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07.03.2007
 
उसी को कुछ कहते अपना बुतखाना है
सजीवन मयंक

सुनता कोई नहीं सभी का अपना गाना है ।
हमको अपनी सभी गुत्थियाँ खुद सुलझाना हैं ।।

सारी राहें जाम सभी दरवाजों पर ताले ।
समय किसी के पास नहीं है एक बहाना है ।।

राशन की दुकान बिना सामान चला करती ।
इन बीते वर्षों में हमने इतना जाना है ।।

सबके दिल में दर्द कोई हमदर्द नहीं मिलता ।
ऐसे में किसको अपना अब घाव दिखाना है ।।

लोग जिसे कहते हैं मस्जिद बहुत पुरानी है ।
और उसी को कुछ कहते अपना बुतखाना है ।।
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