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ISSN 2292-9754

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09.22.2017


विदेशों में हिंदी साहित्य: सृजनात्मकता के विविध आयाम

निकले गुलशन से तो गुलशन को बहुत याद किया
धूप को, छाँव को, आँगन को बहुत याद किया।
ज़िक्र छेड़ा कभी सखियों ने झूलों का यहाँ
मैंने परदेस में सावन को बहुत याद किया।
जिसके साये में मुझे चैन से नींद आती थी
मैंने अय माँ तेरे आँचल को बहुत याद किया।

इन पंक्तियों से यह स्पष्ट होता है कि सुदूर विदेशों में बसे रचनाकारों का मन आज भी अपने देश में बसा हुआ है। अपनी मिट्टी, अपनी जन्मभूमि, मातृभाषा के लगाव तथा अलगाव को अलग-अलग प्रवासी रचनाकारों ने अपने भाव-बोध के अनुरूप अभिव्यक्ति दी है। ये प्रवासी लेखक आधुनिक भारतीय समाज के हिस्से हैं, जहाँ अपने विकासमान व्यक्तित्व के साथ एक नए भविष्य के उत्ताल की आकांक्षा लिए वे विदेशों में जा बसे। अपने समाज की धरती से नितांत भिन्न नए प्रकार की सुख-सुविधाओं के बीच अस्मिता के सवाल समय-समय पर उन्हें उद्वेलित करते हैं और “तन के सौ सुख सौ सुविधा में मेरा मन बनवास दिया सा” को शिद्दत से महसूस करते हैं। उनकी कहानियों, कविताओं, उपन्यासों में यह वनवास की छटपटाहट है और सांस्कृतिक द्वंद्व का कहीं स्वीकार्य है तो कहीं विस्फोट। साथ ही इनके मन में एक नयी संवेदना, एक नयी जीवन-दृष्टि, एक नयी चेतना एवं जीवन की नयी कसौटी से परिपूर्ण साहित्य की सृष्टि का संकल्प है और ऐसा प्रवासी साहित्य एक नया बिम्ब लेकर आता है।

चिर-परिचित संवेदनशील शैली में लिखे इन प्रवासी रचनाकारों के साहित्य के भीतर से झाँकती मानसिकता आज भी अपनी देसी पहचान नहीं खो पाई है। चारों तरफ़ फैला जीवन अपने समूचे आकर्षण-विकर्षण के बावजूद है तो विदेशी ही। देशी और विदेशी के बीच लगातार होता संवाद इन रचनाकारों की रचनाओं का प्रमुख आकर्षण है। सुदूर विदेशों में बैठे ये भारतीय रचनाकार चाहे कविताओं-कहानियों-उपन्यासों के ताने-बाने बुनें, चाहे अपने समूचे व्यक्तित्व को साथ लिए दिए विदेश-भ्रमण करें, पाठक भूल ही नहीं सकता कि इनके पीछे से झाँकता मन है जो ठेठ भारतीय है। प्रवासी मन के इन्ही मधुर-तिक्त अनुभवों की दास्तान है इनकी रचनाएँ जो पाठक को बहुत गहराई तक उद्वेलित करती हैं। प्रवासी लेखकों ने भले ही अपनी कर्मभूमि बदली हो किन्तु चिंतनभूमि तो वही है। आदमी प्रवासी होता है, साहित्य नहीं। देश–विदेश के बीच एक नयी उड़ान भरता प्रवासी साहित्य हर बदलती विचारधारा के परिवर्तित मूल्यों से परिचित करा रहा है। अपने विचार निर्भीकता से, स्पष्टता से और प्रामाणिकता से व्यक्त करके यथार्थ की परिधि में प्रवेश पाता है।

प्रवासी साहित्यकार भारतीय मूल के वे निवासी हैं जो कारण अकारण विदेश में बसे हुए हैं और जिनके अंतरतम में भारतीय जीवन और संस्कृति बसी हुयी है जिन्हें वे अपनी सृजनात्मकता के आधार पर अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। प्रवासी साहित्यकारों ने अपनी रचना शक्ति द्वारा अपनी भाषा और संस्कृति को युग और काल के साथ-साथ कलमबद्ध किया है। ऐतिहासिक सन्दर्भ में इन्होंने बदलते परिवेश में भिन्न-भिन्न पहलुओं को रेखांकित किया है। परिपक्व चिंतन द्वारा सामाजिक परिवर्तन की मर्मस्पर्शी समस्याएँ और उनके समाधान का साक्षात्कार किया है। आज विश्व के 46 से अधिक देशों में हिंदी भाषा का अध्ययन-अध्यापन होता है, लेकिन इन सभी देशों में हिंदी में साहित्य की रचना नहीं होती है। भारतेत्तर देशों में रचे जाने वाले हिंदी साहित्य को कमलकिशोर गोयनका1 ने निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है:

