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ISSN 2292-9754

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11.30.2014


हिन्दी में व्यंग्य उपन्यासों की परम्परा का अनुशीलन
सन्तोष विश्नोई
एस.आर.एफ. शोधछात्रा,
हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ

स्वातन्त्र्योत्तर काल के बदलते परिवेश और उसमें गहराती विसंगतियों ने हिन्दी व्यंग्य विधा को बहुमुखी अभिव्यक्ति दी है। यद्यपि व्यंग्य यत्र-तत्र स्वतन्त्रता से पूर्व भारतेन्दु और छायावाद आदि कालों में भी देखने को मिलता है परन्तु परिवेश की समग्र विकृतियों को देखने, भोगने और व्यक्त करने का काम बहुत अधिक स्वतन्त्रता पश्चात् ही हुआ। स्वतन्त्रता के बाद सभी क्षेत्रों में अनेक प्रकार की असंगति, विकृति, कमज़ोरी दिखाई दी। विविध राजनीतिक, प्रशासनिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, व्यक्तिगत आदि क्षेत्रों की विसंगति ने व्यंग्य विधा को सशक्त किया। व्यंग्य का जन्म विसंगतियों, विकृतियों के फलस्वरूप होता है तथा आक्रोश तथा विद्रोह के रूप में अभिव्यक्त होता है। अपने तीखे प्रहार में भी व्यंग्य समाज सुधार का एक साधन बनता है। व्यंग्यकार हमेशा विडम्बना को पकड़ने की कोशिश में रहता है। हमारे आधुनिक जीवन में विडम्बनाओं की खाई बहुत बड़ी है जिसे पाटने में व्यंग्यकार हमेशा प्रयत्नशील रहता है। जितना व्यापक विस्तार विसंगति का होगा उतना ही व्यापक विस्तार व्यंग्य वस्तु का होता है। व्यंग्य की ‘विषय-वस्तु’ के संबंध में डॉ. बापूराव घोडू देसाई का कथन है- "व्यंग्य वस्तु की व्याप्ति परिवार, समाज, प्रान्त देश से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक है। वह समाज को विडम्बना, विद्रूपता, झूठ, फरेब आदि को उद्घाटित कर कटुता को अनावृत करता है। लेकिन इसका वैशिष्ट्य यह है कि ‘वह’ अन्तर्विरोध होते हुए सामंजस्य अगम्भीर होते हुए गम्भीर, प्रहारात्मक होते हुए भी परास्त; हास्यात्मक होते हुए भी उपहासात्मक सपाटबयान होते हुए भी पैनापन उसमें दिखाई देता है। यथार्थ के प्रति व्यंग्य कारगर होता है। आवृत फोड़ों को खरोच तथा चीरफाड़ कर गंदगी निकालने का कार्य व्यंग्य करता है। समाज में स्थित अन्ध परम्परा, रीतियाँ, अन्याय, पाखण्ड आदि के प्रति आक्रोश व्यक्त करना व्यंग्य वस्तु है।"1 व्यंग्य सभी विधाओं में व्यक्त होने के बावजूद सशक्त और महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में स्थापित हो गयी है। स्वतन्त्रता के पश्चात् के व्यापक फैलते भ्रष्टाचार, परिवर्तित होते परिवेश विशेषतः राजनीति, प्रशासन, समाज-उच्छेद, टूटते रिश्ते, लालफीताशाही आदि ने व्यंग्यकारों की लेखनी की धार को अधिक पैना किया। व्यंग्य विधा के परिप्रेक्ष्य में डॉ. वीरेन्द्र मेहन्दीरत्ता ने लिखा है कि, "व्यंग्य साहित्य का संबंध अधिकांशतः सामयिक समस्याओं से है। सामयिक समस्या जितनी अधिक व्यापक तथा वास्तविक होगी, व्यंग्य साहित्य उतना ही सार्थक तथा महत्त्वपूर्ण होगा। व्यंग्यकार समस्याओं के कारणों की तह में जाकर उन कारणों पर कई बार निदर्यता अथवा क्रूरता के साथ प्रहार भी करता है।"2

