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08.10.2007
 
मनुष्य और प्रकृति के अन्योन्याश्रित प्रसगों की त्रासदिक गाथा--हिडिम्ब
निर्मल शर्मा

 

हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखने वाले हिन्दी के कथाकारों में एस.आर. हरनोट एक मान्यताप्राप्त हस्ताक्षर हैं। गत डेढ़ दशक के अपने कथाकाल में "हिडिम्ब" उनके द्वारा लिखा गया पहला उपन्यास है जिसमें एक पर्वतीय घाटी की देवी हिडिम्बा और राक्षस हिडिम्ब को मिथकीय प्रतीकार्थ के रूप मे प्रयुक्त कर उन्होंने इस पर्वतीय प्रदेश के एक दलित परिवार की व्यथा-कथा कही है। उपन्यास में यहाँ के जल, जंगल, पर्वत और जमीन की चिन्ताएँ समाहित है। इसमें पारम्परिक आसुरी रीति-रिवाज, परम्परा और काहिका जैसे आदिम नरबलि उत्सवों का विस्तृत ताना-बाना है जिसे बीते कल के स्थानीय लोग अपने सामाजिक और व्यक्तिगत सौख्य के लिए एक सुनिश्चित कालावधि के बाद मनाया करते थे। जातिवाद, सामाजिक विघटन और राजनीतिक भ्रष्टाचार के अपने समय के विविध चित्र भी इस उपन्यास में कथा के विकास के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में यहाँ-वहाँ बिखरे नजर आते हैं और ये सब इतने प्रामाणिक और पारदर्शी है जो मानवीय सरोकारों की ओर इशारा करते हैं।

 हरनोट ने अपने इस उपन्यास में जिन पात्रों को केन्द्रीय रूप से लिया है वह है एक दलित वर्ग से सम्बन्धित नड़ परिवार। परिवार के चार सदस्य हैं-पति, पत्नी, बेटी और एक बेटा। पति है शावणू, पत्नी सुरमादेई, लड़की सूमा और लड़का कांशीराम। यह एक छोटा सा गरीब परिवार है। अपनी मर्यादा और अपने आदर्शों पर टिका हुआ। शावणू एक सीधा-सादा गठीले शरीर वाला किसान है और उसकी सुन्दर और सज-संवर कर रहने वाली पत्नी अपनी घर-गृहस्थी को बड़े ही सलीके से चलाने में सक्षम है। सुन्दरता में बेटी भी कम नहीं। वह घर काम में माँ से भी ज्यादा चतुर और दक्ष है। बेटा छोटा है, इसीलिए छोटा कहकर उसे बुलाया भी जाता है। वह स्कूल जाने वाला विद्यार्थी है। पढ़ने में होशियार। नटखट और अच्छी सेहत वाला। लड़कियों वाले खेल प्राय: उसे अच्छे लगते हैं, यहाँ तक कि उसकी बहन सूमा ने तो उसे चिढ़ा भी दिया कि वह लड़कियों वाले कपड़े ही पहना करें। स्कूल में भी उसे छोटे के नाम से ही पहचाना जाता है। शावणम वस्तुत: अपने परिवार का मुखिया और इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र है और अपने परिवार के प्रति पूरी तरह से आस्थाशील है। वह अपने कुटुम्ब के सदस्यों को परिवार का आधार मानता है।

 शावणू का घर बहुत बड़ा तो नहीं था फिर भी अपनी गुजर-बसर के लिए काफी था। दो कमरे और एक रसोई। एक कमरा सोने का ओर दूसरा उठने-बैठने का। घर की छत स्लेटों से बनी थी जो एकदम घर के पिछवाड़े से सटी थी ताकि फसल को आसानी से घर की छत पर सुखाया जा सके। एक तरफ थे गौशाला और उसमें बंधे पशु-गायें, एक जोड़ी बैल और भेड़-बकरियाँ।

 परिवार की जमीन काफी उपजाऊ थी। उम्दा किस्म की मिट्टी से सनी हुई। नीचे की और एक नदी बहती थी उसी से सिंचाई और पीने के लिए पानी लाया जाता था। वहाँ की छटा देखने योग्य थी, एक दम विलक्षण और अनूठी। काव्य के नौ रसों में से एक। यहाँ नड़ के घर-बार ओर जमीन का परिदृष्य सौन्दर्यबोध में बेजोड़ है। एक संवेदनशील पाठक के लिए यह एक संजीव अनुभव है जिसे वही रच सकता है जिसने स्वयं इस समग्र को अपने अनुभव से अनुभूतिगम्य बनाया है। संक्षेप में यहाँ हरनोट के उपन्यासकार ने प्रकृति के परिवेश को अपने उपन्यास में तद्‍वत्‌ उतारने की पूरी कोशिश की है।

 उस नड़ परिवार के लिए जमीन ही सब कुछ थी। यही उसकी रोजी रोटी का साधन थी। घर का सारा खर्च इसी पर निर्भर करता था। न सिर्फ आजीविका बल्कि परिवार और उसके सदस्यों का मान-सम्मान भी। शावणू की जमीन पर एक दिन मन्त्री की नजर पड़ गई। मन्त्री घाटी में अपने चुनाव क्षेत्र के दौरे पर था। वहाँ आकर वह कुछ पल के लिए रुक गया और जमीन का मुआइना करने लग गया। उसने इससे बढ़िया जगह इससे पहले कहीं भी नहीं देखी थी। अत: वह एस सम्पत्ति को पाने के लिए लोलुप हो गया। उसके मन में एक लालसा जगी कि वह उसे हासिल करके रहेगा। वह इसके लिए कोई भी कुकर्म कर सकता था। इस षडयन्त्र में उसके समर्थक और उसके करीबी लोग भी उसका बराबर का साथ देते। हर कुकृत्य में वे सब उसका साथ देते थे। ये लोग कई तरह का मुखौटा पहने उसके साथ होते। कहीं निजी स्टाफ के रूप में, छोटे-मोटे नेता, प्रधान या कलैक्टर, तहसीलदार या पटवारी के वेश में। लेखक के अनुसार मीन मन्त्री के लिए एक जिस्मानी हवस की तरह हो गई थी। जमीन के प्रमाद में वह इतना आत्मकेन्द्रित हो गया था कि वह जिस मकसद के लिए दौरे पर आया था उसे भी वह भूल गया। मन्त्री की इस हरकत से लगता था कि वह अपने सरकारी काम को भूलकर अपने निजी काम को ज्यादा महत्ता देने लगा था। मन्त्री ने अपने आदमी को भेज कर शावणू को बुलाया और जमीन के बारे में बात करनी चाही परन्तु उसने मना कर दिया। घर लौटने के बाद वह बिल्कुल गुमसुम था। दिन प्रतिदिन उसके मन को यही चिन्ता खाई जा रही थी कि वह अपने बजुर्गों की जायदाद को कैसे बेच सकता है। एक दिन दुष्ट मन्त्री के तीन लोग उसके घर आए ओर वहाँ पहुँचकर अजीब हरकतें करने लगे। शावणू की पत्नी सुरमा को यह सब अच्छा न लगा और उस धाकड़ औरत ने अपना दराट निकालकर उन सब को बाहर खदेड़ दिया।

 उपन्यासकार ने इस प्रसंग में यहाँ समाज को परोक्षत: यह सन्देश देने का प्रयास किया है कि नारी मूलत: अपरिहार्य शक्ति की साम्राज्ञी है जिसके आगे पाप भी काँपने लगता है और साथ में यह भी कि नारी संयोग के बिना पुरुष अपूर्ण है। दूसरी ओर जिस स्थान पर उसका पूरा आदर - सत्कार है
देवता भी वहीं निवास करते है। वस्तुत: ऐसे कथा प्रसंगों में लेखक द्वारा नारी को एक सशक्त तथा महत्वपूर्ण कारक के रूप में स्थापित किया गया है।

 हिडिम्ब के ये ग्रामीण पात्र अपने परिवेश के सामाजिक, राजनीतिक अवस्थाओं से पूर्णतया परिचित है। पात्रों की चारीत्रिक विशेषताओं को उभारने में भी लेखक ने अपनी लेखकीय कुशलता का परिचय दिया है और पूरी कहानी कहीं-कहीं यथार्थ के इलावा अनुश्रुति की तरह बहती हुई प्रतीत होती है। खास कर ऐसे प्रसंगों में जहाँ वह काल्पनिक और मिथकीय रूप ग्रहण करती है। लेखक ने अर्धनारीश्वर के शिव-शक्तिमय मिथकीय प्रतीक को बड़े ही सटीक, सार्थक और संगतिपूर्ण ढंग से संजोया है। शावणू को दु:ख था तो मूल रूप से यही एक कि वह अपने पूर्वजों की जमीन को सत्ता के इन दरिन्दों को कैसे सौंप दें। क्योंकि यह दाय उसे देव कृपा से ही प्राप्त हुई है। इसीलिए उस जमीन के बेचने का प्रशन भी पैदा नहीं होता था। उसने अपने आप को निम्न वर्ग का होने के बावजूद अतीत और निकट वर्तमान में अनेक विपदाओं से बचाए रखा था। उसे यह अटूट विश्वास था कि देवता के प्रकोप से जिन लोगों के मन में बुराई आ गई है वह अन्तत: नष्ट हो जाएगी। उसके अन्दर की सोच अन्तर्संघर्ष को उपन्यासकार ने सूक्ष्म स्तर पर छायांकित किया है। इसी से होता है अन्दर की कथा का निर्माण। और बाहर हिडिम्ब की विनाशलीला का प्रसार।

उपन्यासकार ने अपने इस रचनाकृति में कथा-क्षेत्र की असंगतियों और अंधकारमय पहलुओं को दिखाने के साथ हिडिम्ब के रूप में आसुरी शक्ति के प्रतीक को भी सहजता से बाँधा है जिससे कथा में गहनता आना स्वाभाविक है। इसमें हमें अपने समय की मानवीय यथा स्थिति का प्रतिबिम्ब नजर आता है। हिडिम्ब के पात्रों में एक चित्र है शावणू के बेटे कांशी का जो एकाएक मृत्यु के दरिन्दों द्वारा मार दिया जाता है। शावणू की पूर्व कल्पना में जीवित गीठू राक्षस का उपमान भी इस कहानी में बड़े ही आकर्षक ढंग से पिरोया गया है जो एक देहाती समाज की मानसिकता को जाहिर करता है कि यहाँ का आदमी किस तरह अपने यथार्थ को देखने का आदि है। अपने अन्धकारमय कल्पना लोक में थका हारा ऐसा ही एक देहाती है शावणू जो दु:ख का मारा अपने बारे में इस तरह सोच-सोच कर गहरी उदासी में डूब जाता है। उसे रात दिन अपनी पत्नी और बेटी सूमा की चिन्ता खाए जाती है कि कैसे वह उन्हें इन दरिंदों से बचा पाएगा। कोई भी जुगत उसे नजर नहीं आती।

हरनोट एक चर्चित कहानीकार के रूप में बहुत तेजी से उभरे हैं और अब हिडिम्ब कथाकृति के माध्यम से एक सफल उपन्यासकार के रूप में भी, यद्यपि यह उनका पहला उपन्यास है जिसमें उन्होंने जीतोड़ मेहनत की है। गाँव के जीवन में हो रहे परिर्वतनों को रचनाकार ने निहायत संवेदनशील और नाजुकख्याली के साथ इस उपन्यास के वृतान्तों में शब्दबध किया है। अन्यत्र, उनके द्वारा लिखी गई कहानियों में उठाए गए विषय ग्रामीण किन्तु नए और सामायिक होते हैं। उनमें कथाओं में एक ऐसी ललक है जों गाँव के एक साधाराण आदमी को भी नई सभ्यता और आधुनिकता के मरकज नगरों की ओर अनायास ही खींचती दिखाई देती है। सुख-सुविधाओं को बयोर कर घर बनाने की ललक किस व्यक्ति में न होगी। वही हरनोट के उपन्यास के पात्र शावणम में भी द्रष्टव्य है। यद्यपि वह इसके साथ ही अपने पैत्रिक घर और जमीन के प्रति भी पूरी तरह जागरूक है। हिडिम्ब उपन्यास वस्तुत: शावणू की इसी अन्तरभावना का प्रतिफलन है। लेखन द्वारा इस उपन्यास में ग्रामीण समाज, परिवार घर, खल राजनीतिज्ञों और उनके अन्धाधुन्ध समर्थ करने वाले पिछलग्गुओं का बड़े ही व्यंग्यात्मक ढंग से पर्दाफाश किया है। शावण उसकी पत्नी, उसकी बेटी, उसका पुत्र और एसके समानधर्मी ऊँचे-ऊँचे शिखरों की मानिंद इस महा कथा में टापू की तरह दिखाई देते है। इन संघर्षरत पात्रों के लिए घर एक ऐसी चीज है जहाँ व्यक्ति बाहर के संघर्षों, विरोधों, चुनौतियों और खूंख्वार ताकतों से जूझकर राहत की साँस लेना चाहता है।

नड़ जाति की नियति है अपरिचित लोक में परिवेश करने जैसी जहाँ देवता है, गूर हैं, उनके कारकुन हैं और काहिका जैसी आदिमकालीन वीभत्स परम्पराएँ।

यह प्रतीत होता है कि हरनोट ने पर्वतीय क्षेत्र हिमाचल की परम्पराओं का बारीकी और अध्ययन किया है। काहिका का शब्दश: चित्रण पूरे आँचलिक साहित्य की निश्चय ही एक नायाब उपलब्धि जिसमें नड़ को अनेक मानसिक तन्त्राचार और आत्मिक और धर्माचारों से गुजरना पड़ता है। देवता, गुर, पुजारी और आसपास जुटी अन्धविश्वासी ग्रामीणों की भीड़ एक अजीबोगरीब परिदृष्य प्रस्तुत करती है जो विशेषकर ऐसे पाठकों के लिए विचित्र और हैरतअंगेज होगा जिन्होंने ऐसी नरघाति क्रियाओं को देखा क्या, सुना भी नहीं होगा। लेखक ने काहिका के अन्तर्गत नरबलि की प्रथा को तद्‍वत्‌ प्रस्तुत किया है और समारोह का विस्तार कुछ इस तरह किया है जिससे पढ़ने वालों को यह लगे कि मृत्यु के दूत एक पारम्परिक धर्माचार-अनुष्ठान के माध्यम से बलि के लिए पूर्वनिर्धारित नड़ों को मृत्यु के अन्तिम धर्माचरण से पूर्व कितने उन्मुक्त व्यवहार का अधिकार प्रदान करते है ताकि इस अत्याचार के खिलाफ एक अन्ध आदिम परम्परा को न्यायोचित दिखाया जा सके। इससे पूरा काहिका एक आडम्बर दिखाई देने लगता है और यह रूढ़िग्रस्त पारम्परिक मनुष्य की पाशविक कुतूहल को जाहिर करता है।

शावणू नाम के इस नड़ ने बचपन में काहिका उत्सव में अपने पिता की मृत्यु को देखा था और यही घटना उसमें दलित होने का कमतर एहसास भी जगाती है। और यह परोक्षत: ऐसे अन्याय के खिलाफ भय और आक्रोश के लिए आधार तैयार करती है। शावणू के जहन में उसका अतीत, सामाजिक दबाव और वैयक्ति भ्रम यदा-कदा उसके भीतर कुंडली मारे नजर आते है। ओर जब वह कुंडली टूटती है तो असुरक्षा का भय एकाएक फन फैलाने लगता है। उसमें दलित होने का एहसास बार-बार जागता है। उसका भूतकाल न चाहते हुए उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है पर जिसे वह झटक कर अपने अन्दर से निकाल भी देता है। ऐसी मन:स्थितियों में उसका साथी है एसी गाँव का शोभा लुहार। शोभा लुहार से हुई उसकी मुलाकात उसे अन्तरंगता और सांत्वना से अभिभूत कर देती है जिसे भाव-स्तर पर लेखक ने चित्रित करने का एक सहज और सफल प्रयास किया है। दरअसल शावणू और शोभा लुहार सामाजिक स्तर पर अपनी जातीय अवस्थिति और समाज से अपने रिश्तों के कारण बुरी तरह छले गए हैं। दोनों का व्यक्तित्व लेकिन एक दूसरे के सामने पूरी तरह अन्तरंग स्पष्ट और पारदर्शी है। वस्तुत: हिडिम्ब की कथा में शावणू नड़ और शोभा लुहार का प्रकरण खूबसूरत नग सा जड़ा है। शावणू की कहानी सुनते शोभा लुहार की व्यथा भी कहीं शावणू के साथ जुड़ जाती है और इस तरह दोनों एकाकार और समष्टीगत हो जाते हैं। इसी में पिरोया है शावणू की पत्नी सूरमा के साथ का विभत्स कांड जिसमें वह ठेकेदार से बदला लेती है और प्रतिक्रिया के रूप में वह अपनी जीवनलीला स्वयं ही समाप्त कर देती है।