1. भारत से गिरमिटिया मजदूर बनकर जाने वाले देशों में रचा हिंदी साहित्य : इन देशों में मॉरिशस, फ़िजी, सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड एण्ड टुबेगो आदि

2. भारत के पड़ोसी देशों में भारतवंशियों द्वारा रचा हिंदी साहित्य : नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका एवं म्यांमार (बर्मा) आदि

3. विश्व के अन्य महाद्वीपों के देशों में रचा हिंदी साहित्य :

I. अमेरिका महाद्वीप : संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कनाडा, मैक्सिको, क्यूबा

II. यूरोप महाद्वीप : रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रान्स, बेल्जियम, होलैंड, नीदरर्लैंड, आस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड, इटली, पोलैंड, चेक, हंगरी, रोमानिया, बल्गारिया, उक्रेन तथा क्रोशिया

III. अफ्रीका महाद्वीप : दक्षिणी अफ्रीका, टी-यूनियन द्वीप

IV. एशिया महाद्वीप : चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान, ताजिकस्तान, तुर्की, थाईलैंड

V. ऑस्ट्रेलिया : ऑस्ट्रेलिया

अतः स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य का सृजन आज न केवल भारत में अपितु वैश्विक स्तर पर विपुल मात्रा में हो रहा है। यह सृजनात्मक साहित्य भाषा के रूप में हिंदी की विश्व यात्रा को मज़बूत आधार प्रदान कर रहा है। यह साहित्य न सिर्फ़ मात्रा में अपितु स्तरीयता में भी उल्लेखनीय है। इन विविध देशों के लेखक अपने-अपने देशों में पैदा हुए हैं, अतः उनमें अपने पूर्वजों जैसी प्रवास पीड़ा नहीं है, बस उनमें अपनी जड़ों की तलाश है। अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों के लेखकों की परिस्थितियाँ, दृष्टि तथा सृष्टि मॉरिशस-फीजी आदि के लेखकों से नितांत भिन्न है। ये भारतीय लोग स्वेच्छा से विदेश गए हैं तथा एक बेहतर शिक्षा और बेहतर भौतिक जीवन का सपना लेकर गए हैं, लेकिन वे वहाँ की संस्कृति तथा समाज के बीच रहकर न तो अमेरिकन या ब्रिटिश बन पाते हैं और न पूरी तरह भारतीय ही रह पाते हैं। अमेरिका-इंग्लैंड आदि देशों में रहने वाले भारतीय पश्चिम एवं पूर्व की दो संस्कृतियों के बीच जीते हैं। अतः इनके साहित्य में पूर्व और पश्चिम के संपर्क एवं द्वंद्व के के साथ प्रायः पश्चिम के प्रभुत्व एवं श्रेष्ठता के अहंकार से लेखकों के मन में एक नयी संवेदना उभरती है। अन्य देशों के प्रवासी हिंदी साहित्य में प्रवासी जीवन की पीड़ा, अकेलापन-अजनबीपन की छटपटाहट, दरकते पारिवारिक संबंध, भूमंडलीकरण, उपभोक्तावाद आदि को देखा जा सकता है। प्रवासी हिंदी साहित्य का अपना रूप-रंग है, उसकी अपनी अस्मिता है तथा अपना वैशिष्ट्य है। उसकी हिंदी भाषा तथा भारत-बोध उसे हिंदी की मुख्यधारा का अंग बनाता तो है किन्तु उसे समरूप नहीं बनाता। हिंदी का प्रवासी साहित्य हिंदी का ही अंग है, परन्तु हिंदी साहित्य का अंग होकर भी वह अपने देश और परिवेश का भी साहित्य है।

पिछले दो-तीन दशकों से पाश्चात्य देशों में दो भिन्न लेखन प्रक्रिया वाले लेखक उभरे हैं। एक तो वे जो भारत से प्रतिष्ठित होकर आते हैं, जिनकी लेखन शैली भारतीय मानकों से परिचालित और परिपक्व होकर आती है, जिनका लेखकीय संसार भारत की साहित्यिक प्रवृत्तियों, वादों, खेमों और पत्र-पत्रिकाओं के ट्रेंड से कुछ हद तक प्रभावित है। दूसरे विदेशों में रहने वाले वे हिंदी लेखक जो इन प्रवृत्तियों से अन्जान मात्र अपनी आतंरिक छटपटाहट के कारण लिखते हैं। ये लोग सिर्फ़ आत्मसुख के लिए अपने अनुभव पर आधारित हिंदी लेखन कर रहे हैं। इन लेखकों के कथ्य के कथ्य, शैली और भाषा में न तो आडम्बर है और न ही कोई दार्शनिक बोझ है, केवल अनुभव की गहराई है। इन लेखकों में भारतीय मानकों से परिचालित पूर्वाग्रह नहीं है। ये लेखक भारतीय समाज के साथ व्यवस्था पसंद पाश्चात्य समाज के गुणग्राहक भी हैं।

हिंदी प्रवासी साहित्यकारों ने अपनी रचना शक्ति द्वारा अपनी भाषा और संस्कृति को युग और काल के साथ-साथ कलमबद्ध किया है। ऐतिहासिक संदर्भ में इन्होने बदलते परिवेश में भिन्न-भिन्न पहलुओं को रेखांकित किया है। परिपक्व चिंतन द्वारा सामाजिक परिवर्तन की मर्मस्पर्शी समस्याएँ और उनके समाधान का साक्षात्कार किया है। हृदय-मस्तिष्क में बसी स्मृतियाँ कभी नोस्टेल्जिक तो कभी दोनों देशों की तुलना में संलग्न रहती हैं। अमेरिका के कवि सुरेन्द्रनाथ तिवारी ने अपनी कविता ‘आओ लौट चलें अब घर को’ में लिखा है – उस आंगन की तुलसी ने ही हमको संस्कार सिखाए, अर्घ्य सिखाया, मन्त्र सिखाए और सिखाई वेद ऋचाएँ। कर्मस्थली के अनुभव और जन्म स्थान की सांस्कृतिक जड़ें प्रवासी रचनाकारों की रचनाओं में उभारना स्वाभाविक है। अख़बारों की सुर्ख़ियों में प्रवासी भारतीयों के संघर्ष, अमेरिका में आई.टी. की बेरोज़गारी, ब्रिटेन में डॉक्टरों का रोज़गार वीसा प्रतिबन्ध, ऑस्ट्रेलिया में विद्यार्थियों पर हमले, एअरपोर्ट सिक्योरिटी विषय, मानवीय सम्बन्ध, राजनीतिक और पारिवारिक बदलाव, बदलते रिश्ते इत्यादि साहित्यकारों की रचनाओं को प्रेरित करते हैं। प्रविसी हिंदी साहित्य में भारतीय संस्कृति का मोहपाश अनेक रूपों में सामने आता है। चिंतन और गहन विषयों का आदान-प्रदान मानसिकता का पर गहरा असर छोड़ता है।

ग्लोबलाइज़ेशन के युग में प्रवासी साहित्य केवल निर्मूल, व्यथा, वेदना, अतीत की ललक और गिरमिटिया मज़दूरों को देश से बोरिया-बिस्तर समेटने के द्वंद्व का साहित्य नहीं है। बल्कि इसके सृजनात्मक उद्देश्य का आकाशवृत्त और क्षितिज विस्तृत हुआ है। अब साहित्यकार नि:संकोच अपने आस-पास घटित यथार्थ या काल्पनिक अनुभव, सोसायटी में घुलना-मिलना, पासपोर्ट और नेशनलिटी का बदलना, अर्थकेन्द्रित विविध विषयों और दैनिक जीवन चर्या के संघर्ष को समाज में जागरूकता लाने के लिए विभिन्न पहलुओं के पन्ने उलटने का दंभ रखते हैं। प्रवासी जीवन, बदलते रिश्ते, स्वास्थ्य, शिक्षा, वृद्धावस्था और बेकारी आदि के संदर्भ में प्रशासन द्वारा निर्धारित योजनाओं की समस्याएँ और समाधान निकालने की क्षमता दर्शाते हैं। तकनीकी आविष्कार, इन्टरनेट, वेब और ब्लोग्स के कारण प्रवासी रचनाकारों की रचनाएँ तेज़ी से अधिकांश पाठकों के घरों में पहुँच जाती हैं और भारत के हिंदी साहित्यकारों को विश्व के अन्य देशों के साथ सामूहिक रूप से सम्मिलित करते हैं।

साहित्य में जीवन आता है अतः प्रवासी साहित्य में भी प्रवासी जीवन आएगा। ज़ाहिर-सी बात है कि विभिन्न देशों में रहने वाले रचनाकारों के साहित्य में एक जैसा जीवन नहीं होगा। इनके साहित्य में अभिव्यक्त प्रवासी जीवन भिन्न-भिन्न होगा। इंग्लैंड से आने वाले साहित्य में जो जीवन दिखेगा वह नार्वे के प्रवासी जीवन से भिन्न होगा। अमेरिका में लिखे जा रहे साहित्य में जो जीवन होगा वह जापान की ख़ुशबू लिए नहीं हो सकता। न ही डेनमार्क के साहित्य में चित्रित प्रवासी जीवन जैसा होगा। इसी तरह पश्चिमी देशों से आने वाले प्रवासी साहित्य के जीवन से खाड़ी के देशों से आने वाले साहित्यिक जीवन की तुलना करें तो दोनों में बहुत फ़र्क नज़र आता है। इसलिए जब हम प्रवासी हिंदी साहित्य में प्रवासी जीवन की बात करते हैं तो हमें भिन्न-भिन्न तरह का जीवन देखने को मिलता है।

प्रवासी हिंदी साहित्य में भारतीय प्रवासी का जीवन आना स्वाभाविक है यह प्रायः सब कहानियों में मिलता है। कई रचनाओं में भारतीयेतर लोगों की उपस्थिति भी मिलती है। तेजेंद्र शर्मा की ‘कब्र का मुनाफ़ा’, ‘एक बार फिर होली’ में ब्रिटेन में रह रहे पाकिस्तानी जीवन की झाँकी मिलती है। अचला शर्मा की ‘रेसिस्ट’ दिखाती है कि लन्दन हादसे के बाद मुस्लिम जन-जीवन किस घुटन में रह रहा है। उनकी ‘मेहरआलम की दुआ’ का मेहरचंद भारतीय नहीं है, न ही उसकी साथी भारतीय है। उषा राजे सक्सेना की ‘अस्सी हूरें, शिराज और जुलियाना’ भी ऐसी ही कहानी है जिसमें ब्रिटेन और पकिस्तान के लोगों का चित्रण है। कृष्ण बिहारी काफ़ी समय से अबू धाबी में रह रहे है। यह एक मुस्लिम देश है। अतः यहाँ का प्रवासी जीवन ब्रिटेन और अमेरिका के प्रवासी जीवन से भिन्न है। तेल के उत्पादन के साथ खाड़ी देशों में प्रवासियों की संख्या बढ़ गयी है। फिर भी यहाँ मुस्लिम जनसंख्या बहुलता है। एक ही धर्म मानते हुए भी ये प्रवासी अपने साथ-साथ अपने देश की संस्कृति, अपने विचार-व्यवहार भी लाते हैं। इनकी ‘सर्वप्रिया’, ‘लूला हैदर’ दोनों कहानियाँ अत्यंत ख़ूबसूरत मगर दृढ़ चरित्र की स्त्री के विषय में हैं। इनकी ‘नातूर’, ‘बेगैरत कमेटी का मकान’ आदि में भी भारतियेत्तर जीवन चित्रित है।

प्रवास देश के मूल लोगों का जीवन प्रवासी हिंदी साहित्य में बहुत कम मिलता है। उसी देश के लोगों को पात्र बनाकर बहुत कम कहानीकारों ने लिखा है। ब्रिटेन से तेजेंद्र शर्मा की ‘पापा की सजा’, ‘इंतजाम’, ज़किया जुबैरी की ‘मारिया’, अचला शर्मा की ‘चौथी ऋतु’, उषा राजे सक्सेना की ‘वह रात’ तथा अमेरिका से सुध ओम ढींगरा की ‘सूरज क्यों निकलता है’ ऐसी ही कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ एक दूसरे से बहुत भिन्न परिवेश की कहानियाँ हैं अतः बहुत भिन्न-भिन्न अनुभूतियाँ जगाती हैं। हमें विभिन्न संस्कृति-संस्कारों से परिचित कराती हैं, उन्हें जानने-समझने का अवसर देती हैं। ताकि बिना जजमेंटल हुए हम ऐसे लोगों को स्वीकार सकें। इन कहानियों से हिंदी साहित्य संसार का विस्तार होता है। ये कहानियाँ हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए नया गवाक्ष खोलती हैं।

