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ISSN 2292-9754

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10.10.2018


आख़िरी सलाम

 अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित बाल-कहानी

पाँच वर्षीय मोहित आज काफ़ी देर से सो कर उठा था। किसी ने उसे जगाया ही नहीं था। घर का माहौल भी आज कुछ बदला हुआ सा था। चारों ओर अजीब सी ख़ामोशी भरी चहल- पहल छायी हुयी थी।

चाचा-चाची, मामा-मामी, बुआ-फूफा और जाने कितने रिश्तेदार घर में मौजूद थे। सबको देख कर मोहित का चेहरा खिल उठा किन्तु आज किसी ने भी उसे गोद में उठा कर प्यार नहीं किया। वह हेमन्त चाचा, विकास मामा या रीता मौसी जिसके पास भी गया उसने सिर्फ़ उसके बालों को सहला दिया और आगे बढ़ गये। किसी ने उससे बात नहीं की। ऐसा लग रहा था जैसे सभी बहुत व्यस्त हैं।

सभी का बदला व्यवहार और चेहरों पर छायी ख़ामोशी मोहित को अजीब सी लग रही थी। वह टहलता हुआ बाहर आया। वहाँ का भी माहौल बदला हुआ था। घर के बाहर सडक पर जहाँ तक दृष्टि जाती थी ऊँचे-ऊँचे तोरणद्वार बने हुये थे। आस-पास के मकानों को भी झंडियों से सजा दिया गया था।
मोहित को याद आया कि इससे मिलती-जुलती सजावट पिछले वर्ष हेमन्त चाचा की शादी में हुयी थी किन्तु आज तो किसी की शादी थी नहीं फिर इतनी सजावट क्यूँ? वो चाहकर भी अपने प्रश्न का उत्तर नहीं खोज पाया।

तभी उसे अपना 10 वर्षीय बड़ा भाई रोहित आता दिखायी पड़ा। भैया को ज़रूर सब मालूम होगा। मोहित ने सोचा और उनका हाथ पकड़ते हुये बोला, "भैया- भैया, ये सब सजावट किस लिये की गयी है?"

"आठ बजे की फ़्लाईट से हमारे पापा आ रहे हैं," रोहित ने गंभीर स्वर में बताया।

"कालगिल से?" मेाहित की आँखें ख़ुशीे से चमक उठीं। पापा के आने की ख़बर थी ही इतनी बड़ी।

"कालगिल से नहीं, कारगिल से," रोहित ने संशोधन किया।

"भैया, आज किसी की शादी है क्या?" मोहित ने रोहित के संशोधन पर ध्यान दिये बिना दूसरा प्रश्न किया।

"नहीं।"

"तो फिर इतनी सजावट क्यों की गई है? " मोहित की जिज्ञासा उसकी ख़ुशीे के ऊपर हावी होने लगी थी।

यह सुन रोहित के चेहरे पर विचलित होने के चिन्ह दिखायी पडने लगे। उसने आँख बंद करके कुछ सोचा फिर बोला, "किसी बड़े आदमी के आने पर भी ऐसी सजावट की जाती है।"

"तो क्या हमारे पापा बड़े आदमी हो गये हैं?" मोहित ने तत्काल प्रति-प्रश्न किया।

"हाँ।"

"सच?" मोहित का चेहरा ख़ुशीे और गर्व से चमक उठा।

"हाँ भाई, हमारे पापा बहुत बड़े आदमी हो गये है। इतने बड़े कि कोई उन्हें छू भी नहीं सकता," न चाहते हुये भी रोहित की आवाज़ भर्रा गई।

"लेकिन मैं तो उन्हें छुऊँगा भी और उनकी गोद में बैठ कर खेलूँगा भी," मोहित मचल उठा फिर रोहित का हाथ पकड़ मासूमियत से पलकें झपकाते हुये बोला, "भैया, पापा को घोड़ा बना कर उन पर सवारी करेगें। बहुत मज़ा आयेगा। मम्मी डाँटेंगी फिर भी नहीं उतरेगें।"

रोहित ने कोई उत्तर नहीं दिया तो मोहित ने उसका हाथ झिंझोडते हुये पूछा, "भैया, बताओ न, पापा के साथ खेलोगे या नहीं?"

"मोहित, अब हम पापा के साथ कभी नहीं खेल पायेगें," रोहित ने अपने स्वर को भरसक नियंत्रति करते हुये कहा।

"क्या तुम उनसे नाराज़ हो?" मोहित ने एक बार फिर मासूमियत से पलकें झपकायीं।

यह सुन रोहित अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख सका। उसका धैर्य समाप्त हो गया और वो मोहित को लिपटा कर फफक पड़ा, "मेरे भाई, हमारे पापा से तो कोई नाराज़ हो ही नहीं सकता। उनसे तो पूरा देश प्यार करता है।"

मोहित की समझ में ही नहीं आया कि भैया रो क्यूँ रहे है। वो कुछ कहने जा रहा था कि तभी दादा जी उधर से निकले। रोहित को रोता देख वे ठिठक कर रुक गये। अपनी काँपती आवाज़ को भरसक कड़ा कर उन्होंने रोहित के सिर पर हाथ फेरते हुये कहा, "तुम तो समझदार हो बेटा। ऐसे मौक़े पर रोया नहीं जाता है। मुझे अपने बेटे पर गर्व है। तुम्हें भी अपने पापा पर गर्व होना चाहिये।”

"दादा जी, मैं रो नहीं रहा था बल्कि मोहित को समझा रहा था," रोहित ने कमीज़ की आस्तीन से अपनी आँखें पोंछी फिर बोला, "मुझे भी अपने पापा पर गर्व है। देखियेगा उनका स्वागत सबसे पहले मैं ही करूँगा।"

"शाबाश बेटा!" दादा जी ने रोहित की पीठ थपथपायी फिर चश्मा उतार कर अपनी आँख पोंछने लगे। वे ऐसा प्रदर्शित कर रहे थे जैसे उनकी आँख में कुछ पड़ गया है लेकिन रोहित जानता था कि उसको समझाने वाले दादा जी खुद अपने आँसुओं को रोक नहीं पा रहे थे।

रोहित और दादा जी का वार्तालाप मोहित की समझ से परे था। चलो मम्मी से पूछा जाये। वे ज़रूर सब समझा देंगी। मोहित ने सोचा और फिर चुपचाप वहाँ से हट गया।

मम्मी को ढूँढ़ता-ढूँढ़ता वो बैठक कक्ष में पहुँचा। वहाँ का माहौल भी बदला हुआ था। सारा फ़र्नीचर हटा कर ्ज़मीन पर स्फ़ेद चादर बिछा दी गयी थी। मम्मी अनेकों औरतों से घिरी गुमसुम सी बैठीं थीं। उनकी आँखें शून्य में निहार रहीं थी। मम्मी को इस तरह ज़मीन पर बैठा देख मोहित को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने नारा्ज़गी भरे स्वर में कहा, "मम्मी, आप यहाँ बैठी है। पापा आने वाले हैं। चलिये उनके लिये अच्छी-अच्छी चीज़ें बनाईये वरना वे नाराज़ हो जायेंगें।"

यह सुन मम्मी को चेहरा काँप उठा। उनके होंठ थरथरा कर रह गये। ऐसा लग रहा था कि वे कुछ कहना चाह रही हैं किन्तु भावनाओं को स्वर दे पाने में असमर्थ थी।

"मोहित, चलो तुम्हें दूध पिला दें," तभी रीता मौसी ने स्थित सँभालने की कोशिश की।

"मैं तो अब पापा के हाथ से ही दूध पीऊँगा," मोहित ने अपना फ़ैसला सुना दिया।

"बेटा" मम्मी का स्वर काँप उठा। उन्होंने मोहित को खींच कर अपने सीने से लिपटा लिया।

मोहित को बड़ा अजीब सा लगा। पहले भैया ने उसे अपने गले से लिपटा लिया था। अब मम्मी भी ऐसा ही कर रही थीं। पता नहीं क्या बात है।

वो कुछ कहने जा रहा था कि तभी बाहर नारे सुनायी पडने लगे। ‘मेजर भवानी सिंह अमर रहें’, ‘देश का बेटा कैसा हो - मेजर भवानी सिंह जैसा हो’, ‘शेरे हिन्द भवानी सिंह की जय’।

