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ISSN 2292-9754

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11.11.2017


एक प्रेम कहानी यह भी

मैं यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रही थी उन दिनों। फ़्लोर पर हर तरह के लोग बैठा करते थे। मार्क्स को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले। कई चीज़ों को लेकर आदर्श बघारने वाले। पड़े-पड़े सुस्ताने वाले। कई प्रेम के नये-नये क़िस्से भी पनप रहे थे। शाम के समय तो कई प्रेमी युगल तो यूँ बैठे दिखते जैसे पत्थर की मूर्तियाँ हो बस एकटक एक दूसरे को निहारते हुए। कभी-कभी उन्हें देखकर ईर्ष्या भी होती कि हमें कोई ऐसा नहीं मिला जिसके साथ बैठकर कुछ देर के लिए ही सही समय की शाश्वतता का अनुभव किया जा सके। ऐसे ही प्रेम का दावा करने वाले हमारी मित्र मण्डली में दो महानुभाव थे। शैला और राकेश। वे हमारे साथ बैठते ज़रूर थे। बड़ी-बड़ी बातें होतीं। स्त्री और दलित आंदोलन की बातें। समाज को बदलने की बातें। पर जल्दी ही इन बातों से पल्ला झाड़कर वे कब कहाँ निकल जाते, कहा नहीं जा सकता। उनकी दुनिया अब शायद कहीं और बस रही थी। हम बेचारे तो बस दूर से औरों के प्यार का नज़ारा करते थे। शैला उन दिनों मुग्धा नायिका जैसी लगती थी। वह स्कूल में पढ़ाती थी। पर आजकल वो अध्यापिका कम और विद्यार्थी ज़्यादा लगती थी। राकेश की कक्षा में बैठने वाली विद्यार्थी। उसे वह दुनिया का सबसे अधिक आदर्श पुरुष मानती थी। जब भी उससे बात होती तो वह राकेश की प्रशंसा का कोई भी अवसर हाथ से न जाने देती।

वैसे बहुत अधिक बोलने वालों में से शैला न थी पर मैं इतना जानती थी कि अपने घर के माहौल से वह जब-तब बाहर निकल आने का बहाना ढूँढ़ा करती। ऐसा क्या था उसके घर में ठीक से कहना मुश्किल है पर शायद वैसा ही कुछ जो हम में से ज़्यादातर लड़कियाँ अपने घरों में महसूस करती रहीं होंगी। एक तरह की घुटन, अपने मन का न कर पाने की और अपने मन का न कह पाने की। ब्राह्मण परिवार की कन्या शैला उन ब्राह्मणवादी या कोई भी वादी ढकोसलों से निकल आना चाहती थी। राकेश भी दलित आंदोलन का एक बड़ा चेहरा था। दोनों शादी करना चाहते थे। शैला ब्राह्मण परिवार से थी। उसका परिवार इस शादी के ख़िलाफ़ था। पर वो दोनों अक्सर शामों को मिलते और एक दूसरे के साथ का मज़ा लेते। शैला अपनी पीएच. डी. कर रही थी। राकेश के पास अभी नौकरी नहीं थी पर वे नौकरी के लिए इन्तज़ार भी नहीं करना चाहते थे। शैला की एक और सहेली थी इरा। पूरी तरह शादी जैसी संस्था के ख़िलाफ़। वो अक्सर शैला से कहती, “ये हमेशा हमें कोई मर्द ही क्यों चाहिए होता है सहारे के लिए। हम औरतें अकेला रहना कब सीखेंगी।“

शैला का जवाब होता, "तुझे कोई मिला नहीं ना प्यार करने वाला इसलिए ये सब बोलती रहती है। कोई मिल जाता तो इतने ख़िलाफ़ न होती तू शादी के।“ शैला नहीं मानती थी कि शादी में स्त्री की आज़ादी ही छिनती है। पुरुष को भी तो बन्धन में बँधना पड़ता है और सवाल बन्धन का नहीं, सवाल प्रेम का है।

