अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.23.2015


जीने नहीं दिया

जीने नहीं दिया मरने भी नहीं देती ख़्वाइशें तेरी
करता है दिल बार-बार, जाने क्यूँ फ़रमाइशें तेरी

पास आकर दूर जाना तेरा, मार ना डाले मुझे
मौत से भी ज़्यादा क़ातिल हैं, आज़माइशें तेरी

है आरज़ू तो तोड़कर जंज़ीरें, ज़माने की आ मिल
रुसवा करती हैं मुझे, सरपरस्तों से गुज़ारिशें तेरी

होने लगा है शक, तुझपे और तेरी चाहत पर मुझे
कहता है मोहब्बत तू जिसे, ना हो कहीं साज़िशें तेरी

उल्फ़त के वेश में नफ़रत, कसर यही थी बाकी ”सपना”
आ गया सच सामने नज़र के, हुई फीकी नुमाइशें तेरी


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें