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06.18.2007
 
जाने कैसे
रंजना भाटिया

जाने कैसे ज़िंदगी का वक़्त बीतता जाता है
कुछ सिमट के यहाँ बिखरता जाता है

थे जो दिल के क़रीब कभी आज वही दूर हैं
फ़ासलों का पैमाना छलकता जाता है

दरिया के पास रह कर भी सूखे रहे हम
एक क़तरा इश्क़ का समुंदर में बदलता जाता है

चाहा दिल ने बहुत की ढलूँ में भी ज़माने के रंग में
पर यह ज़माना ही मेरे रंग में रँगता जाता है

वो कहते हैं की सुधरना होगा तुम्हें इन हालात में
वही मेरी राह पर चल के बिगड़ता सा जाता है

जाने यह प्यार अब दुनिया से कहाँ रुख़्सत हो गया
एक नशा यहाँ जिस्म का ही बस हर तरफ़ नज़र आता है

हरे पेड़ों पर क्यूँ नज़र आते हैं सूखे से पत्ते
दिल मेरा आज किस हादसे से यूँ घबरा सा जाता है

दिल मेरा है शायद एक टूटी हुई दीवार का घर कोई
यहाँ हर कोई आ के फिर से अपनी राह में गुम हो जाता है

हर चेहरे में तलाश करता है मेरा दिल तुझको
कैसी तेरी यह तस्वीर है जो दिल फिर से जोड़ नहीं पाता है

आज क्यूँ अजब सी ख़ामोशी हम दोनों में
कोई क़िस्सा फिर से अफ़साना बना जाता है

लबों पर देखा है उनके एक हलका सा तब्बसुम
क्या अभी भी मेरा कहा उनके दिल को छू जाता है !!

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