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ISSN 2292-9754

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12.02.2018


प्रेम-संदेश

 आकाश को निहारते मोर
सोच रहे, बादल भी इज़्ज़त वाले हो गए
बिन बुलाए बरसते नहीं
शायद बादल को
कड़कड़ाती बिजली डराती होगी
सौतन की तरह ।

बादल का दिल पत्थर का नहीं होता
प्रेम जागृत होता है
आकर्षक सुंदर, धरती के लिए
धरती पर आने को
तरसते बादल
तभी तो सावन में
पानी का प्रेम -संदेशा भेजते रहे
रिमझिम फुहारों से ।

धरती का रोम -रोम, संदेशा पाकर
हरियाली बन खड़े हो जाते
मोर पंखों को फैलाकर
स्वागत हेतु नाचने लगते
किंतु बादल चले जाते
बेवफ़ाई करके
छोड़ जाते हरियाली/ पानी की यादें
धरती पर
प्रेम संदेश के रूप में।


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