 कालान्तर में संयोगवश ऐरी नामक एक अंग्रेज द्वारा नदी में डूबती हुई सूमा को अपना जीवन जोखिम में डालकर बचा लेना कहानी की धारा को एक नया मोड़ दे जाता है वरना शावणू के दु:खी परिवार में आए ठहराव ओर मुसीबतों की भंवर से निकलना संभव नहीं था। ऐरी का प्रसंग बेशक यहाँ
कहानी को एक जादुई और फिल्मी मोड़ देता लग रहा हो लेकिन इसकी तह में मूल रूप से लेखक ने पर्वतीय संस्कृति में आ रहे पाश्चात्य प्रभाव के तहत हो रही अनुबन्धित विवाह के गैर सामाजिक रिवाज को भी रेखांकित किया है जो कि समाजशास्त्रीय और दूसरे कई कारणों से विचारणीय होगा। सूमा का आकर्षण ऐरी को उसकी और उसके परिवार की अब तक की सारी त्रासदियों समेत छू लेता है और वह शावणू के समक्ष उसकी बेटी सूमा के अनुबन्धित विवाह का प्रस्ताव रखता है। थोड़ी सी मान-मनुहार के बाद शावणू दोनों के अनुबन्धित विवाह की स्वीकृति दे देता है क्योंकि उसके पास इसके इलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा है। यह एक प्रेम विवाह ही नहीं एक इकरारनामा भी है और इस तरह के कुछ एक विवाह राज के समय में भी हुए है। सम्भवत: उपन्यासकार का लक्ष्य इसमें यह दिखाना रहा होगा कि आर्थिक रूप से कमजोर ओर उपेक्षित परिवार वर्णवादी व्यवस्था से तंग आकर किस तरह विदेशियों से अपने वैवाहिक सम्बन्ध बनाने के लिए विवश हो जाते है। वे इसके माध्यम से न केवल सामाजिक विषमता बल्कि आर्थिक विपन्नता से मुक्ति पाने में भी सफल हो जाते हैं। पर यदि यह ऐसा है तो यही विकल्प कहीं हमारे पर्वतीय संस्कृति सजग समाज को संभवत: प्रदूषित भी कर जाता है। इसके साथ ही यह प्रवृति आर्थिक रूप से आतुर वर्गग्रस्त मनुष्य के स्वप्निल जगत में प्रवेश की ललक को भी जाहिर करती है। लेकिन हिडिम्ब का शावणू इकरार में तय हुए अपनी बेटी के बदले में ऐरी द्वारा दिए जा रहे लाखों रूपए की धनराशि को अस्वीकार कर अपने स्वाभिमान की रक्षा करता है और इस अल्पावधि के विवाह को कन्या दान के अर्थों में ग्रहण करता है। इस तरह शावणू मन्त्री और उसके दरिन्दों से अपनी बेटी को भी बचाने में सफल हो जाता है जिनकी बराकर नजरें उसकी जमीन के साथ सूमा पर भी टिकी है।

