अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.28.2015


कैसे बताऊँ कि वो कितने ख़ास में है

कैसे बताऊँ कि वो कितने ख़ास में है
ज़िन्दगी बन गया, मेरी हर साँस में है

अंदाज़ा उसके लिए मेरी तलब का यूँ लगाओ लोगो
शिद्दत किसी प्यासे की, जितनी प्यास में है

उसकी वज़ह से रोना, उसकी ही ख़ातिर हँसना
दिल के हर रंग वो, हर अहसास में है

उस पर मेरा यक़ीन ठीक कुछ वैसा ही है
एक जुआरी को जितना यक़ीं ताश में है

वो दूर होके भी दूर नहीं तुझसे "सपना"
सुनती हूँ आहटें, जैसे कि यहीं पास में है


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें