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ISSN 2292-9754

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01.16.2018


आत्मग्लानि

एक्टिवा पार्क कर मैं जल्दी जल्दी शॉपिंग कॉम्पलेक्स की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी.. क्योंकि बच्चों को स्कूल से लेने भी जाना था कि तभी पीछे से आवाज़ आयी - "बेटी, ये दवा लेना है इतने पैसे दे दो" । मैं पलटी - उन बुजुर्ग आदमी की मजबूरी देखने से पहले ना जाने कितनी सीखें... कितनी कहानियाँ याद आ गय़ीं.. कि भरोसा नहीं करना चाहिए, ये पर्स छीन के भाग जाते हैं.. इनका पेशा यही है; ब्ला-ब्ला! मैं मन की दूसरी आवाज़ दबा ऊपर चली गयी।

शॉप के अंदर पहुँचने के बाद मेरी आत्मा झिंझोड़ने लगी.. क्या पता उस इन्सान को सही में ज़रूरत हो, मैं भाग कर बाहर आयी तो, वहाँ कोई नहीं था सिर्फ़ मेरी आत्मग्लानि के अलावा। मैं ख़ुद पर बहुत नाराज़ हुई , कुछ पैसों से मदद करने से मैं ग़रीब तो नहीं हो गयी होती.. क्या पता उनकी ज़रूरत सच्ची थी!


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