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08.31.2008
 
 घर एक यात्रा है - वरिष्ठ कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत का नया काव्य संग्रह
एस. आर. हरनोट

प्रकाशक      :     मेधा बुक्स,एक्स-११,
                  नवीन शहदरा, दिल्ली-११००३२
लेखक      
:     श्रीनिवास श्रीकान्त
पृष्ठ         
:     १२७
मूल्य       
:     १५० /- रु०

घर एक यात्रा है चर्चित वरिष्ठ कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत का तीसरा कविता संग्रह है। एक अन्तराल के बाद उनके दो कविता संग्रह साथ-साथ आए हैं। गत वर्ष उनकी कविता पुस्तक बात करती है हवा प्रकाशित हुई थी और इस वर्ष घर एक यात्रा मेधा बुक्स, नवीन शहदरा, दिल्ली से आई है। यह समकालीन कविता के एक नये तेवर का सशक्त दस्तावेज़ है। फलैप पर अंकित टिप्पणी के अनुसार- ऐसे समय में जबकि नये बाज़ारवाद के कारण अब वह हाशिये में जीने पर विवश है। अपने समय के सभी ज्वलन्त मुद्दे इन कविताओं में नज़र आयेंगे। श्रीनिवास श्रीकान्त की ये काव्य रचनाएँ शब्दसंयम, लिरिकल पदविन्यास और अपने आसपास से गहरा सरोकार रखती हैं। प्राणी दया, प्रकृति प्रेम, निजता का व्यापक विस्तार और सामाजिक चिन्ता इस सपति-वर्षीय कवि के प्रमुख प्रेरणा स्त्रोत हैं। वह अपनी व्यंजना के जरिये एक ऐसी मानवीय सभ्यता का तलबगार है जो अपने सही रूप में इन्सानी हो।

श्रीनिवास श्रीकांत

 

इस संकलन में ३१ छोटी-बड़ी कविताएँ संकलित है। कर्कटों की करुण कहानी, झील पर पंछी, हया गाथा, पहा, दुखद अन्त, विनय आदि कविताएँ जहां जीवजगत के सुख-तापों को बयान करती हैं वहीं ऋतुगीत, प्रेम, सहपात्र, तुम और मैं, अहमद, अनागरिकों का समूहगान, घर (एक, दो) वक्त के बिल्लौर में आज के आदमी के अनेक शेडों को उतारती हैं। कुछ कविताएँ तात्विक और अधिभौतिक भावबोध की सूक्ष्म बानगीया हैं जिनमें अक्षर, त्रयेक, योगमुद्रा, विश्वछवि बुद्ध और कृट सन्देश को रेखांकित किया जा सकता है।

 

इनमें से गुजरते हुए सहज ही नवलातीनी काव्य बिम्बों का आभास होने लगता है। इनमें लोर्का जैसी गाथा शैली, ऑक्टेवियो पाज जेसी बिम्बीय पारदर्शिता/पदविन्यास और नेरूदा जैसा सामाजिक तेवर देखने को मिलेगा। पर यह भी सच है, ये इनका प्रतिरूप नहीं है। अपने ही दिक्कालमान, मानवीय प्रसंगों और इथीरियल एहसासात का मोजेक हैं ये। स्थानीय परिधियों को तोड कर बाहर आत हुईं। बिना कोई शोर किये, आदमी और दमीयत के वैश्विक सवालों से लगातार जुडे रहकर। कवि ने परिवेश और परिस्थितिकी को नारे की तरह नहीं उछाला। प्रकृति के चुनिन्दा उपमानों को ग्रहण कर एक असमाप्य का को परोसा है। ब्रह्माण्डीय स्तर पर सच का यह सारगर्भित रेखांकन विशेष द्रष्टव्य है-

 

सच है तत्वतः

एक अनुत्तरित मरीचिका

अनन्त में से उभरता अनन्त।

 

तात्विक कला में गुंथा एक अधिभौतिक विराट सत्य। सीधे ऐहिक सन्दर्भों को अपने आप में समेटता हुआ।



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