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ISSN 2292-9754

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03.13.2015


रीतिमुक्त काव्य में अभिव्यक्त समाज और लोक-जीवन
(बोधा के विशेष सन्दर्भ में)

एक रचनाकार अपने साहित्य की सामग्री समाज से ग्रहण करता है और समाज को ही अपने साहित्य में अंकित करता है। समाज के समस्त आचार-व्यवहार, चिन्तन-मनन, रहन-सहन आदि का सटीक चित्रण स्वाभाविक रूप से उसकी रचनाओं में अभिव्यक्त हो जाता है। कहते हैं साहित्य के अध्ययन से हमें समाज के अनेकानेक पक्षों का विवरण मिल जाता है। अतः किसी युग विशेष के अध्ययन में साहित्य का अपना महत्व होता है। साहित्य का चेतन-प्रवाह तद्युगीन परिस्थितियाँ तथा उसके लोकजीवन को मुखरित करता हुआ चलता है। हिन्दी साहित्य के अनेक युग रहे और हर युग की अपनी निजी विशेषता रही। रीतिकाल एक ऐसे ही काल का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने आप में विशिष्ट रहा है। सम्पूर्ण रीतिकालीन काव्य को विद्वान वस्तुत रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध तथा रीतिमुक्त काव्यधारा के रूप में तीन भागों में विभाजित करते हैं। शृंगारिकता, अलंकारिकता, वीरता, भक्ति, नीति तथा काव्यशास्त्रीय विवेचन आदि दृष्टि से सभी रीतिकालीन कवियों ने अपने कर्तव्य का भली भाँति निर्वाह किया है। रीतिकालीन कवियों ने काव्य में अपने युगीन परिवेश को सम्पूर्ण वैभव के साथ उत्कृष्ट ब्रज भाषा में चित्रित करने का प्रयास किया है। डॉ. नगेन्द्र कहते हैं कि, "स्वार्थ परायण राजनीतिक व्यवस्था, सामान्तीय वातावरण, राजनीतिक विकेन्द्रीयकरण और सामाजिक अव्यवस्था तथा विलासमूलक वैभवजन्य प्रदर्शन प्रधान अलंकरण प्रवृत्ति का तत्कालीन साहित्य की गतिविधि पर बड़ा प्रभाव रहा है। तद्युगीन कलाकार की आत्मा पर ये बाह्य परिस्थितियाँ एक प्रकार से हावी हो गई थी।"1 रीतिकालीन कवि दरबार और जन दोनों जीवन के प्रत्यक्ष भोक्ता और द्रष्टा रहे थे। अतः इनके काव्य में हमें तत्कालीन समाज का लोक जीवन अपनी समस्त विशिष्टताओं के साथ मुखरित होता नज़र आता है। इन कवियों की पैनी दृष्टि अपने यु गीन वातावरण का हर एक कोना झाँक आई, जिसकी सफलतम अभिव्यक्ति उनके काव्य में दृष्टिगत होती है।

सम्पूर्ण रीतिकालीन साहित्य को दरबारी साहित्य के नाम से भी जाना जाता है। दरबारी परिवेश और जीवन के चित्रण इनमें बहुतायात मिलता है किन्तु इन्हें अपनी भौतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति अनजान नहीं कहा जा सकता है। रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध के अतिरिक्त रीतिमुक्त काव्य के विषय में यह सर्वविदित है कि वो किसी काव्यशास्त्रीय बेड़ियों से जकड़ा नहीं था। रीतिमुक्त कवियों के पास उन्मुक्त कवि हृदय मिलता है, जिससे वे अपने व्यक्तिगत भावानुभूति की सरस अभिव्यक्ति करते दिखते हैं। स्वछन्दतावादी कवि के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले रीतिमुक्त कवियों में घनानन्द, बोधा, ठाकुर, आलम और द्विजदेव को लोक-जीवन के अधिक निकट कहा जाता है, क्योंकि ये लोक से उठकर दरबार तक पहुँचे एवं लोक के सभी पक्षों को पूर्ण सजीवता के साथ अपने काव्य में यथास्थान वर्णित करने का इन्होंने पूरा प्रयास किया था। अपने साहित्य भवन के निर्माण में ये अपने पूर्ववर्ती और समकालीन परम्पराओं से अंशत प्रभावित होते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाते नज़र आते हैं। रीतिमुक्त काव्य में अभिव्यक्त लोक जीवन के परिप्रेक्ष्य में कहा जाता है कि राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से यह युग पतनोन्मुख था। कवियों द्वारा समाज, शासन की अन्तः अनुभूतियों तथा अर्थ-वैभव की बहुलता का जो चित्रण प्रस्तुत किया गया है वह निश्चित रूप से समकालीन परिवेश को साकार रूप प्रदान करता है। समाजिक एवं सास्कृतिक दृष्टि से यह युग अनेक परिर्वतनों का काल था। साहित्य जहाँ दरबार और लोकजीवन से प्रभावित हो रहा था वहीं इस्लाम और हिन्दू संस्कृतियाँ अपने मिश्रित रूप में सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रही थीं। राजनीतिक दृष्टि से यह युग थोथी राजसत्ता और उसके पतन का काल कहा जा सकता है। बाहरी आक्रमण और टूटती पुरानी सत्ता के सूक्ष्म विवेचन के साथ-साथ सामान्य वर्ग का लोकजीवन बहुत सूक्ष्मता के साथ इस काव्य में परिलक्षित हुआ है। रीतिमुक्त कवि में कोई भी कवि ऐसा नहीं है जो दरबार से पूर्णतः संपृक्त रह कर काव्य रचा रहा हो या सामान्य वर्ग में रहकर अपने प्रेम की पीड़ा को न भोगा हो। कवि कहीं न कहीं दरबार और जन-जीवन दोनों से जुड़ा नज़र आता है और उसका स्पष्ट निदर्शन उनके काव्य में होता है।

तद्युगीन समाज का सही-सही आकलन साहित्य के माध्यम से किया जा सकता है। प्रत्येक साहित्यकार का दृष्टिकोण समाज के चित्रण में पृथक-पृथक हो सकता है। रीतिमुक्त कवि तत्कालीन सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति में अपनी सच्चाई का परिचय देते हैं। सामाजिक युग से यह युग घोर पतन का काल था। समाज स्पष्टतः दो वर्गों-उच्च वर्ग जिसमें तत्कालीन शासक और उसके दरबारी आते हैं तथा निम्न में आम जनता जो आज की दृष्टि में सर्वहारा वर्ग कह सकते हैं। उच्च वर्ग अनेकानेक विकृतियों और दोषों में लिप्त था, जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव सामान्य वर्ग भी पड़ रहा था। उच्च वर्ग जहाँ वैभव की नींद सो रहा था वही निम्न वर्ग घोर दारिद्रय अथवा गरीबी, शोषण तथा अत्याचार का शिकार होकर रह गया था। डॉ. नगेन्द्र रीतिकालीन जनमानस की स्थिति को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि, "मुगल बादशाहों के असंख्य युद्धों, बहुमूल्य इमारतों अमीरों के विलास-वैभव सभी का भार, अन्त में जाकर इन किसानों पर ही पड़ता था। सचमुच इस समय के प्रासाद इन्हीं लोगों की हडिड्यों पर खड़ा हुए थे, इन्हीं के आँसू और रक्त की बूँदें जमकर अमीरों के मोती और लालों का रूप धारण कर लेती थी...दीन प्रजा त्रस्त होकर त्राहि-त्राहि कर उठी थी।"2 कर्ज और भूख से दबी जनता के पास कला और काव्य को आश्रय देने के बारे में सोचने का अवकाश न था। समाज का उच्च वर्ग स्वर्ण जड़ित ओढ़नी की छाया में तथा शराब और शबाब के वातावरण में ही अपना जीवन यापन कर रहा था। यही कारण है कि रीतिकालीन कविता मावन-जीवन की दबी हुई आंकाक्षाओं और माँसल सौंदर्य के प्रति आकर्षण के भाव की कविता कही जाती है। आलोच्य युग में समाज भी विविध वर्गों तथा वर्गों में विभक्त था। यह वर्णभेद प्रायः कार्य विभाजन पर आधारित था, जो कालान्तर में दूषित होकर जन्म आधारित हो गया था। समाज की वर्ण एवं जाति व्यवस्था के स्पष्ट प्रमाण रीतिमुक्त कवियों के काव्य में सरलता से मिल जाते हैं। कवि बोधा के काव्य में समाज में प्रचलित अनेक जातियों का संकेत देने में समर्थ रहा है, "नाऊ ब्राह्मण भाट पठायों। चलि विद्यापति के घर आयो।।"3 एक अन्य स्थान पर कवि बोधा तेली, तमोली, बनिया, जौहरी, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जातियों का वर्णन करते हैं- "तेली तमोली संग ले कीन्हें अनेक प्रमाण"4 तत्कालीन समाज में परिवार को समाज की सबसे छोटी और महत्त्वपूर्ण इकाई होने का गौरव प्राप्त था किन्तु नारी की स्थिति भोग्या से अधिक नहीं थी। पुरुषों को प्रसन्न करना उसका एकमात्र उद्देश्य रह गया था। आलोच्य काल में सांस्कृतिक जीवन पूरी तरह से विलासिता और सजावट की भावना से आच्छादित था।

किसी भी युग का साहित्य समाज, धर्म, अर्थ आदि से ही प्रभावित नहीं होता, अपितु राजनीति भी उसे समुचित रूप से प्रभावित करती है। "राजनीतिक दृष्टि से यह काल मुगलों के शासन के वैभव के चर्मोत्कर्ष और उसके बाद उत्तरोतर ह्रास, पतन तथा विनाश का युग कहा जा सकता है।"5 रीतिकालीन साहित्य राजनीति से अधिक आप्लावित था, क्योंकि तत्कालीन कवियों को अपनी प्रतिभा के कद्रदान राजा और सामन्त ही दिखाई देते थे। इन्हीं के आश्रय में रहकर वे अपने काव्य का सृजन कर सकते थे और साथ ही धन और यश का अर्जन भी सरलता से कर सकते थे। यही नहीं उस समय राजसभा अथवा दरबार का सदस्य होना कवियों के लिए गौरव की बात थी। राजकवि कहलाने में इन कवियों को अपार आनंदानुभूति होती थी। राजनीति दाव-पेंचों में युद्ध का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। रीतिकाल के सभी कवियों के काव्य में युद्ध वर्णन की झलक दिखाई देती है। युद्ध में प्रयोग होने वाले अस्त्र-शस्त्र, सेना आदि का ही विहंगम वर्णन उनके काव्य में दृष्टिगत होता है। बोधा कृत ‘विरहवारिश’ में जो युद्ध के साक्ष्य उपलब्ध होते हैं। वे किसी राजनीतिक चाल द्वारा प्रेरित नहीं है, अपितु माधवानल को प्रियतमा से मिलाने के प्रयास हैं। उज्जैन के महाराज विक्रम अपनी सेना लेकर जब कामसेन के राज्य की ओर बढ़ते हैं तब सैनिकों का साजो-सामान तथा उनका कला-कौशल युद्ध के प्रसंगों का संकेत देता है। कवि अस्त्र-शस्त्र आदि को विस्तृत रूप से वर्णित न कर केवल इतना ही कहते हैं-

