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04.13.2012


हिन्दी बाल साहित्य और बलराम अग्रवाल के बाल एकांकी

Bal Ekakiपुस्तक: ग्यारह अभिनेय बाल एकांकी
एकांकीकार: बलराम अग्रवाल
प्रकाशक: पंकज बुक्स, 109-ए,पटपड़गंज, दिल्ली-110091
वितरक: भावना प्रकाशन, दिल्ली-110091
मूल्य: रु॰ 150/- (हार्ड बाउंड)

लगभग पचास बाल कहानियाँ और तीन किशोर उपन्यास लिखते हुए मैंने अनुभव किया कि बाल साहित्य लेखन अत्यंत कठिन कार्य है और यह भी कि हिन्दी में स्तरीय बाल साहित्य लेखन अपेक्षाकृत कम हुआ है। आज जो लेखन हो रहा है वह क्या आज के बाल मनोविज्ञान को पकड़ने में सक्षम है?—यह प्रश्न बार-बार मुझे उलझनमें डालता है। आज का बाल साहित्य पूर्व पीढ़ी के समक्ष कहाँ स्थापित है?— यह प्रश्न भी मन में उठता है और एक प्रश्न तब भी मन में उठता था जब मैं लिख रहा था और आज उससे भी बड़े रूप में उठ रहा है कि हिन्दी में किशोर साहित्य और एकांकी साहित्य की ओर बाल साहित्यकार उन्मुख क्यों नहीं हो पाये या नहीं हो पा रहे हैं! जिस प्रकार बड़ों के लिए लिखने वालों के लिए बाल साहित्य लिखना चुनौती पूर्ण कार्य रहा है उसी प्रकार क्या बाल साहित्यकारों के लिए किशोर और एकांकी साहित्य लिखना चुनौतीपूर्ण है? पूर्व पीढ़ी के बाल साहित्यकारों ने कुछ एकांकी साहित्य लिखा भी; लेकिन आज की पीढ़ी के बाल साहित्यकार इस ओर से उदासीन दिखाई देते हैं। यही नहीं, नई पीढ़ी के कथाकारों में बाल साहित्य के प्रति वह समर्पण भी नहीं दिख रहा। यह सब चिन्ता का विषय है।

आज जहूरबख्श, विष्णु प्रभाकर, निरंकार देव सेवक, श्रीप्रसाद, राष्ट्रबंधु, विनोदचंद पांडेय, हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारती, चन्द्रपाल सिंह यादव मयंक जैसे रचनाकारों जैसा समर्पण और प्रतिबद्धता अतीत की बात हो गयी है। इस सबके लिए निजी कारणों के साथ जो दूसरे मुख्य कारण हैं उनमें प्रकाशकीय स्थितियों की भी भूमिका है। जनसत्ता के अतिरिक्त शायद ही कोई समाचारपत्र बाल साहित्य प्रकाशित करता है। बाल साहित्य ही क्यों, दो दशक पूर्व ससम्मान साहित्य प्रकाशित करने वाले अखबारों ने साहित्य से ही पीछा छुड़ा लिया है। उनके लिए अमिताभ बच्चन के छींकने और शाहरुख खान के थिरकने के लिए स्पेश देना साहित्य को स्थान देने से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। साहित्यिक पत्रिकाएँ पहले भी कम थीं, अब उनकी संख्या और भी कम हो चुकी है। प्रकाशकों में बाल साहित्य प्रकाशित करने की रुचि नहीं रही, क्योंकि ’आपरेशन ब्लैक बोर्ड’ के बाद सरकारी खरीद शायद ही हुई हो और यदि हुई भी तो उसमें दलाल व रिश्वतखोर लेखकों-पत्रकारों का हिस्सा अधिक नहीं रहा। ऎसी स्थिति में प्रकाशकों ने उस साहित्य से बचना उचित समझा जिसके लिए उनको अधिक माथा-पच्ची करनी पड़े। बीस-पचीस वर्ष पहले स्थिति इतनी विकट न थी। प्रकाशक बाल साहित्य की पुस्तकें बेचते थे और लेखकों को लूटते भी थे। वे मिट्टी के भाव पांडुलिपियां खरीदते थे और कितने ही ऐसे थे जो उन खरीदी पांडुलिपियों के बल पर स्वयं न केवल बाल साहित्यकार बन बैठे बल्कि बाल साहित्य पुरस्कारों से सम्मानित भी होते रहे। इन स्थितियों ने भी शायद नई पीढ़ी को हताश किया होगा। यह एक ऎसा विषय है जिस पर गंभीर चर्चा किए जाने की आवश्यकता है।