आज औद्योगीकरण से बढ़ाती हुई जटिलता, नगरीकरण के बढ़ते दायरों के साथ ही साथ एक व्यापक मानववादी भावना का फैलना प्रारंभ हो गया है। आज के वैज्ञानिक युग में जब यातायात के साधनों और सुगमता में यूरोप क्या, अमेरिका और एशिया-सारा विश्व सिमटकर एक दूसरे की सीमाओं-समस्याओं से प्रभावित हो रहा है। अतः वैश्वीकरण के इस दौर में बेहतर अवसरों की तलाश में युवा वर्ग का विदेशों की ओर आकर्षित होना और वहाँ बसकर अपने भविष्य को सँवारते हुए प्रवासी जीवन बिताना स्वाभाविक ही लगता है। किन्तु आज समस्त विश्व में स्थितियाँ, समस्याएँ लगभग एक जैसी ही हैं क्योंकि प्रभाव तो सर्वत्र एक जैसा ही पड़ता है। वैज्ञानिक प्रगति के बढ़ते चरणों ने व्यक्ति को अधिकाधिक तार्किक और बौद्धिक बना दिया और इसी कारण समस्त पुराने संस्कारों पर प्रश्न-चिह्न लगने शुरू हो गए। सर्वत्र एक मोहभंग और आस्थाहीनता जैसी स्थितियाँ मौजूद नज़र आने लगी। ये स्थितियाँ क्या एक ही देश की हैं? ज़ाहिर है कि नहीं। समस्त इंडो-यूरोपीय देशों के बढ़ रहे विकास के दौर में गतिविधियों की समानांतरता को ढूँढना और पहचानना कदापि मुश्किल नहीं है। बल्कि एक साथ सारे विश्व की समानान्तर सक्रियता को देखा जा सकता है। इन्ही सब कारणों के चलते प्रवासी जीवन भी संघर्ष और मोहभंग की दास्ताँ बन गया है। कोई भी भारतीय जब विदेश का भाग बन जाता है तब उसे अनेक समस्याओं से गुज़रना पड़ता है। भिन्न परिस्थिति एवं परिवेश से आने के कारण प्रारंभ में वह नए माहोल में स्वयं को मिसफिट महसूस करता है, किन्तु धीरे-धीरे उस नए माहौल में अपने को ढाल लेता है। प्रवासी रचनाकारों ने अत्यंत बारीक़ी से उन तमाम भारतीय परिवारों की जीवन-शैली का विश्लेषण किया है जो बेहतर अवसरों की तलाश और आशा में प्रवासी हो जाते हैं। उषा प्रियंवदा ‘अंतर्वंशी’ उपन्यास में यह स्पष्ट करती हैं कि संघर्षरत जीवन व्यतीत करने के बावजूद कोई भी वापस भारत नहीं जाना चाहता। उपन्यास की नायिका वाना एक जगह कहती है – “पढ़े-लिखे लोग, एम.ए., पी-एच.डी., डॉक्टर टैक्सियाँ चलाते हैं, बैंकर अफसर लोग सड़क पर फल बेचते हैं, भले घरों की पर्दानशीन औरतें वेत्रेसों का काम करती हैं। कोई नहीं जाता, झूठे सच्चे कारण ये सभी रहना चाहते हैं।”2

