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01.20.2008
 

‘अनलहक़’ जिसने कहा
रवि कुमार


‘अनलहक़’ जिसने कहा वो बोटी-बोटी कट गया
ख़ुदा अपनी ख़ुदाई में जब भी आया मिट गया

तलाश में पाक़ीज़गी की सजदे सब करते रहे
आया जो पाक़ बनकर क़ाफिर होकर कट गया

तसव्वुर में जिस मोहब्बत का अक्स खींचा करते थे
आया जब जिस्म लेकर सूली पर वो लटक गया

लाया जिसने सबकुछ अपना सबके बीच लुटाने को
आकर सबके बीच ख़ुद ही सबके हाथों वो लुट गया

पैदाइश थी इंसान की अब नाग बनकर जीता है
चंदन बनकर जो मिला नाग उसी से लिपट गया

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