शोर सुन मोहित मम्मी की गोद से निकल बाहर की ओर दौडा। भैया के स्कूल के बच्चे जुलूस की शक़्ल में नारे लगाते हुये उसके घर की ओर ही आ रहे थे। सभी ने अपने हाथों में तिरंगी झंडियाँ थाम रखी थीं। मोहित की समझ में ही नहीं आया कि सभी लोग उसके घर की तरफ क्यूँ आ रहे हैं और वे उसके पापा के ज़िंदाबाद के नारे क्यूँ लगा रहे हैं। इससे पहले उसने सिर्फ़ नेताओं के ज़िंदाबाद के नारे सुने थे।

आज मोहित के आश्चर्य का अंत न था। स्कूली बच्चों के जुलूस के पीछे शहर के लोगों की भीड़ उमड़ी चली आ रही थी। देखते ही देखते ‘मेजर भवानी सिंह - ज़िंदाबाद’ के नारों से आसमान गूँजने लगा। पूरी सड़क खचाखच भर गयी। कहीं तिल रखने की जगह नहीं बची थी।

मोहित आश्चर्यचकित सा सब देख रहा था। थोडी ही देर बाद मिलेट्री बैंड की धुन सुनायी पडने लगी। उपस्थित जनसमुदाय का उत्साह चरमोत्कर्ष पर पहुँचने लगा था। अमर सेनानी का स्वागत करने के लिये लोग बावले हुये जा रहे थे।

"मोहित, तुम्हारे पापा आ रहे हैं। चलो मैं तुम्हें छत से सब दिखाता हूँ," तभी रतन मौसा ने क़रीब आ मोहित को गोद में उठा लिया।

"नहीं मैं यहीं रहूँगा। पापा मुझे देखते ही गोद में उठा लेगें," मोहित उनकी गोद में मचल उठा।

"तुम यहा भीड़ में दब जाओगे। मेरे साथ छत पर चलो," रतन मौसा ने शांत स्वर में समझाया और उसे लेकर छत की ओर चल पड़े।

"मौसा जी, पापा दिखलायी क्यूँ नहीं पड़ रहे हैं " उसने छत पर पहूँच कर दूर-दूर तक दिख रहे विशाल जनसमुद्र पर दृष्टि दौड़ाते हुये पूछा।

"वेा देखो उस ट्रक में तुम्हारे पापा आ रहे हैं," मौसा ने उँगली उठाते हुये इशारा किया।

फूलों से लदे ट्रक में पापा को खोज पाने में मोहित की आँखें असमर्थ थीं। ट्रक के आगे सेना की सशस्त्र टुकड़ी और मिलेट्री का बैंड चल रहा था। सड़क के किनारे बने घरों से लोग ट्रक पर फूलों की बरसात कर रहे थे। किन्तु उस भीड़ में उसके पापा कहाँ थे? रतन मौसा के बार-बार के आश्वासन के बाद भी उसे दिखायी क्यूँ नहीं पड रहे? लाख कोशिश करने पर भी मोहित समझ न पाया।

शायद ट्रक क़रीब आने पर वो पापा को देख सके। मोहित ने स्वयं को सांत्वना दी। किन्तु यह ट्रक भी तो आज चींटी की चाल चल रहा था। वो झल्ला कर रह गया।

प्रतीक्षा की घड़ियाँ कितनी ही लम्बी क्यूँ न हों कभी न कभी ख़त्म अवश्य होती हैं। गगनभेदी नारों और फूलों की बरसात के बीच धीरे-धीरे चलता हुआ ट्रक आख़िर मोहित के बँगले के सामने आकर रुक गया। किन्तु अपने पापा अभी भी दिखलायी नहीं पड़े थे।

तभी औरतों की भीड़ में घिरी मम्मी और दादी दिखलायी पड़ीं। रोहित भैया भी वहीं खड़े थे। मम्मी अपने हाथों में पूजा की थाली लिये हुयीं थीं। दादी ने अपने काँपते हाथों से माचिस की तीली जलाकर थाली में रखे दीपक को जला दिया। मम्मी ने अपनी हथेली की ओट देकर दीपक की काँपती लौ को अच्छी तरह प्रज्जवलित हो जाने दिया फिर थाली रोहित भैया को पकड़ा दी।

रोहित भैया का हाथ काँप उठा। वो थाली को ठीक से सँभाल नहीं पा रहे थे। इससे पहले की थाली उनके हाथों से छूट जाती दादी ने आगे बढ़ कर उसे सँभाल लिया। मम्मी ने रोहित भैया की पीठ थपथपायी तो उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को उठा कर मम्मी की तरफ़ देखा। उनके होंठ थरथरा रहे थे। शायद वे कुछ कहना चाह रहे थे परन्तु कह नहीं पा रहे थे किन्तु उनकी आँखें बहुत कुछ कह रहीं थीं। मम्मी ने स्नेह से उनके सिर पर हाथ फेरा तो उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं फिर ते्ज़ी से पलट कर ट्रक के पीछे पहुँच गये। सेना के अधिकारियों ने उन्हें ट्रक पर चढ़ा दिया।

ट्रक के भीतर रोहित भैया किसी की आरती उतारने लगे, किन्तु वे किसकी आरती उतार रहे हैं मोहित को ठीक से दिखायी नहीं पड़ा। सिर्फ़ तिरंगे झंडे की एक झलक सी उसे दिखलायी पड़ रही थी। ज़रूर तिरंगे के भीतर भगवान होंगे क्योंकि आरती तो भगवान की ही उतारी जाती है।

"मौसा जी, क्या ट्रक के भीतर भगवान हैं?" उसने पूछा।

"हाँ बेटा, ट्रक के भीतर भगवान ही हैं," रतन मौसा ने शांत स्वर में बताया।

"आप जानते हैं कि भगवान कौन होता है?” मोहित ने अपनी बड़ी-बड़ी पलकों को झपकाते हुये दूसरा प्रश्न पूछा।

"हाँ बेटा, भगवान वो होता है जो हमारी रक्षा करता है। इस ट्रक के भीतर जो है उसने हमारी और हमारे देश की रक्षा की है इसलिये वो भगवान ही हुआ," बताते-बताते रतन मौसा फफक पड़े। उनका धैर्य समाप्त हो गया था और वे अपने को सँभाल नहीं पाये।

"मौसा जी, क्या आप हमसे ग़ुस्सा हो गये हैं?"

"नहीं तो।"

"तो फिर आप रो क्यूँ रहे हैं? क्या मैनें कोई ग़लत बात कह दी," मोहित सहम उठा।

"नहीं बेटा, ग़लत तुम नहीं बल्कि ये बेदर्द हैं जो ख़ुशी हो या ग़म हर जगह बिन बुलाये मेहमान की तरह चले आते हैं," रतन मौसा ने अपनी आँखें पोंछते हुये बताया।

इस बीच रोहित भैया ट्रक से नीचे उतर आये थे और सेना के अधिकारी ऊपर चढ़ गये थे। चार अधिकारियों ने अपने कंधो पर चारपाई जैसी कोई चीज़ उठा ली थी। उस पर तिरंगे झंडे में लिपटा हुआ कोई लेटा था। शायद भगवान की मूर्ति होगी। मोहित ने सोचा क्योंकि रोहित भैया उन्हीं की तो आरती उतार रहे थे।

सेना के अधिकारियों के ट्रक से नीचे उतरते ही जयघोष काफ़ी तेज़ हो गया था। तिरंगे झंडे में लिपटे भगवान के दर्शन करने के लिये लोग बावले हुये जा रहे थे, किन्तु सेना की सशस्त्र टुक्ड़ी ने उनके चारों ओर घेरा डाल दिया था।

सधे क़दमों से सेना के अधिकारी बँगले के भीतर आये। विशाल लान में सफ़ेद चादर से ढँके छोटे से मंच पर उन्होंने तिरंगे झंडे में लिपटे भगवान को सावधानी से लिटा दिया।

"अरे ये तो मेरे पापा हैं,” मोहित आश्चर्य से चौंक पड़ा। तिरंगे झंडे से पापा का गौरवमयी चेहरा बाहर झाँक रहा था। लेकिन पापा सो क्यूँ रहे हैं? उन्होंने तिरंगा क्यों ओढ़ रखा है? रतन मौसा तो बता रहे थे कि ट्रक के भीतर भगवान हैं। तो क्या पापा भगवान हो गये हैं? तमाम प्रश्न उसके दिमा्ग़ को मथने लगे।

उससे रहा नहीं गया, वो रतन मौसा की गोद से उतर तीर की तरह नीचे भागा। आँगन में काफ़ी भीड़ थी। भीड़ को चीर वह बहुत मुश्किलों से लान तक पहुँच पाया। वहाँ अब तक लम्बी पंक्ति बन चुकी थी। लोग बारी-बारी से उसके पापा के पैरों तक जाते। अपने हाथों में पकड़ी माला उन्हें अर्पित करते। उनके पैरों पर शीश नवाते फिर फौजी ढंग से सलाम करके आगे बढ़ जाते। सफ़ेद खादी पहने नेता, वर्दीधारी सेना के अधिकारी, सूट-बूट पहने बड़े आदमी और साधारण नागरिक सभी उस पंक्ति में खड़े हुये थे।

मोहित कुछ पलों तक कौतहूल पूर्वक वहाँ खड़ा इंतज़ार करता रहा कि शायद पापा उठ कर उसे अपनी गोद में बिठा लें। किन्तु जब पापा नहीं उठे तो उससे रहा नहीं गया। वह दौड़ कर उनके क़रीब पहुँचा और अपने नन्हे-नन्हे हाथों से उनके चेहरे को पकड़ते हुये बोला, "पापा, उठिये। मेरे साथ खेलिये।"

पापा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की तो वो उनके चेहरे को झिंझोड़ते हुये बोला, "पापा, मैं मोहित हूँ। आपका मोहित। आप मुझसे बोलते क्यूँ नहीं? क्या आप मुझसे नाराज़ हैं?"

पापा को चुप देख उसका धैर्य समाप्त होता जा रहा था। वो भर्राये स्वर में बोला, "पापा, उठिये मुझसे बातें करिये। मैं वादा करता हूँ कि अब मैं राजा बेटा बन जाऊँगा। मम्मी को कभी तंग नहीं करूँगा। समय से दूध पी लिया करूँगा और ख़ूब मन लगा कर पढ़ूँगा। प्लीज़ आप बस एक बार मुझसे बात कर लीजिये।"

सभी कर्तव्य विमूढ़ से हो गये। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि उस नन्हे से बालक को कैसे समझायें। तभी हेमन्त चाचा को कर्तव्य बोध हुआ। उन्होंने आगे बढ़ कर मोहित को गोद में उठा लिया, "बेटा, तुम्हारे पापा हम सब से बहुत दूर चले गये हैं। वे अब हम लोगों से कभी बात नहीं कर पायेंगे।"

"झूठ बोल रहें हैं आप," मोहित चीख पड़ा, "मेरे पापा कालगिल गये थे। मुझसे फोन पर कहा था कि वे अपनी गन से ढेर सारे दुश्मनों को मार गिरायेंगे और मेरे लिये ढेर सारे मेडल जीत कर लायेंगे। मेरे पापा कभी झूठ नहीं बोलते। वे मेरे लिये ढेर सारे मेडल ज़रूर जीत कर लाये होंगे। वे सो रहे हैं उठाईये उन्हें।"

"बेटा, तुम्हारे पापा ने झूठ नहीं कहा था। उन्होंने अकेले ही 20 दुश्मनों को मार गिराया था। उनकी वीरता की वजह से ही हमारे देश को एक महत्वपूर्ण विजय प्राप्त हुयी है। पूरे देश को उनके ऊपर गर्व है। उन्हें ढेर सारे मेडल भी मिलेंगे लेकिन....," हेमन्त चाचा का स्वर भर्रा उठा। वे चाह कर भी अपनी बात पूरी नहीं कर पाये।

"लेकिन क्या?" मोहित का स्वर गंभीर हो गया। वो अब कुछ सतर्क भी हो गया था।

"लेकिन भागते हुये दुश्मनों ने उनके सीने में गोली मार दी," हेमन्त चाचा फफक पड़े।

बात काफ़ी हद तक मोहित की समझ में आने लगी थी। हेमन्त चाचा की गोद से उतर कर उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी। सभी की आँखों से अश्रुधार बह रही थी। सिर्फ़ दादा-दादी, मम्मी और रोहित भैया अविचल खड़े थे। उन्होंने अपने होठों को सी रखा था। उनकी आँखों में एक ज्योति चमक रही थी।

सधे क़दमों से वो रोहित भैया के पास पहुँचा और उनका हाथ थाम काँपते स्वर में बोला, "भैया, क्या हमारे पापा मर गये?"

रोहित के होंठ एक बार फिर थरथरा कर रह गये। वह स्वीकृति की मुद्रा में सिर हिलाने जा ही रहा था कि मम्मी ने आगे बढ़ मोहित को अपने कलेजे से लिपटा लिया," न बेटा, न। शहीद कभी नहीं मरते। मातृभूमि के लिये प्राण न्योछावर कर वे हमेशा के लिये अमर हो जाते हैं। उनकी आत्मा देश के कण- कण में बस जाती है। तुम्हारे पापा हमेशा हमारे पास रहेगें। वे कभी हमसे दूर नहीं जा सकते। हमें उन पर गर्व है।"

"लेकिन फिर सभी लोग रो क्यूँ रहे हैं?" मोहित ने सहमते हुये पूछा।

"ये रो नहीं रहे हैं बल्कि अश्रुगंगा से तुम्हारे पापा के चरण कमलों को धो रहे हैं," दादा जी ने समझाया।

बड़ों का दर्शन भला उस मासूम की समझ में क्या आता। किन्तु वह अपने छोटे से अनुभव से काफ़ी कुछ समझ गया था। अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिये उसके पास शब्द रूपी यंत्र न थे। अतः मौक़ा देख कर चुपचाप वहाँ से खिसक लिया।

भीड़ को चाीरता हुआ वो अपने कमरे में पहुँचा। उसकी आँखों में वह दृश्य घूम रहा था जब पिछले महीने उसके जन्मदिन पर पापा उसके लिये मिलेट्री वाली ड्रेस लाये थे। उसे पहन कर जब वह उनके सामने आया था तो पापा ने ज़ोरदार सैल्यूट मारते हुये कहा था, "अरे वाह, मेरा बेटा तो अपने पापा की ही तरह फौजी बन गया। बड़ा होकर वो भी दुश्मनों को मार भगायेगा।’‘

घड़ी की सूइयाँ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहीं थी। बारह बज चुके थे। दो बजे पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ मेजर भवानी सिंह का अंतिम संस्कार किया जाना था। परिवार के सदस्य एक-एक करके उनके अंतिम दर्शन कर रहे थे। रोहित, उसकी मम्मी, दादाजी और दादी जी ने ग़ज़ब की दृढ़ता का परिचय दिया था। उनकी आँखों से आँसू का एक भी कतरा बाहर नहीं निकला था। वे कायरों की तरह रो कर शहीद की शहादत का अपमान नहीं करना चाहते थे।

"अरे, मोहित कहा हैं। बुलाओ उसे। वो भी अपने पापा के अंतिम दर्शन कर ले," तभी किसी शुभचिन्तक ने कहा।सभी की आँखें मोहित को खोजने लगी किन्तु वो वहाँ नहीं था। अचानक कुछ हलचल सी हुयी। सभी ने देखा वीर का बेटा वीरों की तरह मिलेट्री की वर्दी पहने सधे क़दमों से बाहर आ रहा था। उसकी चाल में ग़ज़ब की दृढ़ता थी और चेहरे पर भरपूर आत्मविश्वास झलक रहा था। उसे देखते ही भीड़ काई की तरह फटने लगी।

खुले ट्रक के पिछले हिस्से की ओर पहुँच कर जब उसने अपने नन्हे हाथों से पापा को सेल्यूट मार कर ‘जयहिंन्द’ कहा तो अनेकों सिसकारियाँ एक साथ गूँज उठीं।

"मेजर भवानी सिंह - अमर रहें’ के जयघोष से एक बार फिर आसमान गूँजने लगा। फूलों से सजा ट्रक अमर शहीद के पार्थिर्व शरीर को लेकर अंतिम यात्रा की ओर चल पड़ा।

दृष्टि से ओझल हो जाने तक मोहित अमर सेनानी को आख़िरी सलाम देने की मुद्रा में खड़ा रहा। उसके बाद मम्मी ने उसे उठा कर अपने कलेजे से लिपटा लिया। मोहित भी पूरी शक्ति से उनसे लिपट गया। दोनों एक-दूसरे को सहारा देने की कोशिश कर रहे थे।

अमर शहीद के जयघोष से आसमान अभी भी गूँज रहा था।


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