मिता के प्रश्नों, शोषण के विविध रूपों को अपने साहित्य के माध्यम से रेखांकित किया है। आज की लेखिकाओं ने अपनी रचना द्वारा स्त्री की अस्मिता को एक विशिष्ट पहचान दी है, उन्होंने साहित्य में सदियों की चुप्पी को तोड़ा है। स्त्री की नयी सोच, नयी जीवन दृष्टि और नया भाव-बोध उनके लेखन की पहचान है। उनके लेखन में स्वतंत्रचेता सम्पन्न नारी ने पहचान बनाई है। वह पुरानी रूढ़ियों, रीति-रिवाजों को मानने के लिए विवश नहीं है, उसने नैतिकता, पुरानी मान्यताओं को तोड़ा है और अपने अनुकूल नए मानदण्डों का निर्माण स्वयं किया है। चित्रा मुद्गल ने एक स्थान पर लिखा हैं, "नारी चेतना की मुहिम स्वयं स्त्री के लिए अपने अस्तित्व को मानवीय रूप में अनुभव करने और करवाने का आन्दोलन है कि मैं भी मनुष्य हूँ और अन्य मनुष्य की तरह समाज में सम्मानपूर्वक रहने की अधिकारी हूँ।" स्त्री-विमर्श पुरुषों का विरोधी न होकर अत्याचार का विरोधी है। नासिरा शर्मा की शाल्मली एक जगह कहती हैं, "मैं पुरुष विरोधी न होकर अत्याचार विरोधी हूँ। मेरी नज़र में नारी मुक्ति और स्वतंत्रता समाज की सोच, स्त्री की स्थिति को बदलने में है।"7 आज स्त्री समाज और अर्थ जगत् के विभिन्न क्षेत्रों में पैठ बना रहीं है और काफ़ी हद तक बना भी चुकी है। समाज में स्त्री के प्रति जागृति निर्माण करना तथा स्त्री के स्वत्व को, अस्तित्व को स्थापित करने का प्रयास ही स्त्री-विमर्श कहलाता है।

इस दौर में जहाँ स्त्री-पुरुषों की समानता की बात कहीं गई, स्त्री विमर्श पर बहस हुई वहीं दलित विमर्श भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। दलित साहित्य भी परम्परागत साहित्य में अनुपस्थित उपेक्षित जनों का साहित्य होने के कारण उत्तर आधुनिक युग का महत्वपूर्ण पहलू है। इस दलित साहित्य की विषय शैली, भाषा, आलोचना, सौन्दर्यशास्त्रीय मापदण्ड अपने हैं। दलित विमर्श के सन्दर्भ में मलखान सिंह, जयप्रकाश कर्दम, हीरा डोम, ओमप्रकाश वाल्मीकि, कर्मवीर भारती आदि दलित साहित्यकार के रूप में सामने आये। दलित साहित्य में जो प्रतिरोध का स्वर है उसके पीछे लम्बा शोषण, उपेक्षा और प्रताड़ना का परिणाम है। दलित साहित्य डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा को अपना मूल स्रोत मानता है। शरणकुमार लिंबाले के अनुसार, "दलित साहित्य अपना केन्द्र मनुष्य को मानता है। बाबा साहब के विचारों से दलित को अपनी ग़ुलामी का अहसास हुआ। उसकी वेदना को वाणी मिली, क्योंकि उस मूल समाज को बाबा साहब के रूप में अपना नायक मिला। दलितों की वेदना दलित साहित्य की जन्मदात्री है। दलित साहित्य की वेदना "मैं" की वेदना नहीं, वह बहिष्कृत समाज की वेदना है।"8 सदियों से सवर्ण समाज द्वारा उपेक्षित, तिरस्कृत, अपमानित दलितों ने अपने जीवन-संघर्ष में जो भोगा एवं झेला है, उसी की ईमानदार अभिव्यक्ति दलित साहित्य है। "दलित साहित्य दलितों की पीड़ा, उत्पीड़न, शोषण और उनके विरुद्ध उनके आक्रोश (कभी-कभी प्रतिशोध) तथा परिवर्तन के संकल्प का साहित्य है, जो जातिविहीन समाज का सपना पालता है।"9 दलित जीवन की विडम्बनाओं को ओमप्रकाश वाल्मीकि ने "जूठन", मोहनदास नैमिषराय की "अपने-अपने पिंजरे", सूरजपाल चैहान की "तिरस्कार" और "घूंट अपमान के", माताप्रसाद की "झोपड़ी से राजभवन", डॉ. डी. आर. जाटव की "मेरा सफर मेरी जिन्दगी", श्रवणकुमार की "मेरा गुनाह", बेबी काम्बले की "हमारा जीवन", भगवानदास की "मैं भंगी हूँ", डॉ. तुलसीराम की "मुर्दहिया" आदि आत्मकथाओं में उकेरा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने "जूठन" में वाल्मीकि समाज की पीड़ा और तल्ख़ अनुभव को स्वर दिया है, "एक ऐसी समाज व्यवस्था में हमने साँसे लीं जो बेहद क्रूर और अमानवीय है, दलितों के प्रति असंवेदनशील भी।"10 दलित साहित्य अपने लेखन के माध्यम से परम्परागत साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र, मिथक, भाषा, मुहावरे को तोड़कर अपना नया प्रतिमान गढ़ता है।