व्यंग्य वस्तुतः एक विशेष परिस्थिति की माँग करता है, ऐसी परिस्थिति जिसमें असंगति, विद्रूपता, विषमता, अन्तर्विरोध, शोषण, अनीति तथा सामाजिक एवं व्यक्तिगत मूल्यों का ह्रास होता हो। स्वतन्त्रता के बाद ऐसी अस्वस्थ प्रवृत्तियाँ बड़ी तेजी से पली और बढ़ीं। विकट परिस्थितियों के परिणामस्वरूप साहित्यकारों ने अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए व्यंग्य को माध्यम बनाया। आरंभ में उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में व्यंग्य का प्रयोग किया। यथा-व्यंग्य-उपन्यास, व्यंग्य-नाटक, व्यंग्य-कहानी, व्यंग्य-निबंध आदि। इस प्रकार व्यंग्य का स्वतन्त्र अस्तित्व उभरकर सामने आया। भारतीय जन-जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं को व्यक्त करने का सक्षम विधान व्यंग्य उपन्यास के माध्यम से भी सामने आया। युग की टूटन, पीड़ा, संत्रास को स्वर देने की पूरी ईमानदार कोशिश स्वतन्त्रता पश्चात के व्यंग्य उपन्यासकारों ने की। उपन्यासों में व्यंग्य का स्वरूप दो रूपों में दिखाई दिया। पहले वे उपन्यास जिनमें व्यंग्य केन्द्रभूत तत्त्व बनकर आया और जिनका कथानक व्यंग्य के ताने-बाने से ही बुना जाता था। दूसरे वे उपन्यास जिसमें व्यंग्य की सिर्फ झलक दिखाई देती है। जिनमें अनेक विषयों की विकृतियों को लेकर परोक्ष व्यंग्य देखने को मिला। प्रेमचन्द से लेकर भगवतीचरण वर्मा तक ऐसे उपन्यास थे जिनमें व्यंग्य गौण था। उनमें प्रसंगानुकूल व्यंग्य का समावेश था परन्तु स्वातन्त्र्योत्तर युग में व्यंग्य उपन्यासों की एक सम्पूर्ण परम्परा विद्यमान रही । 1952 में रांगेय राघव के ‘हुजूर’ उपन्यास मिलता है जिसमें एक कुत्ते को नायक के रूप में चित्रित किया गया है। वहीं 1954 में राधाकृष्ण का ‘सनसनाते सपने’ प्रकाशित हुआ जिसमें दो निराश बेटों समीर और प्रभात की कथावस्तु की व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति हुई है। इस दौर का एक चर्चित उपन्यास पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का ‘कढ़ी में कोयला’ उपन्यास प्रकाशित हुआ जिसमें ग्रामीण अँचल से पहली पीढ़ी द्वारा पहली बार शहरी सभ्यता में प्रवेश और शोषण की कथा कही गयी है।

1961 में व्यंग्य पितामह हरिशंकर परसाई के ‘रानी नागफनी की कहानी’ तथा ‘तट की खोज’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुए। ‘रानी नागफनी की कहानी’ को लघु उपन्यास की श्रेणी में गिना जाता है। इसमें समाज शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में व्याप्त घोर छल का यथार्थ खाका प्रस्तुत किया गया है। भूमिका में हरिशंकर परसाई ने कहा है- "फैंटसी के माध्यम से मैंने आज की वास्तविकता के कुछ पहलुओं की आलोचना की है।"3 कहानी में फैंटसी अधिक काल्पनिक होते हुए भी वर्तमान यथार्थ की अपनी विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को कुंवर अस्तभान, रानी नागफनी और इनसे सम्बन्धित विभिन्न पात्रों के माध्यम से व्यक्त किया है। जिस युग में ये उपन्यास लिखे गए थे वो मोहभंग का दौर था। आज़ादी से पहले देखे गए स्वप्नों के बिखराव, टूटन सबसे अधिक इसी दौर में दिखाई देती है। जनता के चकनाचूर हुए सपनों की अभिव्यक्ति पूरी क्षमता के साथ हरिशंकर परसाई ने की है। हरिशंकर परसाई के व्यंग्य में मर्मस्पर्शिता, तीखा प्रहार, आधात की क्षमता, परिहास, प्रौढ भाषा आदि विशेषताएँ दिखाई देती है। 1962 में हिमांशु श्रीवास्तव का ‘कथा सूर्य की नई यात्रा’ प्रकाशित हुआ। इसी दौर में विंध्याचल प्रसाद गुप्त का ‘चाँदी का जूता’ प्रकाश में आया जिसमें फैंटेसी द्वारा घूसखोरी, अफसरों की कार्यप्रणाली व भ्रष्टाचार पर व्यंग्य किया गया है।

