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ISSN 2292-9754

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02.15.2016


अनुभव की सीढ़ी: संवेदना का महाकाव्य
मधुकर अस्थाना

पुस्तक: अनुभव की सीढ़ी
संपा.: डॉ. रश्मिशील
प्रकाशन: नवभारत प्रकाशन, दिल्ली-110094
मूल्य: 400/रु
वर्ष: 2015

गीत तथा नवगीत का अंतर उसके कथ्य एवं संरचना में मुखरित होता है। हम कह सकते हैं कि छन्द, गीत, नई कविता, ग़ज़ल, और वर्तमान में प्रचलित अन्य सभी काव्य विधाओं को यदि एक में मिलाकर मंथन किया जाए तो उससे जो नवनीत प्रकट होगा उसे नवगीत कहा जाएगा। साधारण जन के जीवन-संघर्ष, जिजीविषा, तथा लोक भाषा के स्पर्श से समंवित नवगीत सामाजिक सरोकारों रागात्मक, संवेदनाओं और जीवन के प्रत्येक पक्ष को समेटकर यथार्थ का संप्रेषण करने में पूर्णतया सक्षम और सफल सिद्ध हुआ है।

उपर्युक्त विमर्श के परिप्रेक्ष्य में डॉ. भारतेन्दु मिश्र का सद्य: प्रकाशित काव्य संग्रह "अनुभव की सीढ़ी" नवगीत के क्षेत्र में मील का पत्थर है। सबसे प्रमुख विशेषता के रूप में प्रस्तुत काव्यकृति डॉ. मिश्र की निरंतर गतिशीलता तथा विकासोन्मुखता का भी संज्ञान कराती है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि कब उनकी सृजनशीलता ने नवगीत के द्वार की सांकल बजाई कब वह द्वार खुला और कब वे नवगीत के चर्चित हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। यह मात्र काव्यकृति ही नहीं, डॉ. मिश्र के विकासक्रम का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है जिसे डॉ. रश्मिशील ने बडे मनोयोग से सुरुचि का परिचय देते हुए संपादित किया है। 173 गीतों/नवगीतों के अतिरिक्त "शब्दों की दुनिया" के अंतर्गत कुछ अनुभव गीत और कुछ मुक्तकों को भी स्थान दिया गया है। अंत में परिशिष्ट शीर्षक में समीक्षा और चुने हुए पत्रों का भी संग्रह है। डॉ. मिश्र कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना, नवगीत, आदि के लिए प्रसिद्ध होने के साथ ही अवधी के विख्यात रचनाकार हैं। संपादन के क्षेत्र में भी वे अनेक पत्रिकाओं का समय-समय पर संपादन करते रहे हैं। उनके द्वारा लिखे गए नाटकों का अनुवाद अन्य भाषाओं में भी किया जा चुका है। आदरणीया संपादक रश्मिशील जी ने "अनुभव की सीढ़ी" को अनेक सोपानों में विभक्त कर प्रत्येक विषय से संबन्धित रचनाओं को अलग अलग शीर्षको में सन्योजित किया है। जो क्रमश:-

1. बांसुरी की देह (राग विराग एवं गृहरति के गीत/नवगीत)
2. बाकी सब ठीक है (नगर बोध/विसंगतियाँ और आस्था के गीत/नवगीत)
3. मौत के कुएँ में (स्त्री मजदूर किसान चेतना: श्रम सौन्दर्य केगीत/नवगीत)
4. जुगलबन्दी (राजनीति-धर्म-दर्शन और बाज़ारवादी समय के गीत/नवगीत)
5. शब्दों की दुनिया (कुछ मुक्तक कुछ अनुभव गीत) तथा अंत में परिशिष्ट के अंतर्गत-पारो प्रसंग (प्रथम गीत संग्रह की भूमिका), समीक्षा (पारो पर एक दृष्टि), आलेख- (नवगीतात्मकता के विरल वैभव: भारतेन्दु) तथा कुछ चयनित पत्र संकलित हैं।

महाकवि प्रो. देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी डॉ. मिश्र के संबन्ध में लिखते हैं कि- "कवि कर्म का संबन्ध भले ही कवि को जन्मसंभवा ईश्वरप्रदत्त प्रतिभा के साथ हो तथापि उसमें क्षीणता निर्दोषता, प्रभविष्णुता, गुणाढ्यता, और रसपेशलता के आयाम व्युत्पत्ति अमन्द अभियोग और साधुकाव्य निषेवण के अभाव में संभव नहीं हो पाते। भारतेन्दु मिश्र ने भी इस सृजन कौशल को युक्तिपूर्वक अर्जित किया है और अपने साहित्यिक संस्कारों को उदग्र बनाया है।"

