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ISSN 2292-9754

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03.24.2015


असामाजिक परम्पराओं के प्रतिरोध के कवि: ओमप्रकाश वाल्मीकि
(कविता संग्रह ‘बस! बहुत हो चुका’ के विशेष संदर्भ में)

संस्कृति समाज की प्रतिबिंब होती है। इसी नाते समाज सांस्कृतिक परिदृश्य को पोषित भी करता है। जिस समाज की वैचारिक स्थिति सुदृढ़ होती है संभवतः वहाँ की संस्कृति भी विविधता लिए होगी। मौलिक चिंतन और नैतिक मूल्यों की कसौटी पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रिया-कलाप बहुरंगी छाप छोड़ते हैं। ‘भारतीय समाज जिन तत्वों के ताने-बाने से निर्मित हुआ है, उनमें वर्णों और जातियों का विशिष्ट स्थान है।‘1 आज भी समाज में विद्यमान सामाजिक कुरीतियों को लेकर अनेक अव्यवस्थित परम्पराओं का निर्वाह किया जा रहा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि अपने कविता संग्रह ‘बस! बहुत हो चुका‘ में सामाजिक ताने-बाने एवं सांस्कृतिक परिदृश्य को लेकर तीखे स्वर में अपनी बात कहते हैं। उनके अनुभव के शब्द सोचने पर विवश कर देते हैं। कविताओं के माध्यम से उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य को लेकर जो बातें कही हैं, वे सच्ची हैं और उनको फाँस की तरह चुभने वाली लगती हैं जो धर्म के ठेकेदार हैं। जो धर्म के नाम पर अंधविश्वास, पशु बलि, जन्म-मरण के चक्कर में पड़कर यज्ञ की औपचारिकताओं को अपने जीवन को सार्थक मानते हैं। कविताओं में उनके शब्द बोलते ही नहीं वरन् बहुत कुछ बयान कर देते हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके स्वर विद्रोही है। ऐसा लगता है मानो वे अंधविश्वासियों से लोहा ले रहे हैं। वर्ण व्यवस्था के बंधनों ने सदियों से दलितों में हीन भावनाओं को भरा है। धर्म और संस्कृति की आड़ में साहित्य ने भी कहीं न कहीं इस भावना की नींव सुदृढ़ की है। ’शायद आप जानते हों’ कविता में वे कहते हैं कि ‘यज्ञों में पशुओं की बलि चढ़ाना/किस संस्कृति के प्रतीक हैं/मैं नहीं जानता/शायद आप जानते हों।’2 सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के दरमियान कवि वाल्मीकि के तेवर फूट पड़े हैं उन पर जो स्वांग रचते-फिरते हैं, जो भोली जनता को धर्म के नाम पर दिग्भ्रमित करते रहते हैं। ‘कभी सोचा है’ कविता में वे लिखते है कि ‘वर्ण-व्यवस्था को तुम कहते हो आदर्श/खुश हो जाते हो/साम्यवाद की हार पर/जब टूटता है रूस/तो तुम्हारा सीना 36 हो जाता है/क्योंकि मार्क्सवादियों ने/छिनाल बना दिया है/तुम्हारी संस्कृति को।‘3 इसके आगे ‘रुँधे हुए शब्द‘ कविता में वे कहते हैं-‘मुर्दा संस्कृति की लाश पर/मंडराती चील मनाएगी/जिनके पंखों के साये में/संस्कृति का तकिया बनाकर/शिकारगाह में अधलेट/आदमखोर/निकाल रहा है/दांत में फंसे मांस के रेशे/नुकीले खंजर से।’4 पीढ़ियों से चली आ रही दलितों की दासता पर भी उन्होंने अपने पूर्वजों को खूब कोसा। जब उनकी अपने परिवार को ज़रूरत रही तब वे लोगों की गुलामी करते रहे, अपने बीवी-बच्चों की अनदेखी करते रहे और तो और वे मूकबधिर बनकर तमाशा देखते रहे। ‘मुट्ठीभर चावल’ कविता में वे कहते हैं कि ‘बस्तियों से खदेड़े गये/ओ, मेरे पुरखो/तुम चुप रहे उन रातों में/जब तुम्हें प्रेम करना था/आलिंगन में बांधकर,/अपनी पत्नियों को।’5