ख़ैर शैला जानती थी कि वो क्या करना चाहती थी। राकेश के मित्र भी इस विवाह को लेकर अत्यंत उत्साहित थे क्योंकि उनका दलित मित्र एक ब्राह्मण कन्या से विवाह करने जा रहा था। इस विवाह को एक नये क्रान्तिकारी क़दम के रूप में देखा जा रहा था। इस बीच एक और घटना घट गयी थी। शैला के पिता और भाई राकेश के होस्टल पहुँचे। वहाँ मार-पीट हुई और राकेश को धमकाया भी गया कि वो शैला की ज़िन्दगी से निकल जाये हमेशा के लिए। पर इस मार-पीट के बाद अचानक पता नहीं क्या हुआ कि राकेश ने उसके एक हफ़्ते बाद ही शैला को घर से भगा लेने की तैयारी कर ली। ये जल्दबाज़ी उसके लम्बे चलते आ रहे प्यार का नतीजा थी या उस मारपीट के बाद चोट खाये उसके अहम् का; ठीक से कहा नहीं जा सकता पर शैला जो देख रही थी वो प्यार ही था।

वो दोनों भाग गए थे पर कहाँ? किसी को नहीं पता था। बहुत दिन कैम्पस में उनको लेकर कानाफूसी चलती रही। बहुत सारे ब्राह्मण लड़कों का खून भी खौला और बहुत सारे छोटे-बड़े झगड़े भी हुए। आख़िरकार काफ़ी दिनों के बाद अचानक वे दोनों वापिस दिखाई दिये। शैला के हाथों में लाल चूड़ा था और माँग में सिन्दूर। शैला ख़ुश थी तभी राकेश ने कहा कि आज तुम्हें बाईक पर बैठा कर पूरे कैम्पस के दो चक्कर लगाना चाहता हूँ। ताकि सबको दिखा सकूँ कि एक दलित जो ठान लेता है वो करके दिखाता है। पहली बार मुझे शैला की आँखों में कुछ अजीब दिखाई दिया जो इस से पहले मैंने कभी नहीं देखा था उस नज़र में एक खालीपन और नमी थी। उसकी मोटरसाईकिल दहाड़ रही थी। उसने शैला को फिर आवाज़ दी, "चलो बैठो जल्दी करो"। इस आवाज़ में प्यार कम और चक्कर लगाने की जल्दी ज़्यादा थी। जैसे शैला कोई ट्रॉफी थी जिसे राकेश सबको दिखाना चाहता था।

उसी समय इरा भी वहाँ आ पहुँची, "लो काफूर हो गया प्रेम अभी से रौब झाड़ना शुरू। आदमी अपनी औक़ात जल्दी ही दिखा देता है।" मैं बस इतना ही कह सकी कि अब तुम शैला से ये सब बातें ज़्यादा मत करने लगना।