गत कुछेक दशकों में लोगों द्वारा प्रकृति का नाजायज ढंग से दोहन किया गया है जिसके फल स्वरूप पहाड़ों का पर्यावरण और पारिस्थिति की बुरी तरह से प्रभावित हुए है। सामाजिक स्तर पर कुछ आक्रमक तत्व पर्वतीय संस्कृति की आत्मा को भी दूषित करने में लगे हुए है। जैसे कुल्लू घाटी में आए दिन नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार और युवाओं को उसका माध्यम बनाया जाना। लेखक ने इन बातों पर भी अपनी चिन्ता व्यक्त की है जो कि शावणू के बेटे कांशी की हत्या से प्रमाणित होता है। साथ सत्ता पर काबिज लोगों की प्राकृतिक संम्पदा को अपने स्वार्थ के लिए नष्ट करते रहना एक गंभीर स्थिति का द्योतक है। इन बातों को उपन्यास में कई प्रसंगो के माध्यम से मार्मिक बनाया गया है।

 इसके अतिरिक्त उपन्यास में व्यक्ति और प्रकृति का आक्रोश कई स्थलों पर एकाकार हुआ नजर आता है। शोषण और अन्याय के खिलाफ व्यक्ति के भीतर के आक्रोश को कई बार प्रकृति भी अपने भौतिक संसाधनों के अतिरेक के साथ अभिव्यक्ति देती हुई लगने लगती है। एस. आर. हरनोट ने वस्तुत: अपने उपन्यास में पूरी सावधानी के साथ दलित वर्ग के लोगों की अन्दरूनी कहानी कहते हुए कथा को पाठकों के सामने न केवल प्रस्तुत किया है बल्कि ये सभी देहाती प्रसंग उन्हें कहीं आन्दोलित भी कर जाते हैं। लेखक ने किसी भी पात्र को उपन्यास पर थोपा नहीं है। सारे पात्र उपन्यास की मूल पृष्ठभूमि से उगे हैं और उनका स्वाभाविक विकास हुआ है। घटनाक्रम के अनुरूप, एक निर्णयात्मक संप्राप्ति है कथा के अन्त में।

उपन्यासकार की मूल जीवन दृष्टि और उसकी रचनाधर्मिता इस उपन्यास में बहुत ही स्पष्टता से उभर कर सामने आई है। लेखक ने अपने पात्रों की नितान्त आन्तरिक क्षणों की व्यथा-कथा को बड़ी एहतियात के साथ मुखर बनाया है और उसे कहीं भी उत्तेजनापूर्ण होने दिया है। इसीलिए शायद भद्दी से भद्दी स्थिति में भी कथा कलात्मक ही बनी रहती है। और वह वीभत्स और घिनौनी नहीं बनती। वरना आज के बहुत से स्वनामधन्य उपन्यासकार-कथाकार भी जघन्यता को बयान करते हुए अपनी कृतियों में घासलेटी, अश्‍लील और अप्रिय बन जाते हैं।

हिडिम्ब उपन्यास यद्यपि अत्यन्त गतिशील है फिर भी पात्रों के साथ न्याय करते हुए हरनोट ने बड़े ही संयम से काम लिया है। और इस तरह इस अर्ध-मिथकीय और अर्ध-यथार्थ कथा को उच्छृंल नहीं होने दिया है। सहज गल्पीय रोचकता और सुन्दर भाषा शैली के सारी गाथा आँखों के सामने साकार होती दिखाई देती है। पात्रों का स्वभाव और उनका व्यक्तित्व और उनकी भीतरी-बाहरी संवेदनाएँ बड़ी ही सहज मानवीय अभिव्यक्ति के साथ पाठकों को पहुँचती है। इस उपन्यास में हरनोट हिडिम्ब नामक राक्षस से लड़ते हुए दिखाई देते हैं। उनका उपन्यास इस लम्बी लड़ाई की यातना को देश और समाज की तमाम आर्थिक एवं पारिवारिक पेचीदगियों को पार करते हुए आगे बढ़ता है। सम-सामायिक ऐतिहासिक स्थिति में जबकि हम मूल्योत्कर्षी होने का दावा करते हैं, यह कहानी हमें आधुनिक रूपान्तरण के बाद भी उन्हीं यथास्थितियों से साक्षात्कार कराती है जो आज भी समाज में शेष है।



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