ऐसी हताशापूर्ण स्थितियों में यदि कोई बड़ों के साहित्य के साथ ही बाल साहित्य की ओर उन्मुख होता है तब यह न केवल प्रसन्नता का विषय है बल्कि स्वागत योग्य है। बलराम अग्रवाल उन साहित्यकारों में हैं जिनकी सक्रियता कहानी और लघुकथा में है और रही है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ग्रहण करने के उपरान्त उन्होंने कुछ उल्लेखनीय कविताएँ भी लिखी हैं। उससे भी अधिक चौंकाने का कार्य उन्होंने ‘ग्यारह अभिनेय बाल एकांकी’ प्रकाशित करवाकर किया है। इन एकांकियों का प्रकाशन दिल्ली के भावना प्रकाशन के सहयोगी पंकज प्रकाशन ने किया है। ये बाल एकांकी न केवल पठनीयता की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं बल्कि ये पूर्णतया मंचीय व्यवस्था के अनुकूल हैं। ऎसा नहीं है कि बलराम अग्रवाल में अकस्मात बाल साहित्य की प्रतिभा प्रस्फुटित हुई। पुस्तक के प्रारम्भ में लंबी भूमिकास्वरूप ‘मेरी बाल साहित्य यात्रा’ में उन्होंने इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा है कि 25 फरवरी, 1969 को (जब उन्होंने उम्र की सोलहवीं दहलीज ही लाँघी थी) उन्होंने दो बाल कविताएँ लिखी थीं। उनकी डायरी इस बात की गवाह है कि समय-समय पर वह लिखते रहे, लेकिन उन रचनाओं को संकोचवश कभी अपने नाम से प्रकाशित नहीं करवाया। कभी उसे ममेरी बहन के नाम तो कभी अपने बच्चों के नाम से उसे प्रकाशित करवाते रहे। भूमिका में उनकी यह ईमानदार स्वीकृति उनके प्रति आदर उत्पन्न करती है। ‘ग्यारह अभिनेय बाल एकांकी’ में ‘पिंकी और पापा’, ‘सेर को सवा सेर’, ‘आज का गाँधी’, ‘रैली का एग्रीमेंट’, ‘टिंकू बन गया टीचर जी’, ‘हम होंगे कामयाब’, ‘शिवाजी की बहन’, ‘कृष्ण का नामकरण’, ‘लालच बुरी बला’ के साथ दो
नृत्य एवं संगीतपरक काव्य नाटिकाएँ—‘गिनती का गीत’, और ‘नहीं रहेंगे गर जंगल’ संग्रहीत हैं।

उपरोक्त सभी एकांकियों में बलराम अग्रवाल की बाल मनोविज्ञान की समझ, परख और पहुँच स्पष्ट है। सभी में लेखक का परिपक्व मंचीय ज्ञान विद्यमान हैं और इसका मुख्य कारण है कि वह स्वयं मंच से जुड़े रहे हैं। ‘पिंकी और पापा’ में पिंकी अपनी माँ के मोबाइल से जिस प्रकार दादी बनकर अपने पापा को नसीहतें देती है वह रोचक ही नहीं प्रेरणास्पद भी है। सभी एकांकी आधा घंटा से एक घंटा अवधि के दौरान खेले जा सकने योग्य हैं और बच्चों के लिए बेहद रोचक व प्रेरणास्पद हैं। ‘सेर को सवा सेर’ एक चाय वाले को सबक सिखाते एक सामान्य से अजनबी व्यक्ति को आधार बनाकर लिखा गया है जिसके माध्यम से लेखक ने जात-पाँत पर गहरी चोट करते हुए बच्चों में सांप्रदायिक सौहार्दभाव उत्पन्न करने का प्रयत्न किया है। ‘आज का गाँधी’ अन्ना हजारे को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध बच्चों में भावना उत्पन्न करने में सक्षम है। नेपथ्य में गाया जाना वाला गीत—“तू भी अण्णा, मैं भी अण्णा, देश का बच्चा-बच्चा अण्णा… चुनिया अण्णा, मुनिया अण्णा, गुड्डू-डब्बू-दत्ता अण्णा—” बहुत ही आकर्षक बन पड़ा है। ‘रैली का एग्रीमेण्ट’ वर्तमान भ्रष्ट राजनीति पर चोट करता एकांकी है। ‘टिंकू बन गया टीचर जी’ में टिंकू के माध्यम से वैज्ञानिक तथ्यों को प्रस्तुत किया गया है। ‘हम होंगे कामयाब’ मजदूर आंदोलन के माध्यम से बच्चों में मजदूरों की स्थिति को उद्घाटित करता है। ’शिवाजी की बहन’ शिवाजी के उत्कृष्ट आचरण पर प्रकाश डालता है जो बच्चों को नैतिक उत्थान के लिए प्रेरित करता है। ‘कृष्ण का नामकरण’ कंस को केन्द्र में रखकर लिखा गया एक हास्य एकांकी है, लेकिन यह मात्र हास्य एकांकी ही नहीं है. अपनी रचनात्मक मौलिकता में यह बच्चों के शब्द ज्ञान और तार्किकता में अभिवृद्धि करने में सक्षम है। ‘लालच बुरी बला’ एक शिक्षाप्रद एवं विनोदप्रिय एकांकी है। ‘गिनती का गीत (गिनती पर आधारित) और ‘नहीं रहेंगे गर जंगल’ (वन-संपदा संरक्षण पर आधारित) संगीतमय काव्य नाटिकाएँ हैं और स्वाभाविक है कि बच्चों के लिए ये अत्यंत आकर्षक हैं। उपरोक्त रचनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि लंबी अवधि तक बाल-साहित्य को अपने अंतर्मन में छुपाए रखने वाले बलराम अग्रवाल का इस दिशा में पदार्पण एक शुभ संकेत सिद्ध होने वाला है। वरिष्ट कथाकार और चित्रकार राजकमल ने पुस्तक का कवर तैयार करने के साथ सभी एकांकियों के रेखांकन कर पुस्तक को आकर्षक बना दिया है।



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