इस सन्दर्भ में यह समीचीन लगता है कि वास्तव में जिस प्रकार प्रस्तुत कृति का नाम "अनुभव की सीढ़ी "है वह यथार्थ अनुभूतियों की आधारशिला पर ही रची गई है। इसी को दृष्टि में रखकर इन्द्र जी का यह कथन कि- "काल्पनिक आदर्श की तुलना में प्रत्यक्ष यथार्थ कहीं अधिक वरेण्य होता है"। भले ही उस यथार्थ में कटुता विषाक्तता, पराभव, अवसान, अकेलेवन, अवसाद और सर्वहारापन के स्वर क्यों न सुनाई पडें। नवगीतकार ने इन विस्ंगतियों और विडम्बनाओं को जिया है और भोगा है और इनकी प्रामाणिक अभिव्यक्ति अपनी रचनाओं में की है" हर रचनाकार साहित्यकार का एक ही लक्ष्य है- समाज में परिवर्तन, सामाजिक कुरीतियों पाखंडों का विरोध। इसके साथ ही वर्तमान परिवेशगत यथार्थ का चित्रण कर भोली-भाली आम जनता को जागरूक करने का प्रयास करना जिससे वांछित परिवर्तन के प्रति लोगों में चेतना जागृत हो। साहित्य समाज में सीधे-सीधे बदलाव न लाकर उस बदलाव का एक अपरोक्ष साधन है। सर्वहारा वर्ग अपनी दुखद परिस्थितियों का कारण स्वयं ढूँढकर उसका निवारण करने हेतु उद्योग रत हो सके। वांछित जागरूकता लाने की दिशा में डॉ. भारतेन्दु मिश्र का सृजन निश्चित रूप से पूरी तरह सहायक है। उनकी प्रत्येक रचना में तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ वो मारक क्षमता है जो पाठक की चेतना को झकझोर कर चिंतन की दिशा में प्रेरित करती है। डॉ. भारतेन्दु मिश्र जी कथ्य की प्रकृति के अनुरूप प्रतीक बिम्ब में तथ्यगत यथार्थ को सहेजते हैं जिसका सौन्दर्यबोध पारंपरिक गीतों से अलग नूतन उद्भावनाओं से सन्युक्त होता है। "अब कस्तूरी कहाँ" में उनका यथार्थ निम्नांकित रूप में व्यक्त होता है- "एक और भ्रम जी ले भाई/धूप सुनहरी है/रात अमावस की अन्धियारी/नदिया गहरी है/शब्द मछेरे जाल लिए हैं/तट पर डेरा डाले/अर्थहीन डोंगियाँ तैरतीं/संत्रासो के भाले/रो मत सोन मछरिया /यह तो नदिया बहरी है/बया डाल पर बैठ बैठ कर/दिन भर रोती है/फिर बहेलिए के पिंजरे में/ थककर सोती है/दाना पानी बिना मरी कल एक गिलहरी है/बीत रही है उमर न जाने कब आ जाय बुलावा/देह गन्ध के भ्रम में मन को देता रहा भुलावा/अब कस्तूरी कहाँ/यहाँ तो हिरना शहरी है।"

प्रस्तुत नवगीत में ऐसे प्रतीकों का चयन किया गया है जिनसे हम सुपरिचित हैं और साथ ही निरीह प्राणी हैं जो सर्वहारा वर्ग का अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुरूप प्रतिनिधित्व करते हैं। यहाँ सहजता सरलता एवं सरसता के साथ अपनी अनुभूतियों को सामाजिक ताने-बाने में जिस शिल्प और शैली का प्रयोग हुआ है वह डॉ. भारतेन्दु मिश्र की व्यक्तिगत विशेषता है। इसके साथ ही उनके सृजन में विविधता है - कथ्य के अनुसार भाषा, प्रतीक–बिम्ब तथा शिल्प में भी अलग ढंग के प्रयोग हैं जो एक ओर रचना के सौन्दर्य भाव और पठनीयता में अभिवृद्धि करते हैं। दूसरी ओर पारंपरिकता का लेश मात्र भी अवशेष नहीं रहता साथ ही उनका ताज़ापन भी समय सीमा में आबद्ध नहीं होता। वर्षों पहले रची गयी रचना वर्तमान परिस्थितियों में भी नूतन प्रतीत होती है। उनके सृजन की परिधि में वह सब कुछ वर्तमान है जिनसे मानव जीवन निरंतर रूबरू होता रहता है। पर्व और प्रकृति से लेकर सर्वहारा के जीवन संघर्ष तक उसकी व्याप्ति है इसी लिए डॉ. मिश्र की रचनाएँ प्राणवंत लगती हैं। मिश्र जी वास्तव में शब्दों के कलात्मक प्रयोग के जादूगर हैं। नवगीत की यथार्थोन्मुख शैली के साथ भारतीय दर्शन का सामंजस्य भी उनकी सिद्धि का सुन्दर उदाहरण है जिसमें जीवन की क्षणभंगुरता के साथ आम आदमी की दैनन्दिन पीड़ा का भी सफल सन्योजन किया गया है- "चाम की चदरिया ले जाओगे कहाँ तुम/कल मेरे भाई पछताओगे यहाँ तुम/सांसों की डोरी है/नेह की लड़ी है/जीवन तो नोन तेल साबुन लकड़ी है/ अपने पैरों घर जा पाओगे कहाँ तुम/अभी समय है अपनी देह आप मांज लो/आँखों में सच्चाई का सुरमा आँज लो/पर ये मैला मन धो पाओगे कहाँ तुम/दूर देश के पंछी दूर है बसेरा/हाट उठ रही है अब हो रहा अन्धेरा/लौट इधर जाने आ पाओगे कहाँ तुम/"

प्रस्तुत नवगीत में एक ओर जीवन का यथार्थ नोन तेल लकड़ी साबुन आदि के साथ स्नेह संबन्धों की यथार्थता प्रकट की गई है तो दूसरी ओर संसार की नश्वरता को भी स्पष्ट किया गया है। कहीं-कहीं मुद्रण में एक ही गीत दोबार मुद्रित हो गया है। पृ.53 पर- "खुशबुओं के खत" मुद्रित है और वही गीत पृ.58 पर "कमल की पांखुरी पर" शीर्षक से मुद्रित है और अनुक्रम में वही प्रदर्शित है। इस खंड में "देह का व्यापार" शीर्षक से प्रस्तुत गीत भी पाठक का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम है। वर्षा अधिक होती है तो नदी में बाढ़ आने की आशंका होती है गर्मी में शुष्क हो गई नदी जल से भर जाती है। मछेरे प्रसन्न होकर इस आशा में गा रहे है कि एक ओर मछलियाँ अधिक मिलेंगी और दूसरी ओर यात्रियों को पार कराने से आय अधिक होगी। गीत अपनी कहन और मौलिक उद्भावना के लिए अवश्य सराहा जाएगा जो निम्नवत है-

"मेघ का टुकड़ा झरा है/ कल/फिर नदी के पांव भारी हैं/डोंगियाँ ताशे तमाशे/जाल लेकर तीर पर/आँख वे धरने लगे हैं/नदी की तकदीर पर/ये मछेरे गा रहे अविरल/इस नदी के पांव भारी हैं/नाक तक पानी चढ़ा/हर आदमी बीमार है/और घाटो पर नदी के/देह का व्यापार है/बज रही है वक्त की सांकल/त्रासदी के पांव भारी हैं/"

संस्कृत साहित्य में पीएच.डी. डॉ. भारतेन्दु मिश्र हिन्दी में भी अनेक साहित्य के तथाकथित डॉक्टरों से अधिक समर्थ हैं। काव्य में ही नहीं गद्य में भी बडे स्तर पर लेखन कर चुके हैं। घनाक्षरी, दोहे, से प्रारम्भ कर उनकी यात्रा नवगीत तक पहुँची है। उन्होंने इस विधा में भारतीय स्तर का यश अर्जित किया है। एक नवगीतकार के रूप में उनकी विशेष ख्याति है। इसके अतिरिक्त कहानी, नाटक, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना आदि अनेक विधाओं में विपुल सृजन किया है। लोक साहित्य में भी वे अनजाने नहीं हैं। वास्तव में जिस विधा में लेखनी उठाते हैं वह उसके शीर्ष पर दिखाई देने लगते हैं। "बांसुरी की देह" खण्ड के उपरांत "बाकी सब ठीक है" खण्ड में नगरीय विसंगतियों के साथ कतिपय आस्था के गीत-नवगीत संग्रहीत किये गए हैं जिनमें वैचारिक कथ्य संवेदनाओं में डुबोकर प्रस्तुत किया गया है। जो संप्रेषणीयता के साथ मर्मस्पर्शी भी है। वे हमारी चेतना को प्रभावित करते हैं। कागजी योजनाओं के फल स्वरूप निर्धन मजदूर तथा निम्नवर्ग के लोग प्रतिदिन निर्धनता की ओर बढ़ते जा रहे हैं। उच्च वर्ग धनाढ्य होता जा रहा है एवं गरीबों का शोषण कर अपनी तिजोरी भरता जा रहा है। इस शोषण उत्पीड़न, भ्रष्ट व्यवस्था और आम आदमी की स्थिति पर निम्नांकित नवगीत प्रस्तुत है-"कागजी घोड़े/ थके दौड़े/हाशिए जीने लगे/ हम टिप्पणी बनकर/अगस्त्यों ने पी लिया है सिन्धु का सब जल/और हर मछली तड़पती प्यास से घायल/ढल गयी कविता किसी बू तवायफ सी/क्वणित नूपुर या कि /लोहे की कड़ी बनकर/कतरनों में फाइलों अलमारियों में/धूल या दलदल कभी चिनगारियों में/धुल गए वे न्याय के आदेश सारे/एक तिनका नीड़ का/धोखाधड़ी बनकर/कौन रोकेगा सनातन नियति सीमायें/खंडहर सी रह गयीं जब शेष गरिमायें/और गाछों ने न पूछा ताम्रपत्रों से/किस तरह बिजली गिरी पतझर झड़ी बनकर/"

शोषण उत्पीड़न का सिलसिला सदियों से ही यों ही चल रहा है और आम आदमी की यही नियति है कि वह अस्तित्व के लिए निरंतर संघर्ष करते करते मिट्टी में मिल जाये। लोक तंत्र में वास्तविक सत्ता जनता के हाथ में होती है। हर पाँच वर्ष पर मतदान कर दूसरे दल की सरकार बनाई जा सकती है किंतु वास्तविकता इससे सर्वथा विपरीत है। जन प्रतिनिधि जन सेवक होने के बदले स्वामी बन जाते हैं और अनेक भ्रष्ट तरीक़ों से धनार्जन करते हैं। मतदान के समय उसी धन से जनता को ख़रीद लेते हैं। चुने जाने पर पुन: वही शोषण उत्पीड़न और वही साधारण जन का जीवन संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। डॉ. मिश्र उपर्युक्त तथ्यों से भली-भाँति अवगत हैं उनका मर्माहत हृदय इस कथ्य को निम्नांकित रूप से इसे नवगीत में प्रस्तुत करता है- "सूरज के हाथों में /अब किरण नहीं है/जीवन है जीवन का/व्याकरण नहीं है/सुबह शाम भगदड़ में /अर्थवान अर्थ है/ सिर्फ पहुँचवाला ही/कुशल है-समर्थ है/चरण ही चरण हैं/बस आचरण नहीं है/बोधगीत गाते हैं/जमुहाये होठों से/क्रांतियाँ मचलती हैं/ऊँचे परकोटो से/खुली खुली आँखे हैं/जागरण नहीं है/पत्तों सा बिखर बिखर गिरा कहीं यौवन है/ नग्नता दिखाना ही /प्रगतिशीलजीवन है/मरण का वरण है बस/आवरण नहीं है/"

हर जगह भ्रष्टाचार रिश्वत कमीशन का बाज़ार गर्म है। आम आदमी धनकुबेरों के पाँव की जूती होकर रह गया है। समाज में जिसके पास धन अधिक है उसका सम्मान भी अधिक है कोई यह
नहीं देखता कि उसने किस अनैतिक ढंग से धन कमाया है। माफिया गुंडों और बदमाशों को लोग आज अपना आदर्श मानते हैं। मानवमूल्य को पूछने वाला कोई नही। डॉ.मिश्र ने ऐसी परिस्थिति में जीवन में और लेखन में नैतिकता और मानव मूल्यों की निरंतर पक्षधरता की। उनकी रचनाओं में परिवेश के यथार्थ बिम्बों के साथ सर्वहारा की कराह की गूँज स्पष्ट लक्षित होती है। समाज में व्याप्त समस्त विषमताओं, विसंगतियों, विडम्बनाओं, विरूपताओं और विघटन की कटुताओं को उन्होंने केवल देखा ही नहीं भोगा और जिया भी है जिससे उनकी अनुभूतियों को उकेरते शब्द काल्पनिक नहीं लगते। गाँव हो नगर हो महानगर हो जो जितना बड़ा है उतना ही दयनीय भी। चारों ओर गलाकाट स्पर्धा को अपनी सामर्थ्य और योग्यता के बल पर जीतने के स्थान पर लंगड़ी मारकर बढ़ने की प्रवृत्ति शोकजनित ध्वंस की कथा कहती है। एक महानगर की दैनन्दिन जीवनशैली का शब्दचित्र दर्शनीय है- "धुंआधार इस महानगर में/पल भर को आराम नहीं है/बैसाखियाँ दौड़तीं सरपट/मौलिकता का नाम नहीं है/भीडो में भगदड़ भर होती/अपने सन्धिबिन्दु हैं सबके/गाड़ी बस यों ही चलती है/सई सांझ हो या फिर तड़के/यूकेलिप्टिस की बहार में /पीपेल को ईनाम नहीं है/अग्निशिखाए है बरगद पर/परिक्रमा से डरता है मन/थके हुए इन चौराहों पर/लालबत्तियों ऐसी उलझन/सर्दी गर्मी सहकर अब तो/होता हमें जुकाम नहीं है/हरियाली की चर्चा होती/खुशहाली कब हो पाती है/आँखों की लपटो से मन की/आतिशबाजी जल जाती है/सीधे सच्चे इंसानों के हाथों में कुछ काम नहीं है/"

