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06.07.2008
 
अजब दस्तूर
रंजना भाटिया

ज़िंदगी हमनें क्या क्या न देखा
सच को मौत से गले मिलते देखा

है कौन यहाँ जो करता नहीं ग़ुनाह
फिर भी हर किसी को ख़ुदा सा देखा

हैं ख़ुद ही बेघर महल बनाने वाले
अजब यह नज़ारा बार बार देखा

ग़ुम है बचपन भीख की कटोरी में
यह दस्तूर भी जग का निराला देखा

मुस्कान की सीमा पर क़ैद है आँसू
सब सपनों को क्यों अधूरा सा देखा

ज़िंदगी हमने क्या क्या न देखा
हर रूप में सब को तन्हा देखा


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