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ISSN 2292-9754

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01.28.2016


बहेलिया और कबूतरी

एक बहेलिया था। उसका स्वभाव भी बहेलियों जैसा निर्दयी और चेहरा उन्हीं जैसा डरावना था। उसका न तो कोई मित्र था और न नाते-रिश्तेदार। उसकी निर्दयता के कारण उसके बीबी, बच्चों ने भी उसका साथ छोड़ दिया था। उसकी मारपीट और गाली-गलौज के कारण बीबी ने उससे हमेशा के लिए छुटकारा पाने और मुआवज़ा प्राप्त करने के लिए उसके ऊपर मुकदमा ठोंक रखा था। मुकदमें में बचने के लिए बहेलिया एक वकील को रोज़ लज़ीज मांस वाले पक्षी पहुँचाया करता और घंटो उनके पास बैठकर उसकी खुशामद करता था।

एक दिन बहेलिया रोज़ की तरह पिंजड़ा, डंडा और जाल लेकर, प्राणियों का वध करने और पक्षियों को पकड़ने के लिए जंगल में गया। सबसे पहले उसे एक कबूतरी हाथ लगी, सो उसे उसने पिजड़े में डाल लिया।

उस दिन आसमान में घने काले बादल छाए हुए थे। देखते-देखते हवा ज़ोर पकड़ने लगी और मूसलाधार बरसात होने लगी। लगता था प्रलय आ जाएगा। मौसम की मार से बहेलिए का कलेजा काँपने लगा। भीगने के बाद वह रह-रहकर सिहर उठता। वह बरसात और ठंड से बचने के लिए एक घने पेड़ के नीचे जा पहुँचा। कुछ समय बाद बरसात थम गई। आसमान खुल गया। उसकी जान में कुछ जान आई। हवा रुक गई थी फिर भी वह पेड़ हहरा रहा था। बहेलिए ने सोचा कि शायद उस पेड़ पर किसी भूत-प्रेत का निवास हो। उसने हाथ उठाकर कहा, "इस पेड़ पर जिसका भी निवास हो मैं उसकी शरण आया हूँ। ठंड से मेरी हड्डियाँ काँप रही हैं और भूख से मेरी जान निकली जा रही है। मेरी मदद करो।"

पेड़ की एक शाखा पर बैठकर एक कबूतर अपनी उसी कबूतरी की राह देख रहा था संयोग से जिसे बहेलिए ने पिंजड़े में डाल रखा था। राह देखते-देखते बहुत देर हो गई तो कबूतर भी, आदमियों की तरह, कबूतरी के चरित्र पर संदेह करते हुए ऐसी कुलटा पत्नी मिलने के लिए अपने जीवन को धिक्कारने लगा। सोचने लगा कि पुरुष वही धन्य ही जिसकी पत्नी पतिव्रता हो और उसके प्राण अपने पति में बसते हों। जब उससे पीड़ा सहन नहीं हुई तो विलाप करने लगा।

बहेलिए के पिंजरे में फँसी हुई कबूतरी उसका विलाप सुन रही थी। उसे मन ही मन बड़ा संतोष हुआ कि उसका कबूतर उसके विरह में दुःखी है। अपना बंधन भूलकर कबूतरी पति को नीतिपरक बातें सुनाने लगी- "उस औरत को औरत कैसे कहा जा सकता है जिसका पति उससे संतुष्ट न हो। यदि स्त्री से पति संतुष्ट है तो समझ लो सारे देवता उससे संतुष्ट हैं। जिस स्त्री से उसका पति संतुष्ट न हो तो उसे वैसे ही जलकर मर जाना चाहिए जैसे जंगल में आग लगने पर पत्तों और फूलों से लदी हुई लताएँ जलकर राख हो जाती हैं।"

दुनिया की दूसरी औरतों की तरह कपोती को घर-गिरस्ती चलाने के अनुभव के कारण धर्म की कुछ ऐसी बातें मालूम थीं जिनके बारे में वह कबूतर को उतना ही अज्ञानी मानती थी जितना आम तौर पर औरतें अपने पति को मानने की अभ्यस्त होती हैं। उसने कबूतर को उपदेश देते हुए कहा, "सुनो प्रिये, कहा जाता है कि अगर सूर्यास्त के समय कोई अतिथि आए और उसका आदर-सत्कार न किया जाए तो वह अतिथि जाते समय गृहस्थ के सारे पुण्य लेकर चला जाता है और उनके बदले में अपने सारे पाप उसके ऊपर लाद जाता है। कहीं ऐसा न हो कि यह सोचकर कि इस बदमाश बहेलिए ने मेरी घरवाली को बाँध लिया है, तुम कुछ उल्टा-सीधा कर बैठो। मैं जो इस हालत में पहुँची हूँ उसका कारण मेरे पूर्व जन्म के पाप हैं।"

