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ISSN 2292-9754

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10.17.2017


अबकी दीवाली

अबकी दीवाली कुछ ऐसे मनाएँ
स्याह मनों के, धुल सब जाएँ!
नेह जले सतत प्रेम भावों की
बाती बन रहे संवेदना मन की
दीये बन रहे तन की मिटटी के
जीवन प्रकाश ही लौ हो जाए!!
अबकी दीवाली कुछ ऐसे मनाएँ
स्याह मनों के, धुल सब जाएँ!

पुत्र है बैठा सीमाओं पर जिसका
सूना न हो कैसे उसका जीवन
आज फिर बस बात हो जाये
इतनी ही प्रतीक्षा में ठहरा आँगन
चलो मिल आएँ उस माता से
स्वर कुछ आँगन में उठ आएँ
अबकी दीवाली कुछ ऐसे मनाएँ
स्याह मनों के, धुल सब जाएँ !

बिटिया जो मेरी कुछ पढ़ पाए
जटिल न हो यूँ उसका फिर जीवन
लाचारी मन की बतलाए किसको
कौन सी दीवाली मनाये वो निर्धन
लक्ष्मी के चरणों की धूल पहुँचा दें
आशा के कुछ पुष्प उभर आएँ!!
अबकी दीवाली कुछ ऐसे मनाएँ
स्याह मनों के, धुल सब जाएँ!

शीत ऋतु है संग लाई दीवाली
ठिठुर रहा भिक्षुक का क्षीण तन
पूस की सोच सर्द रातों को
छा रहा स्वतः हृदय में कम्पन
नए हम परिधानों से सँवर लें
वस्त्र तो पुराने पर भिजवा आएँ!
अबकी दिवाली कुछ ऐसे मनाएँ
स्याह मन से सब दूर हो जाएँ!!


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