अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.04.2016


यज्ञशब्दविवेचनपूर्वक पंचमहायज्ञों की संक्षिप्त मीमांसा

आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यज्ञ शब्द प्रासंगिक हो गया है। यह यज्ञ शब्द कितना व्यापक है इसका ज्ञान तब होता है जब हम इसके प्रकृति-प्रत्यय पर दृष्टिपात करते हैं। यज्ञ शब्द केवल देवपूजा में ही नहीं अपितु संगतिकरण और दान के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है। यज्ञ शब्द की व्युत्पत्ति "अकर्तरि च कारके" एवं "भावे" इन अर्थों में "इज्यते इति यज्ञः" होता है। संस्कुत व्याकरण के अनुसार उभयपदी भ्वादिगणीय "यज् देवपूजासंगतिकरणदानेषु" धातु से "यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नड्" (पाणिनीय सूत्र 3.3.90) से "नड्." प्रत्यय एवं अनुबन्धलोप करके "यज् + न" इस दशा में "स्तोः श्चुना श्चुः" (पाणिनीय सूत्र 8.4.40) इस सूत्र से नकार को श्चुत्व ञकार करके "ज्ञोर्ज्ञः" इस पाणिनी सूत्र से ज्ञ होकर यज्ञ शब्द निष्पन्न होता है।

इसके अनुसार यज् धातु का प्रयोग देवपूजन अर्थात् देवविशेष के उद्देश्य से द्रव्यत्याग, संगतिकरण अर्थात् एकत्र होना, जुटकर सत्संग करना आदि तथा दान अर्थात् श्रद्धा, दया आदि भावों से किसी वस्तु पर से अपना स्वामित्व हटा लेना और उस पर दूसरे का स्वामित्व स्थापित करना। व्युत्पत्तिगत भाव से देवों के प्रति श्रद्धा एवं पूजनीय भावना, यज्ञकाल में उनसे निकटता का अनुभव तथा उनके लिए द्रव्य, मन एवं प्राण को समर्पित कर देना यज्ञ है। यज्ञ का सात (7) अपरपर्याय अमरकोष में अमर सिंह ने दर्शाये हैं, वह इस प्रकार हैं-

"यज्ञः सवोऽध्वरो यागः सप्ततन्तुर्मखः क्रतुः" (2.7.13 अमरकोष)

अर्थात् 1. यज्ञ, 2. सव, 3. अध्वर, 4. याग, 5. सप्ततन्तु, 6. मख, एवं 7. क्रतु ये सभी यज्ञ शब्द का अपर पर्याय पुल्लिंग है। अन्यत्र अमरकोष में ही "इष्टिः" भी यज्ञ का पर्याय दर्शाया गया है जो स्त्रीलिंग शब्द है इस प्रकार 8 पर्याय शब्द यज्ञ के हैं।

प्राचीन भारतीय संस्कृति यज्ञ प्रधान थी, जैसा कि ऋग्वेदादि ग्रन्थों में इसके सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न उक्तियाँ कही गईं हैं। ऋग्वेद में उक्त - "यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवस्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्न" अर्थात् यज्ञ से ही विश्व की उत्पत्ति हुई है, यही जगत् का प्रथम धर्म था। "शतपथ-ब्राह्मण" में यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म माना गया है- "यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म"। यहीं यह भी कहा गया कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ देवता प्रजापति यज्ञ के रूप हैं- "एष वै प्रत्यक्षं यज्ञो यत् प्रजापतिः"। जबकि अथर्ववेद में यज्ञ को संसार का केन्द्र (नाभि) माना गया है- "अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः।" स्पष्टतः यज्ञ भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ है।