कबूतरी का ज्ञान समुद्र की तरह अगाध था। उसका उपदेश सुनकर कबूतर ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। कबूतरी को डर लगा कि कहीं पूरी बात उस नालायक़ मर्द की अक़ल में आई ही न हो, इसलिए अपने उपदेश पर एक ताज़ी परत चढ़ाती हुई बोली, "देखो, घबराने और दुःखी होने की कोई बात नहीं है। दरिद्रता, रोग, दुःख, बंधन और विपदाएँ तो कर्म रूपी वृक्ष के फल हैं। इन फलों का उपभोग प्राणी को करना ही पड़ता है। इसलिए मन में किसी तरह का मैल लाए बिना अतिथि की सर्वांग रूप से सेवा करो।"

कबूतरी ने सोचा कि वह उसकी अर्धागिंनी है अतः सर्वांग रूप से सेवा करने के लिए उसे भी पति के साथ उपस्थित होना चाहिए, अतः कबूतर उसकी मुक्ति का उपाय करेगा। परंतु अपनी अक़ल को धता बताते हुए कबूतर बहेलिए के पास जा पहुँचा और उससे बोला, "अतिथि देवता, आपने बड़ी कृपा की जो यहाँ पधारे। यह भी आपकी कृपा ही है जो आपने मेरी घरवाली को पकड़ कर मारने की बजाय पिजड़े में डाल लिया है। आपका स्वागत है। बताइए आपकी क्या सेवा करूँ? आप बिना संकोच के आज्ञा दें ताकि मैं उसका पालन कर सकूँ। समझ लें आप घर में ही हैं।"

"घर" के नाम से बहेलिए को अपनी बीबी की याद आ गई। और बीबी के नाम से उसके द्वारा दायर मुक़दमे का स्मरण हो आया। बहरहाल अतिथि-सत्कार करने के नियम बनाने वाले ऋषियों को मन ही मन धन्यवाद देते हुए बहेलिए ने कहा, "इस समय तो मुझे जाड़ा सता रहा है। उसे दूर करने का उपाय करिए नहीं तो मेरी जान ही चली जाएगी।"

इतना सुनते ही कबूतर उड़कर चला गया। बहेलिया असमंजस में पड़ता उसके पहले कबूतरी ने कहा, "अतिथि देव आप घबराएँ नहीं। वह आग लेने गया है। तब तक आप इस पेड़ के कोटर से सूखे पत्ते निकाल लें। यह कार्य करने में आपको कोई कष्ट हो तो थोड़ी देर के लिए मुझे मुक्त कर दें।"

बहेलिए ने कबूतरी की चाल को समझते हुए कहा, "अपना काम करने में कष्ट कैसा!" यह कहकर वह स्वयं कोटर से सूखे पत्ते निकालकर बाहर रखने लगा। ज़रा सी देर में पत्तों का ढेर लग गया। तभी कबूतर कहीं से एक लुकाठी लेकर आ गया और उसे सूखी पत्तियों पर रखकर आग जला दी।

जब आग दहक उठी तो उसने अपने अतिथि से कहा, "हे अतिथि, अब आप आराम से आग तापकर अपने शरीर को गर्म कीजिए। मेरे पास आपके स्वागत के लिए और कुछ तो है नहीं। दुनियाँ में बहुत से लोग हैं जिन्हें ईश्वर ने इतना दिया है कि वे चाहें तो हज़ारों लोगों को प्रतिदिन भोजन करा सकते हैं पर वे ऐसा नहीं करते। मैं तो दीन-हीन हूँ। अपने ही पेट का जुगाड़ नहीं कर पाता तो अतिथि को कहाँ से भोजन कराऊँ। मेरे तो जीने को धिक्कार है। फिर भी इस साधनहीन शरीर से ऐसा कुछ करना चाहता हूँ जिससे अतिथि की पूजा हो सके।"

बहेलिया आश्चर्य में पड़ गया। उससे बाहर निकलते हुए उसने पूछा, "हे सद्गृहस्थ, तुम क्या करना चाहते हो।"

कबूतर ने बहेलिए से कहा, "आप थोड़ा धैर्य धरें, मैं अभी आपके लिए गर्मागर्म भोजन का कोई जुगाड़ करता हूँ।"

भोजन का नाम सुनकर कई घंटे बाद बहेलिए के मुँह में लार का स्राव हुआ। वह काल्पनिक भोजन का स्वाद ले ही रहा था कि उधर अग्नि की प्रदक्षिणा कर कबूतर आग में कूद गया। बहेलिए ने अतिथि सत्कार की ख़ातिर कबूतर का त्याग देखा तो उसका मन पसीज कर पानी हो गया। उसे डर लगा वह बह न जाए। बहरहाल कूबतर के त्याग से उसकी आँखें खुल गईं और वे बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। उन्हीं खुली आँखों से उसने देखा कि कबूतर के पंख जल रहे हैं। थोड़ी ही देर में उसका मांस भुनकर जलने की स्थिति में आने वाला था कि उसने उसे निकाल लिया।

उधर प्राण-प्यारे कबूतर को जलता देख कबूतरी "हा स्वामी" कहकर बेहोश हो गई। बहेलिए ने अवसर का लाभ उठाकर कबूतर का स्वादिष्ट मांस उदरस्थ कर लिया। कबूतरी चेत में आई तो विलाप करने लगी। उसके घावों पर काल्पनिक मलहम रखने के लिए बहेलिए ने कहा, "बहन, रोओ मत। यह कबूतर देखने में ही पक्षी था। मुझे तो लगता है कि यह कोई महात्मा रहा होगा जिसने मेरी आँखें खोलने के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। मैं घोर पापी हूँ। अब तक मैं पाप कर्म में ही लगा रहा। मरने के बाद मुझे घोर नरक ही भोगना पड़ेगा। अब मैं यह पाप कर्म छोड़कर तप करूँगा।"

कपोती सती औरतों की तरह विलाप करने लगी। रोते-रोते कहने लगी, "हे स्वामी अब तुम्हारे बिना मैं जीकर क्या करूँगी ? अब इस संसार में जीने का कोई अर्थ नहीं रह गया है! दीन, पतिहीन, अभागिनी नारी का जीवन व्यर्थ है।"

कबूतरी ने बहेलिए से कहा, "भाई मेरी मदद करो। मुझे पिजड़े से बाहर निकलो ताकि पतिव्रता स्त्री की तरह मैं अपने पति के साथ सती हो सकूँ।"

बहेलिए का पेट पूरा कबूतर खाकर भर चुका था अतः उसमें सोच-विचार करने की शक्ति आ गई थी। उसे याद आया कि वकील साहब के यहाँ उसने सुना था कि सती होना या सती होने का प्रयत्न करना या सती होने में सहायता देना अपराध हैं। इस पर पता नहीं कोई धारा भी लागू होती है। अतः उसने कपोती से कहा, "प्रिय बहन, सती होना या उस कार्य में सहायता देना दोनों ग़ैर-कानूनी हैं। तुम तो स्वर्ग में जा विराजोगी लेकिन तुम्हारा यह ग़रीब भाई तुम्हें सती होने में सहायता देने के कारण कानून के शिकंजे में फँस जाएगा। इसलिए निहोरा करता हूँ कि इस दक़ियानूस विचार को त्याग दो। मैं तुम्हें अपने घर ले चलता हूँ वहाँ आराम से मेरे साथ रहना। लेकिन नहीं, मेरा घर तो सूना है, वहाँ तुम्हारा व्याकुल मन और दुःखी होगा। अतः मैं भरे-पूरे घर वाले अपने एक मित्र के यहाँ कुछ दिन के लिए तुम्हें रख दूँगा।"

कबूतरी का श्मशान वैराग्य ख़त्म हो गया। उसने कहा, "भाई, तुम धन्य हो।"

बहेलिए ने पिंजड़ा ले जाकर अपने वकील को फ़ीस की किस्त के रूप में दे दिया। उसके मुड़ते ही वकील में यहाँ कबूतरी पिंजड़े से निकाल ली गई और रात की दावत का इंतज़ाम होने लगा।


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