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07.03.2007
 
 कहने लगे बच्चे कि अब पापा सुधर गए
सजीवन मयंक

हम सोचते ही रह गये और दिन गुज़र गए ।
जो भी हमारे साथ थे जाने किधर गए ।।

बेटी की बिदा हो गई शहनाई भी बजी ।
फिर ऐसा क्या हुआ सभी सपनें बिखर गए ।।

घर से गए जो एक बार आज के बच्चे ।
वापिस वे ज़िंदगी में दुबारा न घर गए ।।

महफ़िल में तेरी लोग सभी झूम रहे थे ।
पहुँचे जो हम तो सभी के चेहरे उतर गए ।।

समझा के थक गए तो स्वयं मौन हो गए ।
कहने लगे बच्चे अब पापा सुधर गए ।।

आज़ाद मुल्क हो गया ऐसा हुआ है क्यों ।
कुछ लोग इस तरफ रहे कुछ क्यों उधर गए ।।

फ़ुर्सत नहीं मरने की बहुत काम है बाकी ।
फ़ुर्सत मिली ऐसी कि वे फ़ुरसत में मर गए ।।
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