प्रवासी कथाकारों ने अपने साहित्य के ज़रिये स्त्री के हर रूप को शब्दों में बाँधकर बारीक़ी से दर्शाने की बहुत ईमानदारी से कोशिश की है। इन्होने नारी मन के अंतर्द्वंद्व को उकेरा है। अपनी पारखी नज़रों और पैनी क़लम से स्त्री के संघर्ष, त्याग, साहस और बुद्धिमत्ता का ऐसा खाका खींचने का प्रयास किया है, जिसमे देशी और विदेशी धरातल पर पाठकों को लाकर एक सवालिया निशान बना, उन्हें समाज में बदलाव लाने का न्योता देने का काम कर रहे हैं। उषा प्रियंवदा, सुषम बेदी (अमरिका), उषा राजे सक्सेना, दिव्या माथुर (इंग्लैंड), सुधा ओम ढींगरा (कैनडा), दीपिका जोशी (कुवैत), पूर्णिमा बर्मन (संयुक्त अरब अमीरात), अर्चना पेन्यूली (डेनमार्क), कविता वाचक्नवी (नार्वे), भावना कुँवर (युगांडा एवं सिडनी) आदि महिला कथाकारों ने अपनी कहानियों तथा उपन्यासों में सशक्त स्त्री पात्रों की सृष्टि की है। लेखन में प्रतिरोध का स्वर सुनायी देता है। इसकी अन्यतम उपलब्धि है कि इसने एक ओर नारी हृदय को विविध कोनों से परखकर ईमानदार अभिव्यक्ति प्रदान की और दूसरी ओर नारी को परंपरा पोषित मान्यताओं के पाश से मुक्त करके ‘मानवी’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। भारतीय आदर्शों में रची-बसी सती नारी के स्थान पर उस नारी का चेहरा सामने आया जिसे अपनी महत्ता और अस्मिता पर गर्व था। महिला लेखन पुरुष की बँधी-बँधाई पूर्वाग्रह से संचित दृष्टि को त्यागकर नारी को व्यक्ति रूप में देखने का पक्षधर है जहाँ पुरुष सापेक्ष भूमिकाओं की सीमित परिधि से मुक्त होकर एक विशुद्ध नारी के रूप में उसकी पहचान संभव हो। वह नारी जिसके मन में अपनी शारीरिक, मानसिक, सामजिक और आर्थिक दुर्बलताओं के प्रति दया का भाव नहीं उपजता; देह, संस्कार, संवेदना और विवेक किसी भी स्तर पर वह अपना मूल्यांकन परंपरागत पुरुष निर्मित प्रतिमानों के आधार पर नहीं करती।

प्रवासी साहित्य में अमेरिका का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ विशेष रूप से ‘प्रवासिनी के बोल’ उल्लेख करना अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। अंजना संधीर द्वारा सम्पादित इस कविता-संकलन की यह विशेषता है कि इसमें प्रवासी हिंदी कवयित्रियों की ही कविताएँ संकलित हैं। ‘हिंदी के प्रवासी साहित्य में यह इस प्रकार का पहला प्रयोग है जिसमें 81 प्रवासी हिंदी कवयित्रियों की 324 कविताएँ संकलित हैं तथा 33 हिंदी महिला प्रतिभाओं के परिचय के साथ अमेरिका की 38 हिंदी लेखिकाओं की 111 हिंदी पुस्तकों की सूची भी दी गयी है।’3 यह कविता-संकलन इसका प्रमाण है कि प्रवासी हिंदी कवयित्रियाँ कितनी विपुलता और अज्ञात रूप में अमेरिका में रहते हुए कविताओं की रचना कर रही हैं और सौ से अधिक प्रकाशित उनकी हिंदी पुस्तकें अपनी विशिष्ट पहचान बनाती हैं। यह कविता-संकलन एक प्रवासी हिंदी कवयित्री का अपनी सर्जनात्मकता के साथ अमेरिका में रहने वाली अन्य ज्ञात-अज्ञात कवयित्रियों को साथ लेकर चलने का बड़ा ही स्तुत्य प्रयास है। साहित्य में ऐसे सामूहिक रचना-संकलन वे ही रचनाकार निकालते हैं जिन्हें दूसरों की सृजनात्मकता पर विश्वास होता है तथा जो दूसरों की प्रतिष्ठा में अपनी प्रतिष्ठा देखते हैं। इस कविता-संकलन ने अमेरिका-भारत को तो जोड़ा ही है, इसने अमेरिका की प्रवासी भारतीय स्त्रियों की भावनाओं और चिंतन का एक पिटारा ही खोल दिया है। इन कविताओं में स्वदेश-परदेश के जो बिम्ब हैं, स्त्री के जीवन और अस्तित्व पर जो प्रश्न हैं तथा परिवार, माँ, रिश्ते, लोक-परलोक आदि पर जो भिन्न-भिन्न अनुभूतियाँ हैं, वे हमें स्त्री-मनोविज्ञान को समझने का भी अवसर देती हैं।