“चलहिं परिध तरवार कई हज्जार सेलसर,
गिरत रूंड पर रूंड पर मुंड लगी फर।।"6

तत्कालीन राजनीतिक परिवेश अत्याचार और कुरूपताओं के सन्दर्भ में अपने चरमोत्कर्ष पर था, जिसमें उच्च वर्ग ही भीतर से हिल उठा था, तो जन साधारण के संत्रस्त जीवन का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। वैभवशाली तथा विलासी मुगलों का पतन इस सीमा तक हो चुका था कि वे बाह्य आक्रमणों से अपनी रक्षा करने में असमर्थ थे। रीतिमुक्त कवियों ने राजनीति की इस जर्जर स्थिति का सम्यक् वर्णन अपने काव्य में किया। साथ ही समयानुसार अपने आश्रयदाताओं को नीतिपरक आदर्शों से अवगत कराकर उन्हें उनके कर्त्तव्य के प्रति जागरूक करने में भी इन्होंने बहुत परिश्रम किया। एक आदर्श राजा के लिए यह परमावश्यक है कि वह अपनी प्रजा के दुःख दूर करने के उपाय करे। बोधा के काव्य में अपनी प्रजा के प्रति अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा को प्रकट करते हुए महाराज विक्रम कहते हैं-

"दुःख हरौं करों ताको सुचैन। तब राजा करौं फिरि कै उज्जैन।
हौं अनपान करि हौं न सोय। जब लौं न वियोगी सुखी होय।।"7

रीतिमुक्त कवियों ने राजनीतिक तिगड़मबाजी, राजनीतिक परिवेश के उतार-चढ़ावों का और जनता पर उसके प्रभाव को बखूबी अपने काव्य में केन्द्रित किया है।
रीतिकालीन समाज में भी अनेक रीति-रिवाजों का प्रचलन था जो भारतीय और फारसी संस्कृति के मिश्रित रूप में विद्यमान थे। रीतिमुक्त कवियों ने उन्मुक्त भाव से इन रीति-रिवाजों को अपने काव्य में अभिव्यक्ति दी हैं। जीवन की सम्पूर्णता मे अपना योगदान देने वाले विविध संस्कार, लोक-विश्वास, खानपान, व्रत-उपवास, शिष्टाचार, अतिथि-सत्कार आदि अनेक रीति-रिवाजों का चित्रण इनके काव्य में दृष्टिगत होता है। शृंगारिक काव्य के मध्य भी इन रिवाजों की झलक अवश्य दिखाई देती है। विवाह के अवसर पर प्रचलित फलदान के साथ-साथ आँगन लीपने, चौक पूरने और बाधाई बजने के रीति-रिवाज हमें कवि बोधा के काव्य में दिखाई देते हैं-

"पूतसहित पुतहूँ घर आई। घरीचार तक बजी बधाई।
छान बहुत मंगनों कहं दीन्हों। निवतो सबै नग्र को कीन्हों।
अंगन लिपाय चौक पुरवायो। फलदानी समाज बुलवायो।
इत शृंगार माधौ को साज्यों। सोरह कला मउन तब राज्यों।"8

कवि बोधा ने रीतिकालीन समाज में प्रचलित लोक विश्वासों के अन्तर्ग शकुन-अपशकुन, अन्धविश्वासों आदि का भी वर्णन अपने काव्य में किया है।

आर्थिक दृष्टि से यदि रीतिकालीन समाज का देखे तो उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के मध्य गंभीर खाई थी। शासक वर्ग और कृषक, श्रमजीवी वर्ग आदि के मध्य एक अन्य वर्ग सेठ, साहूकार, दुकानदार, व्यापारी आदि का था, जो इन दोनों के बीच कड़ी का कार्य कर रहा था। इस वर्ग को उच्च शिक्षा भले ही प्राप्त नहीं थी, किन्तु समसामयिक परिस्थितियों और शासकीय प्रभावों का व्यवहारिक ज्ञान इसे अवश्य था। यह वर्ग समाज मे मध्यम वर्ग के रूप में उभर रहा था। शासक वर्ग की आय का स्रोत मध्यम वर्ग था, इन्होंने अपनी आय के लिए कृषक तथा निम्न वर्ग को दबोचा हुआ था। यह निम्न वर्ग पूर्णतः कृषि पर आश्रित था, जो युद्धों तथा प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होती रहती थी। "श्रमजीवी वर्ग को किसी न किसी की बेगार करनी पड़ती थी और उसके बदले प्रायः मिलती कोड़ों की मार। कहने का अभिप्राय यह हैं कि इस युग में गरीबों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी और शासक एवं सम्पन्न वर्ग श्रम किए बिना ही सम्पन्न था।"9 रीतिकालीन रीतिमुक्त कवियों का काव्य निरन्तर अपनी दृष्टि तत्कालीन आर्थिक दशा पर रखी थी। उस समय समाज की जीविका मुख्यतः कृषि और पशुपालन था। समाज में धनोपार्जन के लिए किए जाने वाले वैधक, ज्योतिष, सुनार, तमोली, नट, बाजीगर आदि पेशों के व्यवसायों का उल्लेख भी रीतिमुक्त कवियों ने भली-भाँति किया है। कवि बोधा चिकित्सा के द्वारा धन-अर्जन का वर्णन करते हैं-

"हम हाकिम बर बैद्य सयाने। औषध भाँति भाँति की जानै।
पुरिया एक लाख तिहिं याहीं। नृप रस कह्यो जगाती काही।।"10

रीतिकालीन साहित्य मुस्लिम संस्कृति और दरबारी संस्कृति के प्रभाव से ओत-प्रोत है। अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा मे लिखे हुए साहित्य में लोक-जीवन अप्रत्यक्ष रूप से झाँकता हुआ प्रतीत होता है। प्रेम, विरह, शृंगार आदि के मार्मिक और हृदयस्पर्शी वर्णन में नागर समाज और संस्कृति भी परोक्ष रूप से मुखरित हुई है। यह भी सत्य है कि आभिजात्य समृद्धि और विलासपूर्ण वातावरण के सानिध्य से रीतिकालीन काव्य में समाज और संस्कृति सुप्तावस्था में थे, जिसे कवियों ने कदा-कदा पर्वोंत्सव, क्रीड़ाओं आदि के वर्णन द्वारा पुनः जीवित करने अथवा जगाने का प्रयास किया। कवि बोधा अपने समसामयिक दायरे से पूर्णतया बाहर नहीं निकल पाये। दरबार के मादक परिवेश और आश्रयदाता के कोपभाजन ने कवि बोधा को समाज के अधिक समीप ला खड़ा किया। बोधा ने समाज की विविध परम्पराओं, रूढ़ियों और संस्कृति को अपनी प्रेमानुभूति में मिलाकर इस प्रकार से अभिव्यक्त किया है कि समाज का सम्पूर्ण चित्र उनके काव्य में चित्रित हो गया है। लोक की दृष्टि में प्रेम असामाजिक है। रूढ़िग्रस्त समाज की अनुदारता के कारण ही कदाचित बोधा ने इस प्रकार के मनोभाव किए-

“जबतें बिछुरे कवि बोधा हितु तबतें उदरदाह सिरातों नहीं।
हम कौन सों पीर कहै अपनी दिलदार तो कोऊ दिखातो नहीं।।"11

सामाजिक जीवन का प्रत्येक अंग-प्रत्यंग बोधा के काव्य में बहुत ही स्वाभाविक ढंग से अनुस्यूत हुआ है। जातीय जीवन, पारिवारिक जीवन, पर्व, उत्सव, खान-पान, लोकगीत, वस्त्राभूषण आदि सभी तत्त्वों का उल्लेख उनके काव्य में मिलता है।

कवि बोधा के काव्य में अभिव्यक्ति सामाजिक और सांस्कृतिक वर्णन के आलोक में कहा जा सकता है कि साहित्य अपने समाज और संस्कृति से कदापि नहीं कट सकता। रीतिकालीन कवियों ने सामाज और लोक-जीवन की अभिव्यक्ति को भले ही न्यूनाधिक रूप में ग्रहण किया हों, किन्तु उससे नितान्त कटकर उन्होंने अपने काव्य का सृजन नहीं किया। समाज में रहकर उसके परिवेश को निहारकर कवि बोधा ने भी अपने काव्य को लोक से सम्पृक्त किया है। समाज में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था तथा आश्रम व्यवस्था को कवि बोधा ने अप्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्ति प्रदान की है। परिवार की महत्व को ध्यान में रखकर उन्होंने रीतिकालीन पारिवारिक जीवन का भी विश्लेषण करने का प्रयास किया है। नारी को मात्र भोग्या न मानकर उसके प्रति स्वस्थ दृृष्टिकोण की अभिव्यक्ति बोधा के काव्य का प्रबल पक्ष है। जो रीतिकालीन मुक्त कवियों की अपनी विशिष्टता रही है। ज्योतिष और ग्रह-नक्षत्र, जिसकी मान्यता आज के समाज में भी प्रबल रूप से विद्यमान है कि चर्चा भी कवि बोधा के सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति का अंग रही है। व्यक्ति के आचार-व्यवहार, रहन-सहन आदि का वर्णन बोधा के काव्य के सांस्कृतिक पक्ष को उद्घाटित करता है। मानव के जीवन में प्राचीन काल से व्याप्त विविध संस्कारों और रीति-रिवाजों का सफलतम् वर्णन बोधा के काव्य में दृष्टिगत होता है। मनुष्य की शुष्कता और नीरसता को दूर करने वाले विविध पर्वोत्सवों का वर्णन उनके काव्य में देखने को मिलता है। अपने युगीन समाज की वेशभूषा, खानपान, शृंगार प्रसाधन, आभूषण आदि का जो चित्रण बोधा ने किया है वह समाज के प्रति उनके सूक्ष्म अन्वेषण का ही परिचायक कहा जा सकता है। लोक जीवन की अमूल्य थाती लोकगीत और लोकगाथाओं का सजीवात्मक वर्णन बोधा का लोक जीवन से अत्यधिक सामीप्य प्रकट करता है।

निष्कर्षतः रीतिकालीन साहित्य भले ही दरबारी छत्रछाया में पला हो किन्तु समाज और लोक जीवन की झलक रीतिमुक्त कवियों के साहित्य में देखने को मिल जाती है। रीतिमुक्त कवि बोधा का काव्य भी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति से अछूता नहीं है। कवि बोधा ने अपने काव्य को स्वानुभूतिपरक हृदयग्राही उद्गारों से ही नहीं सजाया, अपितु सामाजिक और सांस्कृतिक वर्णन में भी उन्हें पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है, समाज और अपने परिवेश की कही भी उन्होंने उपेक्षा नहीं की। समाज, संस्कृति और लोक का अद्भुत सामंजस्य और ब्रजभाषा में उसकी उत्कृष्ट तथा भव्य अभिव्यक्ति उनके काव्य को जीवन्तता प्रदान करते हैं।

सन्दर्भ:

1 हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पब्लिशिंग, नई दिल्ली, डॉ. नगेन्द्र, पृ. 265
2 रीतिकाव्य की भूमिका, डॉ. नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ. 13-14
3 बोधा ग्रंथावली, विरहवारीश, सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, 30/10, पृ. 222
4 बोधा ग्रंथावली, विरहवारीश, सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, 8/3, पृष्ठ 67
5 रीतिकाव्य की भूमिका, डॉ. नगेन्द्र, पृ. 17
6 बोधा ग्रंथावली, विरहवारीश, सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ. 188
7 बोधा ग्रंथावली, विरहवारीश, सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, 18/61, पृ. 146
8 बोधा ग्रंथावली, विरहवारीश, सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, 30/19, पृ. 223
9 हिन्दी साहित्य का उत्तरकाल-रीतिकाल, प्रो. महेन्द्र कुमार, आर्य बुक डिपो, नई दिल्ली, 1984, पृ. 13
10 बोधा ग्रंथावली, विरहवारीश, सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, 20/34, पृ. 164
11 बोधा ग्रंथावली, इश्कनामा, सम्पादक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, 2/30 पृ. 6

सुश्री सन्तोष विश्नोई,
एस. आर. एफ. शोधछात्रा
हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ


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