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09.07.2008
 
दूर बस्ती से जितना घर होगा
सजीवन मयंक

दूर बस्ती से जितना घर होगा।
हमारे लिये वो बेहतर होगा।।

ये दुनियां साथ उसी का देगी।
कि जिसके पास में हुनर होगा।।

सच को फाँसी की सजा होगी तो।
सबसे पहले हमारा सर होगा।।

भरोसा जिस पे किया था हमने।
वक्त पर वो इधर-उधर होगा।।

ज़िंदगी की सजा तो पूरी कर।
बाद मरने के तू अमर होगा।।

तूने एहसान किया था जिस पर।
उसी के हाथ में पत्थर होगा।।
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