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ISSN 2292-9754

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11.30.2014


जीवन के कैनवास पर अनुभवों के गहरे रंग भरती ‘स्वर्ण सीपियाँ

समीक्ष्य पुस्तक - स्वर्ण सीपियाँ
कवयित्री - स्वर्णलता ठन्ना
आगमन प्रकाशन, मेरठ रोड़,
हापुड़- 245101 (उ.प्र.)
पृष्ठ संख्या - 112
प्रथम संस्करण - 2014, मूल्य-200

‘स्वर्ण-सीपियाँ’ युवा कवयित्री स्वर्णलता ठन्ना का काव्य संग्रह है। 75 कविताओं का संग्रह स्मृति पटल पर तरोताजा अहसास भर देता है। स्वर्ण सीपियाँ कुछ कविताओं का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त जीवन के अनुभवों का भंडार है। सीपियों में संगृहीत सुख-दुख, प्रेम और विश्वास, आत्माभिव्यक्ति की अमूल्य धरोहर है। यहाँ केवल कल्पना नहीं, बल्कि यथार्थ के धरातल पर प्रेरणा का स्रोत है, स्वछ जलराशि की बाढ़ है। सामाजिक-सांस्कृतिक और पौराणिक प्रसंगों की शिला है; जिस पर जीवन के अनुभव अंकित है। जो विपरीत परिस्थितियों में राहगीर का मार्ग प्रशस्त करती हैं और लक्ष्य प्राप्ति की आस बाँधती हैं। इन्हीं भावों से कविता का जन्म होता है- ‘घुमड़ते रहते हैं/कई विचार/मस्तिष्क में/लेते हैं आकर/परिस्थितियों के साथ।’

स्वर्णलता की कविताओं में यथार्थवादी प्रभाव स्पष्ट झलकता है। इन्होंने प्रकृति का मानवीकरण स्थापित कर नए प्रतीकों, बिम्बों एवं उपमानों को लेकर अपनी कविताओं में जीवन का एक नवीन उत्कर्ष उत्पन्न किया है। कविताओं में मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंधों को स्थापित कर अनुभवों की शृंखला तैयार की है। ‘आवरण’ कविता में इंद्रधनुष की छटा तो है ही भावनाओं के रत्न और कल्पनाओं के पुष्प संस्कार से सुगंधित और सुवासित होकर निर्मल मुस्कान बिखेर रहे हैं। वे कहती हैं- ‘झुठलाकर दुनिया के दस्तूर/निर्मित एक नया क्षितिज/एक भ्रम मात्र किन्तु/आप्लावित इंद्रधनुष के रंगों से।’

भूमंडलीकरण के इस दौर में प्रकृति से छेड़छाड़ को लेकर इनका नज़रिया पारदर्शी है और उनके विचार नैतिक मूल्यों के बारे में सोचने को विवश कर देते हैं। कवयित्री ने बारहमासों को लेकर प्रकृति और मनुष्य के बीच संबंधों को स्थापित कर कविताओं के माध्यम से सुंदर समन्वय किया है। वे ‘दिन की फसल’ कविता में कहती हैं- ‘समय काट रहा है/हाथ में हंसिया लेकर/दिनों की/सुबह की किरण में/जगमगाते लम्हें गेहूँ की सुनहरी/बालियों के समान/दिखाई देते हैं/और चलने लगता है/समय का हंसिया/उन पर...........।’

समय परिवर्तन का नियंता और कर्ता-धर्ता है। आज के दौर में व्यक्ति को अपने लिए, परिवार के लिए समय नहीं है, ऐसे में अन्य के लिए समय निकाले; इसका सोचा भी नहीं जा सकता है। कविता में इन्हीं संकीर्ण मानसिकता के विरुद्ध हुँकार है। कवियत्री ने अपनी कविताओं के माध्यम से समय को गुरु की संज्ञा दी है, जो मार्गदर्शन तो देते ही हैं साथ ही व्यक्ति विशेष में आत्मचिंतन एवं आत्मविश्लेषण की शक्ति भी भरने का कार्य करती है। वे ‘समय तुम संत हो क्या?’ कविता में कहती हैं- ‘त्रासदियों के साथ/हो जाता है वीरान/धरती का सब्जबाग/तब भी तुम/बने रहते हो/हमेशा की तरह/शांत, स्थिर और/अपने कार्य में दत्तचित्त/समय.........।’ यहाँ कवयित्री के जीवन में ‘समय का प्रवाह’ कालचक्र के फेर में कभी उदासी और निराशा, तो कभी मृत्यु-सा अहसास दिला जाती है इन्हीं विचारों के साथ वे ज़िंदगी में बदलाव लाकर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेती है। उनके सब्र का फल मोतियों में इस प्रकार मिलता है- ‘जल्द ही पहुँच जाती हूँ/अपने संजोये हुए/शब्दों के समीप/देखती हूँ/एक अजीब सा माहौल/चारों तरफ/मेरी रजत सीपियाँ/झिलमिला रही थी/स्वर्ण बनकर/और शब्द/शब्द तो बन चुके थे/उज्ज्वल मुक्ता।’ यही ‘स्वर्ण सीपियाँ’ कवयित्री की उपलब्धि है, जो अथक परिश्रम से प्राप्त हुई है।

कवयित्री ने अपने खट्टे-मीठे और गहरे अनुभवों को ज़िंदगी के कैनवास पर बखूबी उतारा है। वे साँझ को अपने नज़रिये से देखती है। सोलह शृंगार से परिपूर्ण साँझ पूर्ण यौवन लिए हैं और वे उनके साथ वार्तालाप करती हैं। सुख-दुख को बाँटती है। वे जीवन को प्रेम और प्रेम को जीवन मानती हैं और जी उठती हैं सावन के उल्लासित गीतों के सहारे; जो मन को सम्बल देते हैं। इतना ही नहीं वे प्रेम विहीन जीवन को किसी कारावास से कम नहीं मानती उनके अनुसार तो प्रेम अनंत जल राशि के समान है। जिसमें डूबकर ही इसकी थाह ली जा सकती है। वे प्रेम को स्वतंत्रता की उड़ान मानती हैं- ‘उतर आती हूँ/प्रेम के घाट पर/अनंत जल राशि में/उभरती हैं कई छवियाँ/जानी-अनजानी/कुछ सीढ़ियाँ....../कलरव के निनाद में/सुरीले स्वरों के साथ।’

सम्भावनाओं से भरी हुई युवा स्वर्णलता की कविता में आस्था और विश्वास के साथ तबले की थाप और सितार के तार से गूँजती कविता स्त्री अस्मिता की झलक दिखा देती है। ‘बाबुल’ कविता में ब्याही गई बेटी को पीहर की याद की शारीरिक और मानसिक स्थिति की दास्तान शब्दों के माध्यम से बयान करती नज़र आ रही है। वे ज़िंदगी की अधबुनी चादर निराशा और दुःख में उलझी-सी जान पड़ती है। आत्मविश्वास से भरे लहजे में अस्तित्व के रक्षार्थ वे कहती हैं- ‘मुस्कान के साथ/फैला लेती हूँ/अपनी अधबुनी/आधी चादर।’

कवयित्री यादों के गलियारे से निकलकर पगडंडी के सहारे जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है। ‘पगडंडी’ कविता में वे कहती हैं- ‘किसी भी परिस्थिति में/नहीं उगनी है/उस पर घास/क्योंकि/उसने झेला है/लक्ष्य की ओर/बढ़ने वाले/मुसाफिरों के/पद-प्रहार को।’ उनकी ज़िंदगी में एक पड़ाव ऐसा भी आया जब वे यादों के जंगल में भटककर खुशी के पल, ग़म के आँसू पीकर संवेदनाओं के गहरे समुद्र में गोते लगाती हुई प्रतीत होती है और जीवन के अंत को शब्दों की सार्थकता के साथ व्यक्त करते हुए कहती है- ‘उसके बाद/मुझे नहीं पता/मेरा क्या हुआ/किसने मुझे/पंचतत्वों में विलीन किया/मुझे नहीं पता.........।’

इनकी कविताओं में अपनो की तलाश में पूरा जीवन तलाशती दिखाई पड़ती है और अंत में वसंत रूपी खुशी पा ही लेती है- ‘अपनत्व की तलाश में/चलते चलते जब कभी/पहुँच जाती हूँ मैं/रिश्तों के जंगल में/तब आमद होती है/वसंत की।’ और आगे भी ‘तलाशा है जीवन’ कविता में वे कहती हैं- ‘मैंने तलाशा है जीवन/मालती चमेली गंध से/सराबोर मुस्कुराते फूलों/झीने पंखों की/सुकोमल चंचलता और/रस पीते भ्रमर की गूँज में...।’

कवयित्री ने लोक संस्कृति और पौराणिक पात्रों के माध्यम से सामाजिक ताने-बाने को समझने की कोशिश कर कविता को मूर्त रूप दिया है। भगवान श्रीकृष्ण को प्रेरणास्रोत और सृष्टि का आधार मानकर उन्होंने विपत्तियों का डटकर मुकाबला किया है। वे कहती हैं- ‘रस्मों-रिवाजों की/जटिल परिभाषाओं से/जब कभी मैं/सहम जाती हूँ/तुम्हारे श्लोकों का/एक-एक शब्द/सम्मोहित करता है मुझे/और मैं/रत हो जाती हूँ/अपने कर्म में।’ स्त्री और पुरुष के संयुक्त अस्तित्व को उजागर करती ‘अर्धत्व’ कविता शिव-पार्वती और चंद्रमा के अर्धसत्य के साक्ष्य की पैरवी करती दिखाई पड़ती है।

भाषा और शिल्प की दृष्टि से कविताओं में नए प्रयोग देखने को मिलते हैं। कविताओं में निहित संवेदना के कारण एक जुड़ाव-सा हो जाता है, जो आत्मीय अनुभूति प्रदान करती है। ‘वसंत’ कविता में प्रतीकों एवं बिम्बों का प्रयोग करके जीवन के लास्य और प्रकृति के सुन्दर और माधुर्य की महत्ता को गहरे अर्थों तक ले जाने की गंभीर कोशिश की गयी है- ‘अलकों पर फैली है/मकरंद की/मदराई गंध/लास्य की सौगात से भरा/अनहद नाद और/आस का पराग।’

कुछ अन्य कविताओं में नन्हें तलैया, मीठा संगीत, गीली मिट्टी की गंध, कजरारे बादल, सूखे ठूंठ, लम्हों के परिन्दें, सपनों की चादर, कंटीली झाड़ियाँ, गूंजते झींगुर और क्रीम, पाउडर, पार्लर इत्यादि प्राकृतिक बिम्बों एवं आधुनिक बोध का सुन्दर समन्वय किया गया है।

संग्रह में करीब दो दर्जन कविताएँ तुकांत भी हैं, जो ‘स्वर्ण सीपियाँ’ संकलन को सार्थकता प्रदान करती हैं।

संजय आटेड़िया
युवा कवि, शोधार्थी,
अतिथि व्याख्याता, शा. कन्या महाविद्यालय, रतलाम
107/2, अरिहंत परिसर,
रतलाम, मध्यप्रदेश-457001।
मोबाइल - 9827800145
ईमेल- atediyasanjay@gmail.com


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