साहित्य को एक देश से दूसरे देश में पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य आज इन्टरनेट के द्वारा संपन्न हो रहा है। भूमंडलीकरणऔर बाज़ारीकरण के इस दौर में हिंदी का नया रूप हमारे सामने आ रहा है। इस रूप के विकास में इन्टरनेट, वेब मीडिया, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, ई-पत्रकारिता और ब्लॉग का महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी ब्लॉगिंग की शुरुआत से लेकर अब तक इसके विकास में प्रवासी हिंदी ब्लागरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन प्रवासी ब्लॉगरों में नार्वे से सुरेश चन्द्र शुक्ल, प्रभात कुमार, रंजना सोनी, यूके से कविता वाचक्नवी, अमेरिका से लावण्या शाह, ब्रिटेन से उषा वर्मा, दिव्या माथुर, पुष्पा भार्गव, उषा राजे सक्सेना, महावीर शर्मा, कनाडा के समीर लाल, सूरीनाम से पुष्पिता, जर्मनी से अंशुमन अवस्थी, ऑस्ट्रेलिया से अनिल वर्मा, कैलाश भटनागर, जापान से ऋतुपर्ण आदि कई प्रवासी हिंदी ब्लागर लगातार योगदान दे रहे हैं। आज ऐसे ब्लागों की संख्या हज़ारों में है जो प्रवासी ब्लागरों द्वारा चलाये जा रहे हैं।

वैश्विक पटल पर हिंदी का परचम लहराने में विदेशी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का भी कम महत्वपूर्ण योगदान नहीं है। भारतेतर देशों में, विशेष रूप से अमेरिका, इंग्लैंड, मॉरिशस, नार्वे, फिजी, सूरीनाम आदि देशों में, हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के प्रति वहाँ के भारतवंशियों में विशेष अभिरुचि दिखायी देती है। आज अमेरिका की ‘विश्व विवेक’, ‘विश्व’, ‘हिंदी जगत’, इंग्लैंड की ‘पुरवाई’, मॉरिशस की ‘वसंत’, ‘पंकज’, ‘इन्द्रधनुष’, ‘आक्रोश’, ‘जनवाणी’ कनाडा की ‘हिंदी चेतना’, नार्वे की ‘शांतिदूत’ आदि हिंदी पत्रिकाएँ वैश्विक हिंदी के साथ हिंदी की नयी रचनात्मकता का चित्र प्रस्तुत करती हैं। वास्तव में, ये ऐसी हिंदी पत्रिकाएँ हैं जो हिंदी को वैश्विक रूप प्रदान करने के साथ भारतेतर देशों में रचे जाने वाले हिंदी साहित्य को भी हिंदी संसार के सम्मुख प्रस्तुत करती हैं।

समग्रतः देशी मिट्टी में देशी संस्कारों की सौंधी महक से सराबोर इस साहित्य से गुजरते हुए अपने देश, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति के प्रति आस्था और विशवास में बढ़ोतरी होती है। प्रवासी हिंदी साहित्यकारों ने अमरिका, युरोप, एशिया, अरब, आफ्रिका के अनेक देशों में रहते हुए अपनी भाषा से जुड़े रहकर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। इस साहित्य ने विश्व मंच पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है। अतः इन रचनाकारों की हिंदी साहित्य सेवा के मूल्यांकन, प्रोत्साहन, हिंदी साहित्य में उसके वाजिब स्थान को रेखांकित करने, उसकी साहित्यिक उपलब्धियों को स्वीकारने तथा अपेक्षाओं को साझा करने की आवश्यकता है।

डॉ. संदीप रणभिरकर
सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग,
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
बान्दरसिंदरी, किशनगढ़ – 305801
जिला-अजमेर (राजस्थान)
E-mail: sandeepvr25@gmail.com
मो.8503891642

संदर्भ सूची :

1. डॉ. कमल किशोर गोयनका, विदेशों में हिंदी साहित्य, शब्दयोग, अप्रैल 2008, पृ.12
2. उषा प्रियंवदा, अंतर्वंशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं.2004, पृ.79
3. डॉ. कमल किशोर गोयनका, हिंदी का प्रवासी साहित्य, अमित प्रकाशन, गाजियाबाद, सं.2011, पृ.414


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