पूर्वमीमांसा के प्रारम्भिक ग्रन्थ "अर्थसंग्रह" में श्री लौगाक्षिभास्कर ने याग को धर्मस्वरूप में वर्णन किया है, जो सर्वमीमांसक सम्मत है। वह इस प्रकार हैं- "अथ को धर्मः, किं तस्य लक्षणमिति चेत्। उच्यते-यागादिरेव धर्मः। तल्लक्षणं- "वेद प्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्म" इति"। भावार्थ यह है- यदि प्रश्न उठता हैं कि धर्म क्या है? उसका लक्षण क्या है? तो उत्तर देते हैं- याग आदि ही धर्म है। उसका लक्षण है- वेद के द्वारा प्रतिपादित प्रयोजनवत् अर्थ ही धर्म है। तथा मीमांसा सूत्रकार जैमिनि महर्षि द्वारा प्रतिपादित "चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" (1.1.2 जै. सू.) इन दोनों लक्षणों में विरोध की प्रतीति हो सकती है, किन्तु वस्तुतः वह है नहीं। यह विरोध इसलिए प्रतीत होता है, क्योंकि "वेद प्रतिपाद्यः" कहने से वेद शब्द से उसके सभी भागों विधि-मन्त्र-नामधेय-निषेध और अर्थवाद का ग्रहण होता है, जिसका अर्थ यह निकलता है कि इन पाँचों वेद भागों से धर्म का प्रतिपादन होता है, केवल विधिभाग से नहीं, जबकि जैमिनिमुनि के धर्मलक्षण में "चोदनापद" से सामान्यतः केवल विधिभाग का ही ग्रहण होता हैं, मन्त्र आदि का नहीं। "चोदना शब्द" "चुद प्रेरणे" चौरादिक स्वार्थिक ण्यन्त धातु से "ण्यासश्रन्थो युच् (3.3.107) इस पाणिनीय सूत्र से युच् प्रत्यय तथा यु को "युवोरनाकौ" (पाणिनी सूत्र 7.1.1) से अन आदेश करके "अजाद्यतष्टाप्" (पाणिनी सूत्र 4.1.4) इस सूत्र से टाप् करके निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है प्रेरणा या प्रवर्तना, जबकि ‘विधि‘ का भी सीधा अर्थ विधायक, प्रेरक, प्रवर्तक आदि लिया जाता है। इस प्रकार ‘चोदना‘ और ‘विधि‘ समानार्थक हुये। किन्तु इस शंका का समाधान लौगाक्षि भास्कर जी ने इस प्रकार किया है- "तत्राऽपि चोदनाशब्दस्य वेदमात्रपरत्वात्।" अर्थात् जैमिनि सूत्र में चोदना पद का अर्थ विधि मात्र न मानकर पूरे वेद का वाचक मानना चाहिये। वैदिक काल में यागकृत्य के अन्तर्गत यद्यपि विद्वानों एवं कर्मकाण्डियों की जमघट भी होती थी, कृत्यपूर्णता पर दक्षिणायें भी दी जाती थी, किन्तु ‘देवपूजा‘ अर्थ का ही प्राधान्य था। परवर्ती काल में देवपूजा, सत्संग, दान यह सब पृथक् पृथक् भी धर्म स्वीकार किया जाने लगा।

अब प्रश्न है कि ‘याग‘ शब्द ‘देवपूजा‘ अर्थ में रूढ़ और प्रधानतः मीमांसा में ही धर्म के रूप में स्वीकार्य होने पर भी ‘आदि‘ पद (याग + आदि) कहने की क्या आवश्यकता रही। यहाँ ‘आदि‘ पद से क्या अभीष्ट है, इस पर अर्थसंग्रह के टीकाकार यहाँ ‘आदि‘ पद से क्या अभीष्ट है, इस पर अर्थसंग्रह के टीकाकार यहाँ मौन हैं। श्री चिन्नास्वामी ने ‘मीमांसान्यायप्रकाश‘ पर अपनी ‘सारविवेचिनी‘ नामक टीका में ‘यागादि‘ पद पर विचार करते समय अवश्य ही कहा है- "आदिपदेन दान होमादयो द्रव्यगुणादयश्च गृह्यन्ते। और आगे चलकर कृष्णनाथ ने दूसरे प्रसंग में ‘आदि‘ का अर्थ किया है- "आदिपदाद् दध्ना जुहोति" ‘शुचिना कर्त्तव्यम्‘, ‘नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति‘ इत्यादि श्रुतिभिर्ये ये कर्मातिरिक्ता द्रव्यगुणाभावादयः क्रतूपकराकादिकमुद्दिश्य पुरूषं प्रति विधीयते तेषां परिग्रहः।" अर्थात् आदिपद से ‘दही से होम करता है‘, ‘पवित्र होकर कार्य करना चाहिए‘, ‘अतिरात्र में षोडशी का ग्रहण नहीं करता है‘ आदि श्रुतियों द्वारा जो कर्म के अतिरिक्त द्रव्य, गुण, अभाव आदि यज्ञोपकारक पुरुष के लिए विहित हैं उनका ग्रहण होता है।

इस धर्म के रूप में स्वीकृत याग आदि का "यजेत स्वर्गकामः" स्वर्ग के इच्छुक व्यक्ति को यज्ञ करना चाहिए। इत्यादि श्रुतिवाक्य द्वारा स्वर्ग को लक्ष्य करके पुरुष के लिये विधान किया जाता है। यद्यपि यहाँ प्रकटरूप में दृष्टिगोचर नहीं होता, तथापि विचारणीय प्रश्न यह है कि यागादि इस जीवन में पुरुषद्वारा सम्पन्न होने पर ही समाप्त हो जाते है और स्वर्गपर्यन्त स्थायी भी नहीं रहते, फिर उनसे मरणोत्तरकाल में प्राप्य स्वर्गादि की सिद्धि कैसे हो सकती है? इसका उत्तर है कि जिस प्रकार चिरविनष्ट अनुभव, संस्कार के द्वारा स्मृति का हेतु बनता है उसी प्रकार यागादि भी अपूर्व के माध्यम से ही स्वर्ग आदि के साधन परम्परया बनते हैं। यह अपूर्व फलभागी यज्ञकर्ता पुरूष में निष्ठ रहता है। मीमांसक अवान्तर व्यापार को भी इस प्रसंग में करण से भिन्न नहीं मानते। वस्तुतः अपूर्व आदि व्यापार के साथ याग आदि को ही उनके फलपर्यन्त स्थायी माना जाता है क्योंकि बिना इनको सम्पन्न किये अपूर्व नहीं बनता और अपूर्व बने बिना स्वर्गदि फल की प्राप्ति नहीं हो सकती।

यज्ञ का अपरपर्याय सम्पूर्ण वैदिककर्म पाँच भागों में विभक्त है- "स एष यज्ञः पंचविधोऽग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यानि पशुः सोमः"। इति ऐतरेयब्राह्मणम्। ये श्रौत याग कहे जाते है। स्मृतौ तु "औपासनहोमः वैश्वदेवम्, पार्वणम्, अष्टका, मासिश्राद्धम्, श्रवणा, शूलगव इति सप्तपाकयज्ञसंस्थाः, अग्निहोत्रम्" इत्यादि (गौ0ध0 8/18)। अर्थात् श्रौत और स्मार्त दोनो मिलाकर इक्कीस (21) कर्म स्वरूप यज्ञ बताया गया।

श्री सदानन्द प्रणीत वेदान्तसार नामक ग्रन्थ में वेदान्त अधिकारी के लक्षण में नित्यकर्मो का भी निरूपण है। वह इस प्रकार है- "नित्यानि अकरणे प्रत्यवाय-साधनानि सन्ध्यावन्दनादीनि" इति। अर्थात् नित्य कर्म उसे कहते है जिनके करने से तो विशेष पुण्य न हो, किन्तु न करने से प्रत्यवाय-हानि-आगमी दुःख के ज्ञापक होते है। जैसे- संध्यावन्दन आदि। यहाँ आदि पद से व्याख्याकारों ने पंचमहायज्ञ इत्यादि का ग्रहण किया है। अतः पंचमहायज्ञ भी नित्य कर्म है। अतः संध्यावन्दन की तरह प्रतिदिन करणीय है। क्योंकि वेदों में कहा गया है- "अहरहः सन्ध्यामुपासीतः।"

पंचमहायज्ञ -

पाठो होमश्चातिथीनां सपर्या तर्पणं बलिः।
एते पंचमहायज्ञाः ब्रह्मयज्ञादिनामकाः॥ (अमरकोष 2/7/14)

(1) ब्रह्मयज्ञ, (2) देवयज्ञ, (3) भूतयज्ञ, (4) नृयज्ञ, (5) पितृयज्ञ है। इन यज्ञों का विधान गृहस्थों को चूल्हा, चक्की, झाड़ू, उखल-मूसल और पानी का घड़ा इन पात्रों से उत्पन्न होने वाले पापों से बचाने के लिए किया गया है जैसा कि मनुस्मृति में महर्षि मनु ने कहा है-

"पंचसूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः।
कण्डनीं चोद कुम्भश्च वध्यते यास्तु वाहयन्॥1॥

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः।
पंच क्लृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ॥2॥

ब्रह्मयज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत्॥3॥

अध्ययनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिभूतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥4॥

पंचैतान् यो महायज्ञान् न हाययति शक्तिः।
स गृहेऽपि वसेन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते॥5॥"

