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01.20.2008
 

तिनकों में आग लगाकर हाथ तापने वालों
रवि कुमार


तिनकों में आग लगाकर हाथ तापने वालों
ढूँढ़ो सूखी लकड़ियाँ, रातें और सर्द होंगी

सुअर औ भेड़ों से सीखो इंसानियत की बातें
आपस में लिपटकर सोने से रातें हमदर्द होंगी

इस वक़्त को आना है हर साल ज़िन्दगी में
कुछ सोचो अभी ही वर्ना हर साँसें बर्फ होंगी

इस मौसम भी आयेंगे लिहाफ बाँटने वाले
हाथों पर कंबल होंगे, आँखें ख़ुदगर्ज होंगी

चंदा को मिले आग ये माँगो उस ख़ुदा से
या गिरा दो वे घर, जिनकी दीवारें बेदर्द होंगी

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