धीरे-धीरे चीज़ें पटरी पर आने लगीं थीं। शैला ने पीएच. डी. के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लिया था। वह अपने काम में जुट गयी थी पर उसके घर वालों ने उससे अपना नाता पूरी तरह से तोड़ लिया था। वह अपनी माँ से भी बात नहीं कर सकती थी। इस बीच उसकी दादी का भी देहांत हो गया। वह वहाँ जाना चाहती थी। पर राकेश को यह कहने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। वह राकेश को बिना बताये ही वहाँ चली गयी थी पर उसे देखते ही उसके पिता का ग़ुस्सा उस पर बरस पड़ा था। वे ये भी भूल गये थे कि वे शमशान घाट में खड़े थे और उन्हें अपनी माँ की चिता को अग्नि देनी थी। शैला के भाई ने उसे बाहर खदेड़ दिया। तब तक राकेश को भी सब कुछ मालूम हो चुका था। वह घर पहुँचते ही शैला पर चिल्लाया, "अगर तुम्हें अपनी इज़्ज़त की चिन्ता नहीं तो कम से कम मेरी तो कर लिया करो"। शैला अगले दिन से गुमसुम रहने लगी थी। वह पहले से और भी कम बोलने लगी थी। पर इरा हर समय उसके पीछे पड़ी रहती थी। “कहा था ना सोच लो, समझ लो। आदमी ब्राह्मण हो या दलित आदमी आदमी ही होता है उसका अहम उसके लिए सबसे बड़ी चीज़ है”। मुझे इरा पर बहुत ग़ुस्सा आता कि वो ऐसे समय पर भी डिस्कोर्स झाड़ने से बाज़ नहीं आती। उस समय मुझे लगता जैसे इरा अपने समझे और माने सच को सच होते देख ख़ुश थी। पर शैला का क्या? उसने तो प्यार किया था। अब शैला से ज़्यादा मुलाक़ात नहीं होती थी। वो कभी मिल भी जाती तो हमेशा कोई न कोई बहाना लगकर वहाँ से चले जाना चाहती थी। राकेश अगर वहाँ होता भी था तो अपने दोस्तों में ज़्यादा मसरूफ़ दिखाई देता था। उस दिन इरा फिर कुछ बड़बड़ा रही थी। तुम्हें पता है कुछ तो गड़बड़ है शैला के साथ।

मैंने पूछने की कोशिश की, पर कुछ बताती ही नहीं। एक दिन राकेश ज़ोर-ज़ोर से बोल रहा था, "आज उसने मांस बनाया मेरे प्यार में और मैंने खिला भी दिया। उसे भी तो पता चले हम कैसे रहते हैं।“ तभी इरा उत्तेजित हो गयी। ये साला तो सन्डास तक साफ़ कराता है उससे। पता नहीं साबित क्या करना चाहता है। अभी इनकी शादी को बमुश्किल दो महीने ही गुज़रे होंगे और ये आलम है। कुछ और दिन यूँ ही गुज़र गए। अचानक एक रात इरा का फोन बजा। उसकी आवाज़ में हड़बड़ाहट थी और घबराहट भी।

“तुम्हें पता चला?”

“क्या कुछ बताओगी भी?”

“शैला ने ख़ुदकुशी कर ली। राकेश सीने में दर्द की शिकायत कर रहा है। झूठ बोल रहा है साला इसने ही उसे मारा है।“ इरा बड़बड़ाती जा रही थी। मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। बस सामने शैला का प्यार में डूबा चेहरा था और उसकी एक ही बात कानों में गूँज रही थी "तुम्हें पता है राकेश दुनिया का सबसे अच्छा आदमी है। उसके साथ मैं कहीं भी जी सकती हूँ।" परआज शैला मर चुकी थी। अगले दिन पोस्ट मार्टम के बाद शैला का शरीर उसके घर वालों को सौंपा जा चुका था, वही घर वाले जो उससे कबके नाता तोड़ चुके थे।

शैला की चिता धू-धूकर जल रही थी। उसका लाल रंग का चूड़ा भी जो उसने राकेश के नाम से पहना था। वो भी उसी चिता में जल गया होगा। राकेश को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया गया था। उसका परिवार अपने घर वापस चला गया था। अगले दिन इरा ने महिला मोर्चा के साथ मिलकर शैला की याद में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की थी। सब अपने अपने काम पर लग चुके थे। शैला ने न तो ब्राह्मण से प्यार किया था और न एक दलित से। बकौल शैला"वो दुनिया के और आदमियों जैसा नहीं था। उसका नाम राकेश था। "दुनिया का सबसे अच्छा आदमी। ये शैला की लव स्टोरी थी। वो शैला जो गले तक डूबी थी प्यार में। जिसने एक ऐसे आदमी से प्यार किया था जिसका नाम राकेश था।


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