मनु का यह स्पष्ट आशय है कि पंचमहायज्ञों के अभाव में उक्त वस्तुओं से होने वाली हिंसा से पाप होता है, और उक्त पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान करने पर पाप से मुक्ति प्राप्त होती है। अतः पंचमहायज्ञों का अभाव उक्त हिंसा जन्य पाप के जनन में उक्त हिंसा का सहकारी है।

(1) "ब्रह्मयज्ञ"

इसे ऋषियज्ञ भी कहा जाता है। इसके अन्तर्गत वेदों का अध्ययन एवं निःशुल्क अध्यापन, स्वाध्याय तथा सन्ध्योपासना आदि कर्म प्रमुख है। दिन के द्वितीय भाग में सम्पादित इसे, ब्राह्मणों के लिए परम तप कहा गया है। शास्त्रादि का अध्ययन-अध्यापन करने पर ज्ञान में वृद्धि आती है। जिससे मनुष्य अनेक विध कल्याणपरक कार्यों को सम्पादित करने में सक्षम होता है। स्वाध्याय के द्वारा वह अपना आत्मविश्लेषण करता है जिससे सद्गुणों एवं अवगुणों का पता चलता है, तदनुसार स्वयं में सुधार का प्रयास किया जाता है। सन्ध्योपासना भी ऋषियज्ञ का प्रमुख कर्म माना गया है।

ब्रह्मचर्य-समाप्ति के अनन्तर ज्ञानोपार्जन कार्य भी समाप्त हो जाता है- ऐसी अविवेक पूर्ण विचार धारा को नष्ट करने के लिए ही इस यज्ञ को गृहस्थों के लिए अनिवार्य बताया गया है। शतपथ ब्राह्मण तथा तैत्तिरीय आरण्यक में इस यज्ञ को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बताया गया है।

(2) "देवयज्ञ"

अग्निहोत्र के नाम से भी यह जाना जाता है। यह प्रातः काल एवं सायंकाल किया जाना चाहिए। इस यज्ञ में अग्नि प्रज्वलित करके उसमें सामग्री डालकर अन्न, घृत, धान्यादि की आहुति देकर होम किया जाता था। आर्ष-ग्रन्थों में इस यज्ञ की अत्यधिक प्रशंसा की गई है। ऐतरेय-ब्राह्मण में कथन है कि स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को अग्निहोत्र करना चाहिए-

‘अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः‘। अग्नि के द्वारा पवित्रीकरण का कार्य होता है। ऋषियों ने वायु-शुद्धि के लिए एक अत्यन्त सरल एवं उपयोगी ढंग ‘अग्निहोत्र‘ पर बल दिया। घृत, चन्दन, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थो की आहुतियाँ दिये जाने से धुआँ उत्पन्न होता है, जिससे वातावरण पूर्णतया शुद्ध हो जाता है, जल तथा वायु में विद्यमान विषैले कीटाणुओं का नाश हो जाता है और मानव की प्राण शक्ति में वृद्धि होती है। स्पष्टतः स्वास्थ्य के लिए एवं वर्षा में भी सहायक होते है। अच्छी वर्षा से फसल अच्छे होंगे जिससे समाज में आर्थिक उन्नति होती है।

(3) भूतयज्ञ

स्मृति-ग्रन्थों में इस यज्ञ को ‘बलिवैश्वदेवयज्ञ‘ की संज्ञा दी गयी है। भोजन करने से पूर्व इसका विधान किया जाता था। प्राणियों की बलि इसमें दी जाती थी। इसके द्वारा देव, पितर, वनस्पति तथा पशु, पक्षी आदि तृप्ति प्राप्त करते थे। भोजन बनने के अनन्तर इस यज्ञ में खट्टा, लवणान्न तथा क्षार के अलावा, इन्हें छोड़कर घृतयुक्त मिष्टान्न आदि भोजन की आहुतियाँ चूल्हे से पृथक् रखी हुई अग्नि में दी जाती थी। ‘मनुस्मृति‘ में कहा गया है-

"वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृहेऽग्नौ विधिपूर्वकम्।
आभ्यः कुर्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम्॥" इति।