व्यंग्य उपन्यास की इस परम्परा में 1968 में प्रकाशित श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ उपन्यास मील का पत्थर माना जाता है। लेखक ने राग दरबारी में वर्तमान विघटित समाज का व्यंग्यपूर्ण चित्रण करते हुए व्यवस्था की अव्यवस्था पर करारी चोट की है। ‘इससे पूर्व हिन्दी में ऐसा उपन्यास लिखा ही नहीं गया।’4 राग दरबारी उपन्यास का शिवपालगंज एक विशेष गाँव न होकर समूचा भारत है क्योंकि भारत गाँवों में बसा है और भारत के समस्त गाँव शिवपालगंज की तरह है। आज़ादी के बाद भारत का हर गाँव स्वयं पूर्ण विकसित होने वाला था जहाँ न कोई छोटा होगा न बड़ा। साथ ही सारी सुख-सुविधाएँ गाँव में ही मुहैय्या होने वाली थी पर आज़ादी के बाद शहर के पास बसने वाला गाँव-शिवपालगंज, शहरी प्रगति से कोसों दूर है। शहरी पात्र रंगनाथ स्वास्थ्य लाभ करने के लिए ऐसे गाँव में आता है, जहाँ हर व्यक्ति मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ है। यहाँ का कॉलेज युवा वर्ग को सुशिक्षित करने की बजाय गुटबंदी के दाँव-पेचों की दीक्षा दे रहा है, सत्ता की राजनीति के बल पर सनीचर जैसा विदूषक ग्राम-सभा का प्रधान हो जाता है। गाँव वालों की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस निरपराधों को पकड़ती है, व्यवस्था ऐसी कि गरीब (लगड़) के न्याय की पुकार मखौल बनकर रह जाती है। रागदरबारी के बारे में नेमिचन्द्र जैन लिखते हैं कि आज के भारतीय जीवन के पतनोन्मुखता, गिरावट, विकृति, मूल्यहीनता आदि बहुत-सी विभिन्न स्थितियों के बड़े प्रभावी चित्र ‘रागदरबारी’ में मौजूद हैं जो हमारे चिर-परिचित अनुभवों को फिर से ताजा करते हैं।5 रागदरबारी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि, यह फैंटसी या प्रतीक शैली का सहारा लिए बिना यथातथ्य शैली में लिखा गया पहला व्यंग्य उपन्यास है। व्यंग्यात्मकता भी अपने चरम उत्कर्ष में है।

राग दरबारी के बाद अनेक व्यंग्य उपन्यास सामने आए। 1970 में डॉ. श्यामसुन्दर घोष ने ‘एक उलूक कथा’ में एक उल्लू के माध्यम से वर्तमान समाज का जीवन्त चित्र प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत उपन्यास में कहानी ऐसे उल्लू की है जो धरती-स्वर्ग, देहात की कई यात्राएँ करता है, कई घाटों का पानी पीने के बावजूद, गिरगिट की तरह रंग बदलने पर भी उल्लू ही रहता है। उल्लू के बहाने डॉ. श्यामसुन्दर घोष ने चोरी, चोरी के माल में हिस्सा बँटाते नेता, पुलिस, महिला आश्रम की औरतें, पेशेवर अपराधी, भैया लोग, जेबकतरे, व्यापारी, अखबार के सम्पादक, संवाददाता, प्राइवेट जासूस आदि से सम्बन्धित असंगतियों को व्यंग्य का विषय बनाया है। 1971 में बदीउज्जमा का ‘एक चूहे की मौत’ व्यंग्य उपन्यास साहित्य जगत् में आया। जिसमें लेखक ने फैंटेसी को अपने व्यंग्य का प्रमुख आधार बनाया। जिसमें दो चूहों की मौत आज के नामहीन और पहचान रहित मनुष्य के वर्तमान जीवन का प्रतीक है। बदीउज्जमा का ‘एक चूहे की मौत’ वर्तमान व्यवस्था तन्त्र पर चोट करने वाला एक सशक्त एवं परिपक्व उपन्यास है। इस उपन्यास में चरित्र जैसी कोई ठोस इकाई नहीं है। चूहा, फाइल का प्रतीक है। चूहेखाना सरकारी दफ्तर का तो चूहेमार क्लर्क से लेकर अफसरों तक के प्रतीक हैं पर ये व्यापक अर्थ वाहक बन जाते हैं। सरकारी और प्रशासनिक व्यवस्था पर चोट करना ही इस उपन्यास का प्रमुख उद्देश्य है। ‘एक चूहे की मौत’ उपन्यास व्यक्तिगत रचना होने के साथ-साथ सीमित परिवेश के बावजूद गंभीर प्रभाव छोड़ती है। 1977 में ही बदीउज्जमा का ‘छठा तन्त्र’ आया जिसमें एक बिल्ली और चूहे की उपदेशात्मक कथावस्तु के माध्यम से समाज को जाग्रत करने का सफल प्रयास किया। यह स्वतांत्र्योत्तर भारत में रह रहे आम आदमी की विसंगतियों और निर्थरकता से पूर्ण जीवन जीने की स्वाभाविक नियति का दस्तावेज है।

डॉ. शंकर पुण्ताम्बेकर के ‘एक मंत्री स्वर्गलोक में’ व्यंग्य उपन्यास में एक मंत्री का स्वर्ग में सशरीर पहुँचने की फैंटसी है। लेखक प्रारंभ में ही संदेह प्रकट करता है कि कोई मंत्री स्वर्गलोक में कैसे पहुँच सकता है? यह संदेह ही मंत्री पद की विसंगतियों को उजागर करता है। फैंटसी से डॉ. पुण्ताम्बेकर ने व्यवस्था की विसंगतियों को उभारा है। डॉ. श्रवणकुमार गोस्वामी ने पंचतत्र के आधार पर पच्चीस किस्सों में ‘जगल तंत्रम्’ की रचना की है। सिंह, मोर, नाग, चूहा इसके पात्र हैं। डॉ.. श्रवणकुमार गोस्वामी का दूसरा व्यंग्य उपन्यास है- ‘दर्पण झूठ न बोले’। इस उपन्यास में लेखक ‘व्यंग्य-चित्रों’ के द्वारा प्रजातंत्र में सरकार, सरकारी कर्मचारी, दफ्तर, प्रशासक, पुलिस, सत्तादारी पार्टी, विपक्ष पर व्यंग्य करता है। 1977 के बाद के राजनीतिक परिवेश का खाका चुभती हुई शैली में पेश करता यशवंत कोठारी का व्यंग्य उपन्यास ‘यश का शिंकजा’ आया। इसमें दिखाया गया है कि जनता पार्टी के शासन से उसमें जो विभिन्न दलों के नेता थे उनके आपसी झगड़ों के कारण जनता को वह सब कुछ नहीं मिल पाया जो क्रांतिकारी कदम के रूप में जनता दल को सरकार बनाने का अवसर देकर उसे चाहा था। ‘यश का शिंकजा’ उपन्यास में केन्द्रीय वरिष्ठ मंत्री श्री रानाडे, सम्पादक आंयगार, सचिव एस. सिंग, उद्योगपति रामलाल के माध्यम से व्यंग्य को उभारा है। आबिद सुरती ने ‘काली किताब’ नामक व्यंग्य उपन्यास में शैतान की परिकल्पना द्वारा समकालीन भारतीय स्थितियों की विडम्बनाओं को प्रस्तुत किया है। यहाँ झूठ बोलना धर्म है और माताओं का शील सरेआम हरण किया जाता है। असत्यमेव जयते कहते हुए सच्चाई के मार्ग को काँटों की राह बताया है। लगातार विकसित हो रहे काले समाज की सफेद प्रस्तुति ‘काली किताब’ का कथ्य है।

डॉ. नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य उपन्यास ‘आश्रितों का विद्रोह’ तथा पाँच एब्सर्ड उपन्यास’ प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते नज़र आते हैं। ‘आश्रितों का विद्रोह’ में लेखक ने फैंटसी के द्वारा वर्तमान शासन व्यवस्था की विसंगतियों पर व्यंग्य किया है। इस उपन्यास के मूल में यथार्थ व्यंग्य है। कॉलेज के अहाते से गुजरती हुई उपन्यास की कथा विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक परिधि को छूती है। डॉ. नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य उपन्यास की मूल संवेदना प्रशासनिक विसंगतियों को उघारने की है। शासन द्वारा ‘आश्रितों का विद्रोह’ को दबाने का कारगर उपाय है-आपात् स्थिति घोषित कर सम्पूर्ण अधिकार अपने हाथ में ले लेना। विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र भारत के निवासी इस स्थिति का अनुभव कर चुके हैं। और यह बात खरी उतरती है कि लेखक केवल अतीत अथवा वर्तमान में सीमित नहीं रहता अपितु भविष्य भी देखता है। सन् 1973 में प्रकाशित ‘आश्रितों का विद्रोह’ उपन्यास में वर्णित स्थिति 1975 के शासकीय दमन में प्रत्यक्ष दिखाई दिया और यहीं पर व्यंग्य की उपयुक्तता दिखाई देती है।6 डॉ. नरेन्द्र कोहली का ‘पाँच एब्सर्ड उपन्यास’ शिल्प और कथ्य की दृष्टि से हिन्दी व्यंग्य में नवीन प्रयोग है। इसका कलेवर उपन्यास का नहीं है परन्तु शिल्प की दृष्टि से ‘पाँच एब्सर्ड उपन्यास’ उपन्यास ही है। नरेन्द्र कोहली के इन एब्सर्ड उपन्यासों में जिन्दगी की विसंगतियों से जूझते-टूटते, गिरते और कहीं-कहीं संभलते इंसान की नियति अपने सारे फूहड़पन के साथ रूपायित हुई है।

हिन्दी व्यंग्य उपन्यासों की परम्परा में अशोक शुक्ल का ‘प्रोफेसर पुराण’, ‘हड़ताल हरिकथा’, हंसराज रहबर का ‘किस्सा तोता पढ़ाने का’, मुद्राराक्षस का ‘प्रपंच मंत्र’ मनोहर श्याम जोशी का ‘कुरू कुरू स्वाहा’, डॉ. सरोजनी प्रीतम का ‘बिके हुए लोग’ डॉ. सुदर्शन मजीठिया का ‘कागजी सुल्तान’ के. पी. सक्सेना का ‘श्री गुलसनोवर की यात्रा’ आदि भी आए। अशोक शुक्ल के ‘प्रोफेसर पुराण’ में लेखक ने विलक्षण उपमाओं की झड़ी लगातार विसंगतियों को पूरी एब्सर्डिटी के साथ उजागर किया है। इस उपन्यास का प्रोफेसर मंगतूराम नायक है जो विभागाध्यक्ष की सेवा करता है। इसी सकवा के बल पर अच्छे परीक्षाफल के साथ ही एक कॉलेज में नियुक्ति भी हो जाती है। प्रोफेसर पुराण भारतीय उच्च शिक्षा-प्रणाली पर करार व्यंग्य है। यह महाविद्यालयों की स्थिति और अध्यापकों की नियुक्ति का परिचय देता है। अशोक शुक्ल का दूसरा व्यंग्य उपन्यास है ‘हड़ताल हरिकथा’। इसमें भी शैक्षणिक जगत् की विसंगतियों को वर्णित किया है। वहीं डॉ. बरसानेलाल चतुर्वेदी ने अपने उपन्यास ‘मंत्री जी के निजी सचिव की डायरी’ में देश की राजनीतिक स्थिति का चिट्ठा खोला है। सुरेशकांत ने ‘ब’ से बैंक उपन्यास में भारतीय बैंको की कार्यप्रणाली की विसंगतियों को उजागर किया है। श्रीराम ठाकुरदादा का ‘पच्चीस घंटे’ पत्रकार की दिनचर्या के माध्यम से समाज की विसंगतियों को उभारता है। यही काम रास बिहारी पाण्डेय के उपन्यास ‘डंके की चोट’ में किया है। डॉ. चन्द्रशेखर ने ‘बयान एक गधे का’ में प्रकाशित कर ‘कथनी-करनी के अंतर को पाटने का प्रयास किया है। सुदर्शन मजीठिया ‘कागजी सुल्तान’ (1983) के माध्यम से फकीरे आजम की कहानी कहते हुए राजतंत्र का पर्दाफाश किया है। मुद्राराक्षस का ‘प्रपंच तंत्र’ (1983) में इसी बात को उभारा है। डॉ. सरोजनी प्रीतम अपने उपन्यास ‘बिके हुए लोग’ (1986) में प्रकाशित उपन्यास में कीर्ति तथा अर्थलोभी साहित्यकारों की यादों का पोस्टमार्टम किया है। वर्तमान काल में अनेक व्यंग्यकारों के व्यंग्य उपन्यास प्रकाशित हुए। जिन्होंने अपने व्यंग्य उपन्यासों से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों की विसंगतियों पर तीखा प्रहार कर हिन्दी व्यंग्य उपन्यासों की परम्परा को आगे विकसित किया है। इन व्यंग्य उपन्यासकारों डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी विशेष चर्चित रहे हैं। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के ‘नरकयात्रा’, ‘बारामासी’, ‘अलग’, ‘मरीचिका’ और ‘हम न मरब’ आदि व्यंग्य उपन्यासों के द्वारा समाज के कटु सत्य को जो पर्दों के पीछे छुपा है उसे परत-दर-परत उघाड़ते हैं। समसामयिक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विसंगतियों और विडम्बनाओं पर तीखा प्रहार करते हुए वर्तमान में व्यंग्य उपन्यास की परम्परा को एक नई भाषा और शिल्प प्रदान किया।

निष्कर्ष:

व्यंग्य उपन्यासों ने व्यंग्य विधा को समृद्ध, परिमार्जित और एक नई दिशा देने का प्रयास किया। अनेक व्यंग्य उपन्यासकारों ने समाज और राष्ट्र की विसंगतियों पर बेबाक कलम चलाई है। उनकी लेखनी में करुणा, प्रहार और सपाटबयानी व्यंग्य तीनों का मिश्रण मिलता हैं। सभी व्यंग्य उपन्यासकारों के लेखन की अपनी निजी विशेषता रही है। वे सधी हुई सशक्त भाषा में कभी सहज तो कभी तीक्ष्ण व्यंग्य करते हैं।

सन्दर्भ:

1. हिन्दी व्यंग्य विधा: शास्त्र और इतिहास, डॉ. बापूराव घोडू देसाई, चिंतन प्रकाशन, कानपुर, 1990, पृ. 191
2. आधुनिक हिन्दी साहित्य में व्यंग्य, डॉ. वीरेन्द्र मेहंदीरत्ता, पृ. 241
3. रानी नागफनी की कहानी- लेखक की बात, हरिशंकर परसाई, पृ. 76
4. राग दरबारी-व्यंग्य संदर्भ की परख (पुरोवाक्) संपादक रामवृक्षसिंह और डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी
5. हिन्दी उपन्यास विविध आयाम, चन्द्रभानु सोनवणे, से साभार नेमिचन्द्र जैन का कथन उद्धृत पृ. 241
6. नरेन्द्र कोहली, व्यक्तित्व और कृतित्व, नर्मदा प्रसाद उपाध्याय(संपा.), पृ. 42


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