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ISSN 2292-9754

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12.30.2015


वैदिकी सभ्यता में आवास का स्वरूप

आवास व्यवस्था किसी भी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह सर्वमान्य है कि आवासों का निर्माण एवं उनका स्वरूप उनके निर्माताओं की आवश्यकताओं एवं चतुर्दिक पर्यावरण पर आधारित होता है। इसके अतिरिक्त निर्माण हेतु उपलब्ध सामग्री एवं संस्कृतियों का तकनीकी स्तर भी आवास-स्वरूप को एक बड़ी सीमा तक प्रभावित करते हैं। हमें केवल ग्राम, गृह या पुर जैसे कुछ शब्दों के रूप में ही सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। इन शब्दों को तत्कालीन पर्यावरण तथा सामाजिक आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है। वैदिक संहिताएँ आर्यन संस्कृति की जानकारी हेतु प्राचीनतम लिखित प्रमाण है। इस दृष्टि से इनका ऐतिहासिक महत्व समस्त विश्व में स्वीकार किया जाता है। मूल संहिताएँ ऋक्, यजु, साम एवं अथर्व केवल चार ही हैं, किन्तु कालान्तर में कुछ उपशाखाओं का उदय हुआ जिन्होंने भिन्न संहिताओं का निर्माण किया। वाजसनेयी, तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक आदि संहिताएँ इनका प्रमाण है। यों तो वैदिक संहिताओं के काल को लेकर विद्वानों के मध्य अत्यधिक मतभेद है तथापि इस संदर्भ में जर्मन विद्वान विन्टरनित्स1 का मत अपेक्षाकृत अधिक तर्कसंगत स्वीकार किया जाता है। इसी को मानकर संहिताओं का काल लगभग द्वितीय सहस्त्राब्दी ईस्वी पूर्व निर्धारित किया जा सकता है। यह तो सर्वविदित है कि ऋग्वेद संहिता अन्य वैदिक संहिताओं की अपेक्षा अधिक प्राचीन है।

अब तक अधिकांश विद्वानों की प्रायः यही धारणा रही है कि आरम्भिक वैदिक संस्कृति का आर्थिक मूल आधार पशुपालन था और कालान्तर में इसके अतिरिक्त कृषि भी जीवन यापन का मुख्य साधन बन गई। जीवन यापन की इन मौलिक आवश्यकताओं को देखते हुए यह स्वीकार किया जा सकता है कि वैदिक आर्यों ने उन्हीं स्थलों को निवास के लिए चुना होगा जहाँ इन दोनों से संबंधित सुविधाएँ उपलब्ध हों। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे समतल कृषियोग्य स्थलों को ही निवास निमित्त चुना गया होगा जिसमें पर्याप्त वर्षा होती हो अथवा नदी, झील या तालाब का जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो। इस प्रकार के पर्यावरण में न तो चारागाहों का अभाव होगा और न ही ऐसे जंगलों का जिनमें आखेट योग्य पशु काफी संख्या में उपलब्ध हों।

संहिताओं में आखेट के उल्लेख स्पष्ट करते हैं कि यह न केवल एक मनोविनोद का साधन था वरन वैदिक अर्थव्यवस्था का भी एक महत्वपूर्ण अंग था। इसी प्रकार ऐसे भी उल्लेख हैं, जिनमें पशुओं के "चारागाह" (व्रजम्) एवं "गोष्ठ" (गायों के खड़े होने का स्थान) है।2 वैदिक मंत्रों में इन्द्र, वरूण आदि देवताओं से वर्षा की प्रार्थना की गई है,3 इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि कभी-कभी वैदिक आर्यों के निवास क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं होती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि जलवायु लगभग उसी प्रकार की थी जैसी उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में वर्तमान समय में होती है।