विविध मंत्रों के उच्चारण करने के साथ होम करके लवणान्न अर्थात् दाल, भात, शाक, रोटी आदि छः भाग भूमि पर रखा करें। इस तरह श्वोभ्यो नमः, पतितेभ्यो नमः, श्वोपग्भ्यो नमः, पापरोगिभ्यो नमः, वायसेभ्यो नमः, कृमिभ्यो नमः रखकर बाद में किसी कुत्ते, पतित, श्वपच, पापी, रोगी, काक, कृमि आदि को दिया करे। ‘नमः‘ शब्द यहाँ अन्नार्थक है। ‘मनुस्मृति‘ में कथन है-

"शुनां च पतितां च श्वपचां पापरोगिणाम्।
वायसानां कृमीणां च शनकर्निवपेद भुवि॥"

इसका प्रमुख प्रयोजन यह है कि प्राणिमात्र के प्रति कर्त्तव्य का बोधन हो। जो असहाय है, अपनी सेवा करने में, या यूँ कहें कि अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने में जो अक्षम है, उनकी विविध प्रकार से सहायता की जाय।

(4) नृयज्ञ

इसे ‘अतिथियज्ञ‘ के नाम से भी जाना जाता है। निश्चय ही इसमें अतिथियों के प्रति कर्त्तव्य की बात होगी। भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता के समान माना गया है- "अतिथि देवो भव।" अतिथियों के प्रति गृहस्थों के हृदय में सेवा की भावना उत्पन्न करना इस यज्ञ का प्रमुख प्रयोजन है। "अज्ञात तिथिः यस्य सः अतिथिः" जिसकी कोई निश्चित तिथि नहीं हो अर्थात् अचानक धार्मिक, सत्योपदेशक, परोपकारार्थ सर्वत्र घूमने वाला पूर्ण विद्वान् योगीजन जब घर आये तो उन्हें "अतिथि" कहा जाता है। इस सम्बन्ध में मनुस्मृति का वचन है- पूर्ण-विद्वान, जितेन्द्रिय, धार्मिक, सत्यवादी, छलकपट रहित तथा प्रतिदिन भ्रमण करने वाला व्यक्ति ही "अतिथि" कहलाता है। निष्कर्ष रूप में दान, यज्ञादि के द्वारा भी प्राप्त नहीं किये जा सकने वाले अनन्त फल को आतिथ्य से प्राप्त किया जा सकता है।

(5) पितृयज्ञ

यद्यपि इस यज्ञ के द्वारा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनों की सेवा-शुश्रूषा का विधान किया गया है तथापि सामान्यतः इस यज्ञ से मृत पितरों से सम्बन्धित तर्पणादि भाव को ग्रहण किया जाता है। अन्न की बलि के द्वारा इसमें पितरों को तृप्त किया जाता है। पितृयज्ञ द्विविध है- (1) श्राद्ध तथा (2) तर्पण। कहा गया है - "श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा यत् क्रियते तच्छाद्धम्"। अर्थात् जिस क्रिया के द्वारा सत्य का ग्रहण हो उसे श्रद्धा तथा जिस ‘श्रद्धा‘ से कर्म का सम्पादन हो, उसे ‘श्राद्ध‘ कहते है। एवं "तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितृन् तत् तर्पणम्।" अर्थात् जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान माता-पिता आदि प्रसन्न हों, वही तर्पण है। लेकिन यह जीवितों के लिए है न कि मृतकों के लिए।

निष्कर्षतः

वैदिक काल में इन पंचमहायज्ञों की जो बात की गई थी, वह आज भी प्रासंगिक दिखाई देती है। कर्मकाण्ड की दृष्टि को छोड़ कर, इनका मौलिक अभिप्राय यही हैं कि प्रत्येक शिक्षित और प्रबुद्ध मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह समष्टि दृष्टि तथा सर्वभूत हित के आदर्शो के प्रकाश में ही अपने वैयक्तिक जीवन का निर्वाह करें। उसको ज्ञान एवं विद्या की उन्नति में (ब्रह्मयज्ञ), अपने पितृ, पितामह आदि की परम्परा में (पितृयज्ञ), प्राणियों के हित में (भूतयज्ञ), अतिथि सेवा में तथा मानव के महत्व तथा मान-कल्याण (नृयज्ञ) में, पर्यावरण में (देवयज्ञ) सम्यक्, निश्छल, निष्काम, आस्था रखनी चाहिए।

रामकेश्वर तिवारी
वरिष्ठ अनुसन्धाता (व्याकरण विभाग)
संस्कृतविद्या धर्म विज्ञान संकाय
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें