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04.21.2008
 
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
रंजना भाटिया

ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो
भीगे हुए मंज़र पर ठहरा था कोई साहिल
आज भी उस की याद में तुम बरसती क्यों हो?

अनजान सी लगती है, साथ गुज़री हुई राहें
अठखेलियाँ वो अल्हड़पन की देती हैं अब भी सदायें
देख के अजनबी सा फिर मुझको....
यूँ हाथों से फिसलती क्यों हो..
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो

बनाए थे जो रेत के घरौंदे
शायद वो थे बचपन के धोखे
वही बन के ख़्वाब रंगो का
तुम आँखों से छलकती क्यों हो
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो

सलोना सा रूप तेरा कुछ दिखता है ऐसा
राधा और श्याम का संग हो जैसा
नज़र से बचने के लिए लगा के दिठौना
तुम नित नये शिंगार करती क्यूँ हो
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो !!

साथ हैं बस यादें कुछ बीते पलों की
कभी संग चलती कभी कहीं रुकती
यूँ बेवजह जीने की वजह बनती क्यूँ हो
ज़िंदगी तुम मेरे साथ यूँ चलती क्यूँ हो
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो !!


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