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ISSN 2292-9754

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12.02.2018


जननायक

एक ऐसा नाम
जो ना कोई 
महानायक का है 
ना कोई बड़े गायक का 
ना ही किसी भाग्य विधायक का 
यह तो नाम है 
एक द्रुतगामी रेल का 
जो परिचायक है भारी भीड़ 
और रेलमपेल का 
जहाँ साँस टँगी रहती है 
शरीर खड़ा रहता है 
दबा रहता है 
पीसता रहता है 
चक्की में जैसे आटा
फिर भी सुनहले सपनों में 
उलझा रहता है 
देह से निकलता पसीना 
भले दूसरों को अच्छा न लगे 
मज़दूर के लिए 
चन्दन समझें /माने
क्योंकि उसी में  बसता है 
उसका दाना पानी 
उम्मीद का सोना-चांदी
भविष्य की कहानी
चार पैसा कमा कर 
उलझे भाग्य को सुलझाने की चाह
बूढ़े बाप के लिए चश्मा 
माँ के लिए दवाई 
और
बीबी के लिए
फागुन की साड़ी
उसे तो दिखती है 
बस दो जून की रोटी 
पूरा परिवार को जिलाने के लिए 
समय की फटी हुयी चादर 
सिलाने के लिए 
बच्चों के लिए किताब व पेंसिल 
इसी में हो जाता है 
सारी कमाई का हिसाब 
और इसी सपना में भूल जाता है 
कि
वह जननायक की भीड़ में 
कितना दबा हुआ है!


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