नगरीय परिस्थितियों में मनुष्य मशीन बन गया है। भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। वह तो पूरी तरह रोबोट बन गया है। करुणा संवेदना जैसे मानवीय दृष्टिकोण को लोग मूर्खता समझते हैं। जिस कन्धे का सहारा लेकर लोग आगे बढ़ते हैं उसी को ठोकर मार देते हैं। आपसी प्रेम सद्भाव रिश्ते नाते सब जगह केवल स्वार्थ ही व्यापत है। समय से उठना समय पर तैयार होकर काम पर निकलना अपरिहार्य है। तनिक भी विलम्ब होने से दिनचर्या भंग हो जाती है जिसका परिणाम उसदिन की कमाई न हो पाना और भूखे रह जाना भी हो सकता है। मनुष्य इस कसी हुई दिनचर्या में निश्चिंत होकर विश्राम भी नहीं कर पाते जिसे डॉ. मिश्र जी इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं- "अरे अभी/ समाचार पत्र तक नहीं आया/ तनिक और सोने दो/धुंआधार सांस लिये/कानों में शोर भरे/लुटा पिटा चुका बुझा/देर रात लौटा था/पौ फटने ता ठहरो/कुछ उजास होने दो/बबुआ की खांसी में/रात भर नहीं सोया/मुनिया के रिश्ते की बात भी चलानी है/अभी बहुत समय पड़ा/करवट ले लेने दो/रोज़ सुबह पलको से /इन्द्रधनुष झर जाते/रोटी का डिब्बा ले बस पर चढ़ जाता हूँ/पलभर त इन आँखों में/ गुलाब बोने दो/"

जाग्रत अवस्था में चिंतायें हैं। उत्तरदायित्वो का बोझ है, काम पर समय से पहुंचने की हड़बड़ी है। केवल सुप्तावस्था में ही सपनों की दुनिया में आम आदमी को सुकून मिल पाता है। वैश्विक बाजार बढ़ती महँगाई, अपराधों का राजनीतिकरण, उद्योगपतियों की निरंतर बढ़ती धनलिप्सा और किसानों मजदूरों का शोषण आदि ऐसी परिस्थितियाँ इस भ्रष्ट व्यवस्था में बन गयी हैं कि जिसमें सर्वहारा का सुखी होना असंभव है। जिसे डॉ. मिश्र ने निकट से देखा है और जाँचा परखा है। "मौत के कुंए में" खंड के अंतर्गत इसी शोषित वर्ग अर्थात नारी-मजदूर-किसान चेतना के रूप में सहेजी गयी समस्त संवेदनाओं को श्रम सौन्दर्य की गरिमा प्रदान की गयी है। सृष्टि के प्रारंभ में समाज मातृमूलक हुआ करते थे । नारी ही परिवार की धुरी होती थी। अब भी भारत ही नहीं विश्व के अनेक देशो में मातृमूलक परिवार पाये जाते हैं। किंतु धीरे-धीरे मनुष्य ने शक्ति के आधार पर नारी से सत्ता छीन ली और उसे घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया। तभी से नारी की दुर्दशा प्रारंभ हो गयी। नारी को उत्पीडित करने और दासता की हथकड़ी–बेड़ी लगाने की कोई सीमा न रही। पुरुष ने नारी का जीवन नरक बना दिया। नारी पर अनेक अंकुश लगाकर पुरुष निरंकुश हो गया। इसी तथ्य को डॉ. मिश्र निम्नांकित रूप से व्यक्त करते हैं- "चुप्पी सन्नाटे दहशत में/सहमी–सहमी डरी चांदनी/देर रात हँसकर बतियाकर/धीरे धीरे ढरी चांदनी/पलकों पर गुलाब के कांटे/बार बार मौसम ने बांटे/आग भरे बेला नस नस में/बूढ़ी पाकर के खर्राटे/भोर पहर तक तड़प तड़प कर/ढेर हो गयी कला कामिनी/मधुर आम की महक नहीं अब/साँसों में खटास इमली की/गीदड़ उल्लू बांच रहे हैं/व्यथा कथा इस करमजली की/सुख सपनों को तोड़ छोड़ सब/ बूढ़ी होकर मरी यामिनी/"

डॉ. मिश्र ने संकेत में प्रकृति के अनेक बिम्बों के माध्यम से नारी जीवन की संपूर्ण कथा कह दी है। वास्तव में नवगीत की विशेषताओं में सांकेतिकता प्रतीक और बिंब महत्वपूर्ण अवयव हैं। नवगीत में इतिवृत्तात्मक शैली अर्थात अभिधा में उपमा आदि अलंकारों के प्रयोग से बहुत लंबे गीत प्रस्तुत करने का निषेध है। न्यूनतम शब्दों में कथ्य को व्यंजना के शिल्प में इस प्रकार अभिव्यक्त करना कि उसकी संवेदना पाठक गृहण कर स्वयं ही संवेदित हो जाये ही नवगीत का प्रमुख लक्षण है। प्रस्तुत संग्रह की अधिकांश रचनाएँ नवगीत हैं। ध्यातव्य है कि व्यंजना ही नवगीत को स्वर प्रदान करती है। साहित्यकार उपदेशक अथवा नेता नहीं है। लेखन की प्रक्रिया में साहित्यकार परोक्ष रूप से वास्तविकता को पाठक के समक्ष रख देता है। समाधान हेतु समयानुसार चिंतन मनन द्वारा परिवर्तन का मार्ग सुनिश्चित करना पाठक और पूरे समाज का कार्य है। यह बदलाव की प्रक्रिया यद्यपि तीव्र नहीं होती किंतु होती अवश्य है। इतिहास साक्षी है कि गीतों ने अनेक बार क्रांति को प्रोत्साहित कर साकार रूप दिया है। नवगीत का भी यही लक्ष्य है यही उद्देश्य है। जहाँ तक मै समझता हूँ डॉ. मिश्र इसी कारण नवगीत विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उदाहरणार्थ एक नवगीत नारी के जीवन पर देखिए जिसमें अपने ही लोग उसे कैसे पीड़ित करते हैं- "सपनों की किरचों पर /नाच रही लड़की/अपने ही झोंक रहे/चूल्हे की आग में/रोटी पानी ही तो/ है इसके भाग में/संबन्धो के अलाव/ ताप रही लड़की/ड्योढ़ी की सीमाएँ/ लांघ नहीं पायी है/आज भी मदारी से/बहुत मार खाई है/तने हुए तारों पर /कांप रही लड़की/ तुलसी के चौरे पर/आरती सजाए है/अपनी उलझी लट को /फिर फिर सुलझाए है/बचपन से रामायन /बांच रही लड़की/"

लड़की जहाँ माँ पिता के लिए बोझ है और कन्या भ्रूण की हत्या करा दी जाती है वहीं सयानी होने पर उसका विवाह भी परिवार के लिए एक समस्या बन जाता है। समाज में व्याप्त कुरीतियाँ दहेज दानव से जहाँ परिवार दुखी है वहीं अनजान व्यक्ति से विवाहोपरांत वह दूसरे परिवार में गुलाम बन जाती है। निशुल्क आजीवन दासता और ऊपर से गालियाँ तथा पिटाई। यह नारी जीवन का दुखद पक्ष है। उसका संपूर्ण जीवन अभिशाप बन जाता है। बचपन से पुण्य कर्म करते रहने पर भी उसके शोषण उत्पीड़न और दासता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। नारी के संपूर्ण जीवन की भयंकर पीड़ा को छोटे से गीत में पिरो कर डॉ. मिश्र ने अपनी प्रतिभा का परिचय बीस वर्ष पहले ही दिया था। उनकी रचनाओं में एक तीखी चुभन है जो मर्माहत कर देती है। सहज सरल प्रवाहपूर्ण भाषा में न्यूनातिन्यून छन्दों में गंभीर कथ्य को संप्रेषणीयता के साथ प्रस्तुत करना उनकी विशेषता है। वास्तव में यह भाषा की व्यंजनात्मक शक्ति ही है जो शब्दों को संक्षेप में समेटने की कहन से चमत्कार उत्पन्न करती है- जिसमें शब्दों के अभिधामूलक अर्थ तिरोहित हो जाते हैं। फिर उनके स्थान पर वक्रोक्ति कथन से उत्पन्न स्वर ही उचित अर्थ देने लगता है। डॉ. मिश्र दिल्ली जैसे महानगर में रहते हैं और आम आदमी के बुनियादी सवालों से रूबरू होते हैं। इसीलिए नगरबोध की रचनाओं में अपनी तीक्ष्ण अनुभूतियों के यथार्थ को सहेजने में सिद्ध हैं। एक उदाहरण निम्नांकित है- "देखता हूँ इस शहर को/रोज़ जीते रोज़ मरते/उम्र यूँ ही कट रही है /सीढियाँ चढ़ते उतरते/फिर कपोतो की उम्मीदें/आन्धियों में फंस गयी हैं/बया की साँसें कही पर /फुनगियों में कस गयी हैं/यहाँ तोते बाज से मिल /पंछियों के पर कतरते/कंपकंपाते होठ नाहक/थरथराती देह है/और कुरते पर चढ़ा बस/ इस्तरी सा नेह है/पूछिए मत हाल बस/हर हाल में सजते संवरते/लूटकर लाए पतंगे/लग्गियों से जो यहाँ/कैद उनकी मुट्ठियों में /आजकल दोनों जहाँ/कुछ धुंआते पेड़/उन पगडंडियों को याद करते/"

गीत के जितने प्रबल मंचीय नक्षत्र थे वे धीरे-धीरे अस्त हो गये। मंच से गीतों का अवसान हो गया। गीत समय के अनुसार अप्रासंगिक होते गये और नयी कविता की वैचारिक प्रबुद्धता ने भी गीतों को प्रकाशन से परे धकेल दिया। नीरज जैसे गीतकार को भी स्वीकार करना पड़ा कि-मंचों पर अच्छी रचनाओं पर श्रोता ताली नहीं बजाते बल्कि अश्लील लतीफ़ों और चुटकुलों के शौकीन हो गए हैं। डॉ. भारतेन्दु मिश्र ने भी विचार व्यक्त किया कि "अब मेरी मान्यता है कि मंच के प्रपंच सुनकर तो घृणा ही की जा सकती है।" माहेश्वर तिवारी और रामदरश मिश्र जैसे गीतकारों ने भी मंच से दूरी बना ली है। ऐसी परिस्थितियों ने भी नवगीत के अभ्युदय का अवसर प्रदान किया है। गीत के स्थान पर नवगीत युगसत्य है। जो समय के साथ नहीं चल पाता वो वह पिछड़ जाता है। इसीलिए पारंपरिक गीत इतिहास की बात हो गये। नवगीत ने गीत ग़ज़ल दोहा और नयी कविता सभी को अपने शिल्प कथ्य एवं भाषा में समेट लिया। इतना ही नहीं इसमें अनेक शाखाएँ भी निकल आयी हैं जैसे जनवादी गीत, सहज गीत, समकालीन गीत आदि। डॉ. भारतेन्दु मिश्र गीत के ऊपर आई त्रासदियों का प्रतिरोध कर नवगीत को परिवर्तित रूप में जीवित रखने में सफल हुए हैं। उनके विषय में इन्द्र जी कहते हैं- "भारतेन्दु मिश्र के गीतों पर कहीं भी सपाटबयानी का आरोप नहीं लगाया जा सकता। इन गीतों की अभिधा की पोर-पोर में लाक्षणिक व्यंजकता बसी हुई है। इन गीतों की भाषा आम जनता से संवाद करने वाली है। स्निग्ध मसृण बिम्बों की श्रृंखला बनाकर वे अपने गीतों के पैरों में आलक्तक पैजनियाँ नहीं पहनाते। व्यंग्य इन गीतों का प्रभावशाली और वेधक हथियार है। जिसके उपयोग से ये गीत दूर मारक क्षमता संपन्न हो गये हैं।" डॉ. मिश्र ने इन्द्र जी के शब्दों को सार्थकता प्रदान की है जिससे उनके पुराने गीत भी अद्यावधिक प्रतीत होते हैं- "अब तरंगे ताल के तट पर खड़ी/आप ही सिर धुन रही हैं/मछलियों के ही लिए कुछ मछलियाँ/जाल प्रतिपल बुन रही हैं/शून्य है आकाश पर/पहरा लगा है/सूर्य को धक्का कहीं/ गहरा लगा है/ पंछियों के पर कतर डाले हवा ने/आदमी पर सुअर का चेहरा लगा है/चीख में डूबे समय के गीत को/चेतनाएँ सुन रही हैं/सभ्यता के शब्द नंगे हो रहे हैं/ताल में सब /धरम धन्धे हो रहे हैं/ नीति गिरवी रख/खडे हैं वृक्ष सारे/जातियों के लिए /दंगे हो रहे हैं/ दग्ध वन में /गूंजता है गीध स्वर/ग्रास लपटें चुन रही हैं/"