आदिवासी समाज के जीवन संघर्ष और परिवर्तन की चनुौतियों पर बात करते समय हमारे सामने पूरे विश्व में बिखर पड़े तमाम आदिवासी समुदाय हैं। अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघषर्रत तथाकथित मुख्यधारा की संस्कृति और सभ्यता ने उनके सामने दो ही रास्ते छाड़े हैं कि या तो वे अपनी अस्मिता, अपना इतिहास, अपनी परपंरा को मिटाकर "मुख्यधारा" की वचसर््ववादी सस्ंकृति को स्वीकार कर ले (यानी उसमें अपना निम्नतम दर्जा स्वीकार कर ले या फिर भौतिक रूप से अपना अस्तित्व मिट जाने के लिए अभिशप्त हो जाएँ -परू के माची ग्वकोंओं या झारखंड के बिरहारे, शबर, कारेबा, असरु या राजस्थान के सहरिया आदिवासी जनजातियों की तरह जिनकी संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। हद तो यह है कि वैश्वीकरण के इस दौर में बाज़ार की माँग पर आदिवासियों की नमुाइश तक हो रही है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के जारवा और आज समुदाय को चिड़ियाघर में बंद वन्य जन्तुओं की तरह पर्यटन और विस्मय की "वस्तु" बना दिया गया है। उनको केले और बिस्कुट देकर उनके साथ फोटो खिंचवाये जाते हैं। यह विकास और बाज़ार का अद्भुत समन्वय है। आदिवासियों के संसाधनों की खुली लूट की जा रही हैं । इस विकट स्थिति में एक ही रास्ता बचता है जिसे कभी "हूल" कहा गया तो कभी "उलगालुन" यानी कि अपने अधिकारों के लिए सशक्त प्रतिरोध। आदिवासी विमर्श एक ऐसा विमर्श है जिसमें समाज के रहन-सहन, उनकी सांस्कृतिक परम्पराएँ, अस्मिता, साहित्य और अधिकार के बारे में विस्तृत चर्चा की जाती है। आदिवासी समाज सदियों से जातिगत भेदों वर्णव्यवस्था विदेशी आक्रमणों और सभ्य कहे जाने वाले समाज की मुख्यधारा से दूर जंगलों और पहाड़ों में खदेड़ा गया है। पिछड़ेपन के कारण वह सताया गया है। अक्षरज्ञान न होने के कारण वह समाज की मुख्यधारा से कटा रहा है। भारत में यह जनजातीय समाज विभिन्न भागों में तथा विभिन्न भाषिक प्रदेशों में है। उनकी भाषा की व्याकरण व लिपि का विकास न होने के कारण ग़ैर साहित्य जगत में आदिवासी साहित्य कम मिलता है। आज़ादी के बाद प्रकाश में आए विमर्शों में स्त्री व दलित विमर्श के बाद आदिवासी विमर्श महत्वपूर्ण है। चूँकि आदिवासी समाज में श्रम में भागीदारी के कारण स्त्री का स्थान आदिवासी समाज में महत्वपूर्ण रहा है। इसीलिए इस साहित्य में स्त्री रचनाकारों ने अपनी उपस्थित दर्ज कराई है। उनके व अन्य रचनाकारों के माध्यम से आदिवासी समाज के सवालों को जगह मिल रही है। स्त्री जीवन के संघर्ष को लेकर रमणिका गुप्ता, महाश्वेता देवी, निर्मला पुतुल, सरिता बड़ाइक, ग्रेस कुजुर, मीरा रामनिवास, डॉ. मंजु ज्योत्स्ना आदि साहित्यकार ने आवाज़ दी है। डॉ. गंगासहाय मीणा के शब्दों में आदिवासी साहित्य अपनी रचनात्मक ऊर्जा आदिवासीयों की विद्रोह परम्परा से लेता रहा है इसलिए उन आन्दोलन की भाषा और भूगोल भी महत्वपूर्ण रहा है। हिन्दी अधिकांश आदिवासियों की भाषा नहीं है। मुंडारी, संथाली, हो, भीलोरी, ओड़या, गारो आदि उनकी भाषाएँ रही हैं। आदिवासी रचनाकार का मूल साहित्य उनकी इन्हीं भाषाओं में है। हिन्दी में मौजूद साहित्य देशज भाषाओं में उपस्थित साहित्य के इसी समृद्ध परम्परा से प्रभावित है। कुछ साहित्य का अनुवाद व रूपांतरण भी हुआ है। भारत के तमाम भाषाओं में लिखा जा रहा साहित्य हिन्दी, बंग्ला, तमिल जैसी भाषाओं में अनूदित और रूपातंरित होकर राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर रहा है।"11

हिन्दी में आदिवासी साहित्य में कुछ महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे गए है। हिंदी के आदिवासी उपन्यासकारों ने देश के दूर-दराज़ के आंचलों में रहनेवाले आदिवासियों के जीवन को उजागर किया है, जिसने आज आन्दोलन का रूप ले लिया है। आदिवासियों के सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक जीवन का चित्रण करने के साथ-साथ उनकी समस्याएँ, शोषण, अभाव गरीबी, पिछड़ापन, अशिक्षा आदि पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया है। राकेश कुमार सिंह का सन् 2003 में प्रकाशित "पठार पर कोहरा" झारखंड के जनजातीय जीवन पर लिखा उपन्यास है। रचनाकार ने शोषण, उत्पीड़न और अत्याचारके विभिन्न हथकंडों के चंगुल में फँसे संथाल और मुण्डा आदिवासियों की नियति को उजागर किया है। मधुकर सिंह द्वारा लिखा "बाजत अनहद ढ़ोल" उपन्यास सन 2005 ई. में प्रकाशित हुआ। प्रस्तुत उपन्यास झारखंड के संथाल आदिवासियों की अंग्रेज़ी साम्राज्य के ख़िलाफ़ किए गए संग्राम की पृष्ठभूमि में लिखी महागाथा है। महिला लेखिका शरद सिंह का "पिछले पन्ने की औरतें" उपन्यास सन 2005 ई में प्रकाशित हुआ। लेखिका ने मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड़ की बेड़ियाँ जनजाति की महिलाओं को केंद्र में रखकर यह उपन्यास लिखा है। रामनाथ शिवेंद्र द्वारा लिखा "तीसरा रास्ता" उपन्यास सन 2008 ई. में प्रकाशित हुआ है। उपन्यास में रचनाकार ने विस्थापन, शोषण, उत्पीड़न और व्यवस्था के दमनचक्र में पीसती सोनपुर जनपद के आदिवासियों की नियति को उजागर किया है। भगवानदास मोरवाल का "रेत" सन 2008 ई. में प्रकाशित जरायम-पेशा कंजरजनजाति पर लिखा उपन्यास है। उपन्यास के केंद्र में है माना गुरू और माँ नलिन्या की संतान कंजर और उनका समग्र जीवन। तथाकथित सभ्य समाज ने जिसे तिरस्कृत बस्ती क़रार दिया, उस समाज में जाकर उपन्यासकार ने कंजरों के जीवन के अंतरंग को परत-दर-परत खोलकर समाज के सामने रखकर मानवता के दर्शन कराये हैं। "ग्लोबल गाँव के देवता" रणेंद्र द्वारा लिखा, सन 2009 ई. में प्रकाशित उपन्यास है। झारखंड के आदिवासी असुर समुदाय के जीवन को केंद्र में रखकर लिखी यह महागाथा है। असुरों का अपने अस्तित्व, आत्मसम्मान एवं अस्मिता के लिए चल रहा अनवरत दीर्घकालीन संघर्ष और सतत मिटते जाने की प्रक्रिया का दिल दहला देनेवाला चित्रण इस उपन्यास में मिलता है। हरिराम मीणा ने राजस्थान के आदिवासी भील सूरमाओं की शहादत पर "धूणी तपे तीर" उपन्यास लिखा है, जो सन 2008 ई. को प्रकाशित हुआ। दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में गोविन्द गुरू के नेतृत्व में आदिवासी भीलों ने अंग्रेज़ी एवं देशी सामन्ती शासकों के विरुद्ध एक लंबी लड़ाई लड़ते हुए अपनी मातृभूमि को स्वाधीनता दिलाने हेतु अपनें प्राणों की आहुति दे डाली। जिसमें डेढ़ हज़ार से अधिक आदिवासियों की शहादत हुई। उस शहादत को केंद्र में रखकर प्रस्तुत उपन्यास पहले आदिवासी जलियांवाला बाग हत्याकांड की समरगाथा बयान करता है। इनके अतिरिक्त संजीव का "जंगल जहाँ शुरू होता है", राकेश कुमार सिंह का "जहाँ खिले है रक्त पलाश", "जो इतिहास में नहीं है", राजेन्द्र मोहन भटनागर का "मगरी मानगढ़ः गोविन्द गिरी" भी महत्वपूर्ण है।

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि समकालीन हिन्दी का साहित्य का परिवेश बदलाव के अनेक परिदृष्य को अपने भीतर समेटे हुए है। विविध विमर्शों के माध्यम से चिन्तन को एक नव्य आयाम मिल रहा है। आज के इस उत्तर आधुनिक दौर में साहित्य अपने पूरे सामर्थ्य के साथ उपस्थित रहा है। यह हिन्दी साहित्य के सशक्त व समर्थ रूप को हमारे सामने रखते है। समाज की हर बदलती तस्वीर को वह अपने चिन्तन में शामिल कर उसे अपनी आवाज़ व भाषा का सामर्थ्य देकर पाठकों के सामने रख रहा है।

सन्दर्भ:

1. उत्तर आधुनिक मीडिया विमर्श, डॉ. सुधीर पचौरी,
2. यथार्थ की यात्रा कथा वैचारिकी, भालाचन्द जोशी, अन्यथा, अंक 19, पृ. 140
3. चाँद की वर्तनी, राजेश जोशी, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ. 85
4. महानगर में गिलहरी (कहानी), आनन्द हर्षुल, अन्यथा, अंक 5, पृ. 103
5. नया ज्ञानोदय, सं. रवीन्द्र कालिया, अंक 90, अगस्त 2010, पृ. 48
6. उद्धृत लेख रमैया की दुलिहन ने लुटा बाज़ार, डॉ. शिवकुमार मिश्र, सम्प्रेषण, अंक 133, वर्ष 39, 2004, पृ. 59-60
7. शाल्मली, नासिरा शर्मा, किताबघर प्रकाशन, 1994, पृ.सं. 25
8. उत्तरप्रदेश, सितम्बर-अक्टूबर 2002, पृ. 43
9. उत्तरप्रदेश, सितम्बर-अक्टूबर 2002, पृ. 43
10. जूठन, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2009, भूमिका से।
11. आदिवासी अस्मिता और साहित्य, डॉ. गंगासहाय मीणा

सरिता विश्नोई, एस.आर.एफ शोधछात्रा
हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग
वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान


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