वाल्मीकि के अनुसार आर्थिक तंगी, तमाम दुखों, संत्रास और संतप्त से भरे दलित परिवार के सभी सदस्य यहाँ तक की बच्चे भी अभावों के बीच पले-बढ़ें। खानपान और रहन-सहन के विलासी साधनों से दूर रहकर अपने आपको संबल देते हुए ‘बाहर आयेंगे एक दिन’ कविता में वे कहते हैं कि ‘नहीं मिला दूध उसे/सफेद-काली गाय का/नहीं खाया उसने/दही और मक्खन कभी/नहीं सोया गद्देदार बिस्तर पर।’6 और आगे भी ‘ये भूखे प्यासे बच्चे/बाहर आयेंगे एक दिन/बन्द अंधेरी कोठरियों से/कच्ची माटी की गन्ध/सांसों में भरकर!7 वे इस तरह की स्थिति के ज़िम्मेदार उन शोषकों को मानते हैं, जो लाचारी का फायदा उठने की कोई कसर नहीं छोड़ते हैं और यही से सामाजिक विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं। यहाँ एकमात्र शोषक ही है, जो ऊँच-नीच की खाई को बढ़ाते नज़र आते हैं। वाल्मीकि कविताओं के माध्यम से कामगार मजदूरों के भूखे अकुलाते बच्चों की दयनीय स्थिति की पैरवी करते हैं और धर्मात्माओं को भी खुली चुनौती देते हुए कहते हैं कि ‘क्यों लगता है हमेशा/परायापन तुम्हारी संस्कृति से/क्यों उद्वेलित नहीं करते/तुम्हारे अमूर्त भाव/क्यों नहीं जगाती आस्था/देवों की पाषाण मूर्तियाँ/जो गढ़ी हैं मैंनें ही/छेनी-हथौड़े के सधे वार से।’8

सामाजिक स्थिति को संतुलित बनाए रखने के लिए अन्याय के प्रति तीव्र स्वर में अपनी बात रखना स्वतंत्रता का द्योतक है। एक से भले दो और अनगिनत स्वर एकाकार होकर न्याय की आस लगाए तो बेशक विश्वास के शब्दों की जीत निश्चित है। ‘आदिम रूप’ कविता मे वे कहते हैं कि ‘शब्द! तुम्हें कसम है/एक न एक दिन तुम/उतरोगे पृथ्वी पर/धूप बनकर!’’9 अगर आपमें विद्रोह है तो लोग निश्चित ही आपको एक समय के बाद सम्मान करेंगे। यहाँ विद्रोह से आशय आत्मविश्वासी, जुनूनी व्यक्तित्व, थोड़े में अधिक करने की क्षमता से है। यही से आपकी सामाजिक स्थिति प्रबल होती है। ये सारी बातें वाल्मीकि के अनुभव की है। उन्होंने समाज में रहकर जो अनुभव किया है, उन्हीं को कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति कर एक सामान्य जनता में नव चेतना का संचार किया है।

अंधविश्वास को लेकर उनका नज़रिया एकदम साफ है। ‘पंडित का चेहरा’ कविता में वे कहते हैं कि ‘शब्द कभी झूठ नहीं बोलते/झूठ बोलते हैं उनके अर्थ/अर्थ: जिसे बदल लेता था गाँव का पंडित/दक्षिणा की राशि देखकर।‘10 शारीरिक और मानसिक कष्टों के बीच यातनाओं-यंत्रणाओं की तुलना करते हुए ‘यातना’ कविता में कहते हैं कि ‘शारीरिक यातनाओं से/बड़ी यंत्रणा होती है-/इच्छाओं के विरुद्ध जीना/या देखते-देखते छिन जाना/उन क्षणों का/जिनसे हंसा जा सकता था/गुनगुनाया जा सकता था/हवाओं की तरह।’11 इच्छाएँ मनुष्य की सोच बदलती है। और एक सकारात्मक सोच सामाजिक स्थिति सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वाल्मीकि की कविताओं में ये सारी बातें कहीं न कहीं मनुष्य की सोच को सकारात्मक करने के साथ विकसित भी करती है।

वाल्मीकि की कविताओं में सच्चाई है। कविताओं के माध्यम से उनकी सच्चाई समाज कल्याण की भावना से ओतप्रोत है। सत्य तो समाज कल्याण का प्रेरक होता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है कि ‘सत्य वह नहीं जो मुख से बोला जाता है, सत्य तो वह है, जो मनुष्य के आन्तरिक कल्याण के लिए किया जाता है।’ एक ऐसा ही प्रेरक कार्य वाल्मीकि ने किया है। दूध का दूध और पानी का पानी सिद्धांत से कुछ लोगों के भयभीत होने से वे लिखते हैं कि ‘मैं चाहता हूं/शब्द चुप्पी तोड़ें/सच को सच/झूठ को झूठ कहे!’12 इसी क्रम में आयरिस साहित्यकार ऑस्कर वाइल्ड कहते हैं कि ‘मुझे सुबूतों से नफरत है क्योंकि कभी-कभी सच के भी सुबूत मिल जाते हैं।’ हम देखते हैं कि वाल्मीकि की कविता में शब्द सत्य की पुष्टि करते हैं, और जीवन को नई दिशा देने का काम करते दिखाई पड़ते हैं।

सच्चाई समाज की बुनियाद होती है। झूठ और फरेब के इस दौर में मनुष्य सदियों से रौंदा जा रहा है। सच को दबाने के लिए ही तो हिंसा होती रही है। भूत, वर्तमान और भविष्य में हिंसा का अर्थ, कारण और दूरगामी परिणाम को वाल्मीकि ने ‘हिंसा का अर्थ’ कविता में कहा है कि ‘अतीत से वर्तमान के बीच/चीखों की अनुगूंज/नहीं लिखी गयी दस्तावेज की तरह/जो समझा सके/हिंसा का सही-सही अर्थ।’13 और आगे वे लिखते हैं, ‘क्षितिज के पास काला धुंआ/लाल रक्त की तरह/दमक रहा है/हिंसा का सही-सही अर्थ।14 इसी तरह ‘सत्य की परिभाषा’ कविता में वे कहते हैं कि ‘कैद कर रखा है तुमने तहखानों में/संस्कृति को/मैं पूछता हूं-/‘संस्कृति क्या तुम्हारी रखैल है?’15

सामाजिक वातावरण किसी भी मनुष्य के नैतिक एवं अनैतिक कृत्यों का कारक होता है। मनुष्य के अंतर्मन में घृणा एक मनोविकार के साथ ही स्वाभाविक प्रवृत्ति भी है। प्रेम की पराकाष्टा किसी व्यक्ति विशेष के आंतरिक भावों को प्रकट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि का मानना था कि अमीरी-गरीबी के बीच हमेशा घृणा ही रही है। प्रेम के बोल कहीं आसपास फटकते नहीं दिखते हैं। जहाँ घृणा मनोविकार है वहाँ प्रेम मनोभाव है। घृणा और प्रेम मनुष्य की स्वभावगत प्रवृत्ति है। जहाँ प्रेम है वहाँ घृणा नहीं टिकती और जहाँ घृणा है वहाँ प्रेम नहीं टिकता। प्रेम में ऐसी शक्ति है जो घृणा रूपी बर्फ को पिघला सकती है। वाल्मीकि ‘घृणा और प्रेम कहाँ से शुरू होती हैं?’ कविता में कहते हैं कि ‘याद करो,/उस मां का चेहरा/जिसका बेटा सरेआम पीटा गया/निर्ममता से/जिससे चाहा था करना दोस्ती/जंगल के फूलों/और नदी की लहरों से।’16

जिज्ञासा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। या यूँ कहें कि मनुष्य एक जिज्ञासु प्राणी है। जिज्ञासा से ही किसी व्यक्ति विशेष का चरित्र एवं व्यक्तित्व विकास होता है। अनुभव तो वर्षों का होता है, इसे हम एक-दो वर्षों में नहीं बाँध सकते हैं। अनुभव चाहे अच्छे हो या बुरे, वह सीख देते हैं, भविष्य की उड़ान को मूर्त रूप देते हैं। परिस्थितियाँ सहनशीलता का पाठ पढ़ा देती है और वह भी एक निश्चित कालखंड में। वाल्मीकि ‘सोचने नहीं देते’ कविता में लिखते हैं कि ‘चाय घरों में बैठकर/जब करते हो दार्शनिक विवेचन/समाज व्यवस्था का,/मुझे याद आते हैं बचपन के दिन/जब प्यास लगने पर/खड़ा रहना पड़ता था घंटों/किसी कुएं या नल के पास।’17 और आगे ‘जाति’ कविता में वे कहते हैं कि ‘स्वीकार्य नहीं मुझे/जाना/मृत्यु के बाद/तुम्हारे स्वर्ग में/वहाँ भी तुम/पहचानोगे मुझे/मेरी जाति से।’18 समाज सेवा किसी भी रूप में की जा सकती है। इसलिए सामाजिक स्थिति को भी कद में नापा जा सकता है। दलित वर्ग सामाजिक और सांस्कृतिक पाटों के बीच सदियों से पिसता चला आ रहा है। असामाजिक परम्पराओं के विरुद्ध वाल्मीकि ने अपनी कविता में कहा है कि ‘बस! बहुत हो चुका/चुप रहना/निरर्थक पड़े पत्थर/अब काम आयेंगे सन्तप्त जनों के।‘19

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता स्याह रात्रि में पूर्णिमा का चाँद है, गुफा में जलती मशाल है, मन के भीतर प्रज्वलित एक आत्मविश्वास की आस है। उनकी कविता सिर्फ कविता न होकर यथार्थ के धरातल पर सत्य की खोज है, असत्य पर सत्य की विजय का उद्घोष है। वे कहते हैं कि ‘कविता की चुप्पी/बहुत सर्द होती है/आधी रात में भी गूंजती है/चौकीदार की सीटी की तरह/जो हमारी नींद में भी/देती है पहरा/हमारे ख्वाबों का!’20 दीपक प्रकाश त्यागी वाल्मीकि की कविताओं के बारे में कहते हैं कि ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित आंदोलन के ध्वजवाहक होते हुए भी पूरी मनुष्यता के कवि है। आगे वे लिखते हैं कि ‘चूंकि वाल्मीकि के लिए सर्जना का आशय सामाजिक है, कला, आनंद का विषय नहीं, बल्कि वह मनुष्य की स्वाधीनता के लिए एक अस्त्र और शस्त्र की तरह है। इसलिए वाल्मीकि के यहाँ कविता सिर्फ कविता नहीं, एक नए साहित्यशास्त्र की रचनात्मक और वैचारिक ज़मीन भी है, जहाँ विद्रोह और क्रांति का सृजन उसका मुख्य धर्म है।’21 वाल्मीकि कविताओं में दलित यथार्थ के पक्ष में गंगा सहाय मीणा कहते हैं कि ‘उनकी कविताएँ जहाँ सुदूर अतीत में जाकर मिथकों से मुठभेड़ करते हुए उनको दलित नज़रिए से खोलती हैं, वहीं वर्तमान के बदलते दलित यथार्थ से संवाद करती हैं।’22

वाल्मीकि खुद स्वीकार करते हैं कि ‘दलित चेतना एक प्रति सांस्कृतिक चेतना है, बल्कि एक वैकल्पिक चेतना भी है। इसलिए विद्रोही है। इस चेतना की जड़ में भारतीय सामाजिक संरचना है, जो न सिर्फ जाति पर आधारित है, बल्कि इसे धार्मिक वैधता भी प्रदान करती है। जाति व्यवस्था सामाजिक दुराव के सिद्धांत पर आधारित है। यह हमारे सामाजिक संबंधों को ही नहीं बल्कि धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक पक्षों को भी प्रभावित करती है।’23 वाल्मीकि की कविताओं में सामाजिक-सांस्कृतिक स्वर सही अर्थों में मानवीय संवेदनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो वर्ण व्यवस्था के तिलस्म को तोड़ते दिखाई पड़ते हैं।

संदर्भ:

1. संपादक-डॉ. नगेन्द्र, सह-संपादक डॉ. हरदयाल, हिंदी साहित्य का इतिहास, परिवर्द्धित संस्करण-2009, मयूर पेपरबैक्स, नौएडा, पृष्ठ-88.
2. ओमप्रकाश वाल्मीकि, बस! बहुत हो चुका, प्रथम संस्करण-1997, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-12.
3. वही, पृष्ठ-50.
4. वही, पृष्ठ-42.
5. वही, पृष्ठ-14.
6. वही, पृष्ठ-20.
7. वही, पृष्ठ-21.
8. वही, पृष्ठ-52.
9. वही, पृष्ठ-52.
10. वही, पृष्ठ-32.
11. वही, पृष्ठ-34.
12. वही, पृष्ठ-49.
13. वही, पृष्ठ-36.
14. वही, पृष्ठ-37.
15. वही, पृष्ठ-102.
16. वही, पृष्ठ-42.
17. वही, पृष्ठ-56.
18. वही, पृष्ठ-78.
19. वही, पृष्ठ-80.
20. वही, पृष्ठ-72.
21. दीपक प्रकाश त्यागी, पुस्तकालय-शब्द की तपिश, जनसत्ता, नई दिल्ली, 4 नवंबर 2012, पृष्ठ-06
22. गंगा सहाय मीणा, स्मृति शेष-समता के सरोकार, जनसत्ता, नई दिल्ली, 24 नवंबर 2013.
23. ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित चेतना और हिंदी कथा साहित्य, लेख-समकालीन जनमत, पृष्ठ-52-53.

-शोधार्थी, हिन्दी विभाग
शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय,
रतलाम, मध्यप्रदेश
मोबाइल- 09827800145
ईमेल- atediyasanjay@gmail.com


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