चारों ओर मनहूसियत का साया है। मनुष्य ही मनुष्य का शत्रु बन गया है। यद्यपि चेतनाएँ समय की त्रासदी को सुन रही हैं किंतु उनके पास शक्ति नहीं है। भविष्य के प्रति कोई आशा शेष नहीं है। अब तो सुनहले सपने भी नहीं दिखाई पड़ते। सांप्रदायिक दंगे, जातियों और राजनीतिक दलों की दलदल में फंसे हुए लोग मानवता के शत्रु हो गये हैं। सामाजिक वातावरण विषाक्त हो गया है। विषमता विसंगति और विघटन से समाज का प्रेम एवं सद्भाव का ताना बाना नष्ट हो चुका है। बस उसकी विद्रूपता चेतनाओं पर भारी है। अनुभव के सोपान और ऊँचे और ऊँचे चढ़ते चले जाते हैं डॉ. मिश्र और दिन पर दिन उनके नवगीतों की तीक्ष्ण धार तेज़तर होती गयी है। क्रांति का उद्घोष करने वाले शंख गूँगे हो गए हैं और भाट इस त्रासद समय की सत्य कथा सुना रहे हैं। दुर्घटना हो हत्या या आत्महत्या लोग देखकर भी सहायता नहीं करते और अनदेखी कर चले जाते हैं। संपूर्ण जीवन एक अग्निपथ है। अभी केजरीवाल की सभा में गजेन्द्र की आत्महत्या इसका प्रमाण है कि कई हज़ार की भीड़ में मीडिया जहाँ लोगों को आत्महत्या का आँखों देखा हाल सुनाने में व्यस्त था, पुलिस मूकदर्शक थी और नेता मात्र मौखिक अपील कर रहे थे। सुना तो यहाँ तक जा रहा है कि कुछ लोग उकसा भी रहे थे तथा आत्महत्या के दृश्य पर ताली भी बजा रहे थे। तब मानवीय संवेदना और जीवन मूल्य की आवश्यकता लोगों ने महसूस नहीं की। इसी प्रकार जब भारतेन्दु मिश्र लिखते हैं- "इसी गाँव में नागार्जुन को /हँसी खेल में/तिल तिल कर मरते देखा है/दो रोटी के समीकरण में/जीवन और मृत्यु के रण में/पीपल को भी रक्तस्नात हो/मूक भाव से/पात पात झरते देखा है/"

तो इस यथार्थ दृश्य की पीड़ा पाठक को मर्माहत कर देती है। वास्तव में कवि की सोच दूरगामी होती है। अन्यथा सन 1999 की रचना वर्तमान में अपनी सार्थकता खो चुकी होती। इसी से प्रतीत होता है कि डॉ. मिश्र के गंभीर चिंतन अनुभूति एवं रागात्मक संवेदना से उपजी प्रस्तुत संग्रह की रचनाएँ कालजयी हैं। ऐसी त्रासद परिस्थिति में कवि क्या करे? डॉ. मिश्र कहते हैं कि वे तरह-तरह के रोज़ नये चेहरों पर लिखी वेदनाएँ पढ़ करके अपनी संवेदनाओं को समृद्ध करते हैं और अनुभव के नए सोपानों पर चढ़ते हुए समाज को सन्देश देते हैं- "रोज़ नया चेहरा पढ़ता हूँ/इधर उधर सब देख समझकर/मन बेमन आगे बढ़ता हूँ/कुछ अपने कुछ बेगाने हैं/कुछ परिचित कुछ अंजाने हैं/कुछ झूठे कुछ बिल्कुल सच्चे/कुछ बूढे जवान कुछ बच्चे/इन्हे भागता हुआ देखकर/अनुभव की सीढ़ी चढ़ता हूँ/कुछ तीखे कुछ मीठे चेहरे/कुछ बड़बोले मन के गहरे/कहीं जानवर /कहीं देवता/कहाँ जा रहे किसे क्या पता/जो पूरा मनुष्य सा दीखे/माटी का पुतला गढ़ता हूँ/कुछ वर्दी कुछ दाढ़ी वाले/कुछ टाई कुछ कुर्ते वाले/कुछ बूढ़ी तो कुछ बालाएँ/पंख कटी उड़ती महिलाएँ/ मै आँखों देखी तस्बीरें/मन के शीशे में मढ़ता हूँ/"

गीतों नवगीतों के अतिरिक्त इस महाकाव्यीय संग्रह में अंत में कुछ मुक्तक, कुछ समीक्षाएँ और कुछ महत्वपूर्ण पत्र भी संग्रहीत हैं जो अपने समय के साक्ष्य हैं। डॉ. मिश्र के 2010 तक रचे गये समस्त गीत नवगीत प्रस्तुत महाकाय संग्रह में सहेजे जाने से उनके निस्वार्थ सृजनधर्मी होने का परिचय मिलता है। यद्यपि उनकी सोच है कि वे भविष्य में गीतों नवगीतों की रचना नहीं करेंगे किंतु यह संभव नहीं है। गीत के वायरस जिसे एक बार संक्रमित कर देते हैं वो अंतर्मन में गहरे पैठ जाते हैं जहाँ से वे कभी निकलते नही। अस्तु आगत की मंगल कामनाओं के साथ इस हृदयग्राही गीत नवगीत संग्रह के लिए बधाई।

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