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ISSN 2292-9754

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01.16.2018


बोझिल
ऋचा वर्मा

साथियों से मिलते हुए अब हम
पहले से अधिक मैच्योर हैं

क्योंकि अल्हड़ बातों की ताबीर यहाँ -
पहले की तरह नहीं होती
'प्रेम' और 'परिवार'
ऐसे शब्द हैं
जो भारी-भरकम बोझ से लदे हैं..
इनका ज़िक्र ज़िम्मेदारी के लिस्ट में है

अब अधिक मैच्योर हैं हम
महीनों बीतने पर भी..
कॉलेज के ख़ास दोस्तों से मिलते हुए
इस वैज्ञानिक युग में
हम वक़्त ज़ाया नहीं करते
'प्रेम' और 'परिवार' जैसी बातों पर सिवाय..
एक सरकारी नौकरी के..

वजह इतनी सी है
कि हम अब पहले से कहीं अधिक मैच्योर हैं
..और अब बोझिल है
वह अल्हड़ उम्र की ख़ामख़्याली हमसे।


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