जैसा कि उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है वैदिक संस्कृति संहिताकाल में पशुपालन एवं सीमित कृषि पर आधारित थी। ऐसी स्थिति में छोटी-छोटी बस्तियों का यत्र-तत्र विद्यमान होना ही अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। संहिताओं का ग्राम (मन्+ग्रस्) शब्द इन्हीं का द्योतक है। नगरों के विकास के लिए, जैसा कि समझा जाता है, विकसित उद्योग, सुनिश्चित व्यापार व्यवस्था एवं सुव्यवस्थित राजनैतिक प्रणाली का होना आवश्यक है। इनके अभाव में हम नगरों के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते। संहिताओं का "पुर" शब्द स्वाभाविक रूप से नगरों का न होकर अन्य सुरक्षा सम्बन्धी निर्माण का द्योतक प्रतीत होता है। यही बात "दुर्ग" के सम्बन्ध में कहीं जा सकती है। गाँवों में निवास निमित्त विविध आवश्यकताओं के अनुरूप "गृह" निर्मित किये जाते थे। आवास-स्वरूप से सम्बन्धित निम्न शब्द व इनसे मिलते-जुलते अन्य शब्द ही हमें उपलब्ध हैं। इन्हीं की व्याख्या व इनसे सम्बन्धित विवेचना की जा रही है।

(1) ग्राम -

"ग्राम" शब्द वैदिक संहिताओं में बहुधा मिलता है,4 जिसका आशय "गाँव" ही लगाया जाता है। किन्तु इनका निश्चित स्वरूप क्या था यह कह सकना कठिन है। विभिन्न वैदिक सन्दर्भों को देखते हुए एक बात अवश्य स्पष्ट होती है कि गाँव मनुष्यों के समूह थे,5 किन्तु एक गाँव में किसी एक परिवार का ही निवास था या कि किसी निश्चित व्यवसाय के ही लोग रहते थे, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है।

किसी संस्कृति में गाँवों का स्वरूप तत्कालीन पर्यावरण व आर्थिक व्यवस्था पर ही विशेष रूप से आधारित होता है। पर्याप्त पर्यावरण सम्बन्धी सूचनाएँ उपलब्ध नहीं हैं। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद संहिता6 का एक मन्त्र महत्वपूर्ण जान पड़ता है। इसकी पहली पंक्ति में समुद्र का उल्लेख है और दूसरी पंक्ति में घरों के जल के मध्य स्थित होने की चर्चा है। ऐसा प्रतीत होता है कि ग्राम निवेश के लिए जल की समीपता एक प्रमुख पर्यावरण सम्बन्धी आवश्यकता थी जहाँ तक मूल आर्थिक व्यवस्था का प्रश्न है ऋग्वेद व अन्य संहिताओं द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य भिन्न प्रतीत होता है। ऋग्वैदिक समाज पशुपालकों का था, परन्तु कृषि का आविर्भाव हो चुका था7। ऐसी स्थिति में हम बड़े गाँवों की कल्पना नहीं कर सकते। रथकार, कुलाल, कर्मकार आदि व्यावसायिकों के नाम इस ओर संकेत करते हैं कि प्रत्येक गाँव दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के सम्बन्ध में आत्मनिर्भर था। ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि गाँवों की जनसंख्या मिली-जुली थी और उनमें सभी सामाजिक एवं आर्थिक वर्गों के लोग निवास करते थे। परवर्ती संहिताओं से यह स्पष्ट है कि पशुपालन के अतिरिक्त कृषि भी आर्थिक व्यवस्था का एक प्रमुख आधार बन चुकी थी। साथ-ही-साथ विभिन्न उद्योगों के विकास की भी कल्पना की जा सकती है। इस काल में विभिन्न धातुओं के प्रयोग से भी इस निष्कर्ष का समर्थन होता है।8 संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कृषि एवं उद्योगों के विकास के साथ ही साथ ग्रामीण जीवन में एक बड़ी सीमा तक स्थिरता आ गई होगी। यह आर्थिक स्थिरता जनसंख्या वृद्धि में भी सहायक हुई होगी। इन सभी परिस्थतियों को ध्यान में रखकर यह कहा जा सकता है कि इस काल के ग्राम न केवल पूर्वकाल की अपेक्षा बड़े होंगे वरन् समृद्ध भी रहे होंगे।

विभिन्न वैदिक सन्दर्भों से एक बात स्पष्ट होती है कि इस काल के घर सुख समृद्धि के केन्द्र थे। ऋग्वेद के एक स्थल पर ऋषि द्वारा अग्नि से प्रत्येक घर में सात प्रकार के रत्नों को प्रदान करने की कामना की गई है।12 सायण भाष्य से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है।13 इसी प्रकार संहिताओं में कवि बार-बार विभिन्न देवी-देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके घरों को गाय, अन्न, धन व पुत्र पौत्रों से परिपूर्ण करें।14 इसी प्रकार स्वगृह निवासी को भी कभी-कभी सुखी व तृप्त व्यक्ति की संज्ञा दी गई है।15 वैदिक समाज में व्यक्ति अपने शत्रुओं से भयभीत थे और अपने घरों को निरापद बनाने के लिए देवताओं से प्रार्थना करते थे।16 आर्यों के ये शत्रु कौन थे यह स्पष्ट नहीं है। सम्भावना यह है कि वे शत्रु थे जिनको ध्वस्त करने का श्रेय वैदिक संस्कृति के प्रमुख देवता इन्द्र को दिया जाता था।

निवास स्थलों के निर्माण से सम्बन्धित सामग्री मुख्य रूप से अथर्वसंहिता से उपलब्ध होती है, किन्तु कुछ उल्लेख ऋक् व साम आदि संहिताओं से भी प्राप्त होते है, जो इस विषय पर प्रकाश डालते हैं। इसके साथ ही साथ गृह के लिए प्रयुक्त कुछ शब्द ऐसे भी मिलते हैं जो उनकी निर्माण सामग्री को जानने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। संहिताओं में उल्लिखित घर, लकड़ी, बांस, मिट्टी, फूस व पत्तियों से निर्मित थे। ईंट का उल्लेख यजुः संहिता में है परन्तु सन्दर्भ से स्पष्ट होता है कि इनका प्रयोग वैदिक अनुष्ठानों के निमित्त बनायी गयी वेदिका के निर्माण में किया जाता है था।17 ऋृग्वेद 18 के एक मन्त्र में "पर्शवः" का तात्पर्य सायण के अनुसार कुएँ की दीवार से है। जिस संस्कृति में कुएँ तथा वेदी के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया जाता था तो संम्भवतः आवास निर्माण में भी ईंटों का प्रयोग किया जाता होगा, किन्तु इस तथ्य के समर्थन में दुर्भाग्यवश संहिताओं में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अथर्व संहिता के एक मन्त्र में घर की तुलना उत्तम पावों वाली हस्तिनी से की गई है 19 जिससे स्पष्ट होता है कि मकान का आधारभूत ढाँचा खम्भों द्वारा निर्मित होता था। इसी संहिता के एक अन्य मन्त्र में शाला के निर्माण के सन्दर्भ में वृक्षों के उपयोग की बात की गई है।20 ऋग्वेद में भी गृह निर्माण के सम्बन्ध में सुदृढ़ खम्भों (ध्रुवा स्थूणा) के उपयोग का उल्लेख है।21 द्रष्टव्य है कि गृह के सन्दर्भ में उपमित, परिमित एवं प्रतिमित शब्द यदाकदा संहिताओं में प्रयुक्त हुए है।22

ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में गृह के साथ-साथ "त्रिवरूथ" शब्द का प्रयोग किया गया है।23 पंडित रामगोविन्द त्रिवेदी24 ने इस शब्द की व्याख्या "तीन तल्लों वाला मकान" के रूप में की है। दूसरी ओर ग्रिफिथ25 त्रिवरूथ का अर्थ "तीन प्रकार से सुरक्षित" करते है। द्रष्टव्य है कि "वरूथ" शब्द ऋग्वेद एवं परवर्ती वैदिक ग्रन्थों में गृह के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, 26 जिसका अर्थ है सुरक्षा प्रदान करना (शीत, आतप, वर्षा शत्रु एवं हिंसक शत्रुओं आदि से)27 यदि संहिताओं के त्रिवरूथ शब्द को "तीन घरों" वाला निवास के अर्थ में लिया जाय तो त्रिवेदी का अनुवाद अनुचित नहीं प्रतीत होता। "त्रिवरूथ" की एक अन्य व्याख्या भी की जा सकती है। संहिताओं के उल्लेखों से स्पष्ट होता है कि कम से कम कुछ घरों में अग्निशाल, गायों के रहने का स्थान28 एवं गृहस्थों का निवास (सद्स एवं पत्नीनां सदन) एक साथ होते थे।29 त्रिवरूथ को सम्पूर्ण मकान के इन तीन खण्डों का द्योतक भी माना जा सकता है। संहिताओं के इन उल्लेखों से एक बात और स्पष्ट होती है कि एक साधारण घर में भी अनेक प्रकोष्ठ होते थे जिनको विभिन्न प्रयोगों में लाया जाता था। "पत्नीनां सदय एवं सदन" जैसे उल्लेख इसका समर्थन करते हैं। कुछ घर निश्चित रूप से बहुत बड़े एवं अनेक प्रकोष्ठों वाले होते थे जैसा कि अथर्ववेद के एक मंत्र से ज्ञात होता है।30 इसमें दो, चार, छ, आठ एवं दस पक्षों वाली शाला की चर्चा की गई है। मकान के विभिन्न प्रकोष्ठों में द्वार होते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि सुदृढ़ खम्भों से द्वार बनाये जाते थे, और इन्हीं खम्भों से सम्बद्ध दरवाजे होते थे।31 घरों की इसी विशेषता को बल प्रदान करने के लिए सम्भवतः "दुरोण" शब्द का प्रयोग किया गया है। वाजसनेयि संहिता32 के एक मन्त्र में "द्वार" की विभिन्न विशेषताओं की भी चर्चा की गई है। ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि घरों को चहारदिवारी से घेर दिया जाता था।33

(2) पुर - वैदिक संहिताओं34 में प्रायः ‘पुर’ शब्द का उल्लेख मिलता है जिसका तात्पर्य दुर्ग, गढ़ या किला है। पुर में साधारण मनुष्यों के रहने के संकेत नहीं मिलते। संहिताओं के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ये पुर बहुधा देवताओं के शत्रुओं द्वारा, जिन्हें असुर या दास कहा गया है, बनाये गये थे। कुछ स्थलों पर देवताओं के पुरों का भी उल्लेख है।35 परन्तु इस प्रकार के साक्ष्य नगण्य ही हैं। ऋग्वेद व अन्य संहिताओं में इस प्रकार के अनेक संदर्भ है जिनमें इन्द्र और कभी-कभी अग्नि व अश्विनी कुमारों द्वारा असुरों के पुरों को नष्ट किये जाने के उल्लेख हैं36 इन्द्र का पुरंदर नाम उनकी इन्हीं उपलब्धियों का द्योतक है। उपर्युक्त सन्दर्भों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पुर निर्माण की परंपरा मूल रूप में असुरों या दासों की ही थी।37 वैदिक आर्यों द्वारा इन्हें पराजित करने के पश्चात् ही इस कला को आर्यों ने असुरों से सीखा और अपने कुछ पुरों का निर्माण किया। सन्दर्भों से यह स्पष्ट है कि जहाँ असुरों द्वारा निर्मित पुर बहुत बड़ी संख्या में थे वहां वैदिक आर्यों ने गिने-चुने पुरों का ही निर्माण किया। पुर से सम्बन्धित जो उल्लेख वैदिक संहिताओं में मिलते हैं उनसे यह स्पष्ट है कि सुदृढ़ता इनका सबसे बड़ा गुण था। ‘ऋग्वेद संहिता’ ‘छठ्ठहा पुर’ इनकी दृढ़ता का ही द्योतक है।38 ऐसा अनुमान किया जाता है कि पुर ऊँचे, दुर्गम एवं सुरक्षित स्थानों पर ही बनाये जाते थे। पुर की निर्माण सामग्री संभवतः स्थान-स्थान पर भिन्न थी। पत्थर से निर्मित पुर39 उन्ही पर्वतीय क्षेत्रों में बनाये जाते रहे होंगे जहाँ पर पत्थर सुलभ थे। इसके विपरीत उन मैदानी स्थलों में जहाँ पत्थर उपलब्ध नहीं थे, पुरों का निर्माण मिट्टी से ही किया जाता था। ऋग्वेद संहिता40 के कुछ स्थलों पर पुरों के साथ ‘देही’ शब्द भी मिलता है। ऋग्वेद में एक स्थल पर इस बात का आभास होता है कि दुर्ग में सम्भवतः धन एकत्रित करने का कक्ष होता था जिसका ग्रिफिथ41 ने ट्रेज़र-कोश अनुवाद किया है। ऋग्वेद में ही एक स्थल पर शतमुजि42 अर्थात् सौ दीवारों वाले दुर्ग43 का उल्लेख है जो दुर्ग की मजबूती और विशालता का संकेत करता है।

ऋग्वेद के कुछ मन्त्रों से शारदी पुर का उल्लेख है।44 जिसका सामान्य अर्थ शरद ऋतु में बनाये गये पुर से लिया जा सकता है। ग्रिफिथ45 ने अपने अनुवाद में शारदी पुर का अर्थ ऐसे पुर से किया जो कि वर्षा है और बाढ़ से रक्षा हेतु किसी ऊँचे स्थल पर बनाये गये थे। मैक्डोनल एवं कीथ46 का यह निष्कर्ष कि पुर साधारण निवास स्थल नहीं थे वरन् इनका उपयोग कभी-कभी सुरक्षा हेतु ही किया जाता था, उचित प्रतीत नहीं होता।

रामकेश्वर तिवारी, (वरिष्ठ अनुसन्धाता)
व्याकरण विभाग, स. वि. ध. वि. संकाय
का. हि. वि. वि., वाराणसी

सन्दर्भ:

1. विन्टरनित्स, एम., ए हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर (अंग्रेज़ी अनुवाद), कलकत्ता, 1959, पृ. 253-271
2. व्रजम् ऋ. 10।26।3; 10।17।10 एवं 10।101।8, गोष्ठ ऋ. 1।191।4; 6।28।1; 8।3।17 सेंट पीटर्सबुर्ग कोश के अनुसार गोष्ठ का अर्थ है पशुओं या गायों के ठहरने अथवा खड़े होने का स्थान से तात्पर्य गायों के बाड़े से है। पृ. 819, भाग 2,1858।
3. ऋ. 4।57।7-9।
4. ऋग्वेद 1।44।10; 2।1।2।7; 10।146।1; ह्निट्ने, डब्लू अथर्व वेद संहिता, कैम्ब्रिज, 1905; 5।17।4; 12।1।56; वाज. 2।45, स्वाध्याय मंडल, पारडी, 1970
5. ऋ. 1।100।10; 10।127।5, अथर्व0 4।7।5
6. अथर्व. 6।106।2
7. मैक्डोनेल एवं कीथ, वैदिक इण्डेक्स, भाग 1, पृ. 200 (हिन्दी अनुवाद), डा. राम कुमार राय, वाराणसी, 1962
8. वाज सं. 18।13
9. राथ, रूडोल्फ एण्ड ओटो बोथलिड्.क (संपा0) सेन्ट सीटर्सबुर्ग कोश, भाग 1, पृष्ठ 163 एवं वैदिक इण्डेक्स भाग 1, पृ. 104
10. वैदिक इण्डेक्स, भाग 1, पृ. 299
11. ऋ. 5।4।8
12. ऋग्वेद 5।1।5
13. दमे दमे तत्तदयागगृहे सप्त रमणीयाः सप्त ज्वालाः दधानः धारयमाणः । अथवा यजमानेभ्य सप्तविधानि रत्नानि दधानः अग्निः सायण, (ऋ. 5।1।5) ।
14. ऋ. 1।124।12; 5।23।4
15. ऋ. 1।91।13
16. ऋ. 1।48।15
17. वाज. सं. 17।59 एवं तैत्तिरीय संहिता 3।2।9।11
18. सं मा तपन्त्यमितः सपत्नीरिव पशर्वः
(ऋ. 1।105।8)
19. अथर्व. 9।3।17
20. अथर्व 9।3।11
21. ऋ. 8।17।14 । यह ऋचा सामवेद में भी उपलब्ध है।
22. अथर्व. 9।3।1 ये तीनों शब्द एक ही तन्त्र में शाला के साथ प्रयुक्त हुए हैं
23. ऋ. 5।48, 8।18।21, 8।42।2 इत्यादि
24. ऋग्वेद संहिता (5।4।8; 8।18।21 इत्यादि)
25. हिम्स आफ दि ऋग्वेद, भाग 1, पृ. 470
¼Triply barred protection ;k triply guadins shelter½
26. ऋग्वेद 1।589; 4।55।4; 4।56।4; 6।46।9; 7।30।4; 7।88।6, तै. सं. 1।3।4।1; 2।6।1।5; 4।9।41; 6।2।7 इत्यादि
27. वरूथम् अनिष्टनिवारकं । सायण (ऋ. 6।88।6) ।
28. अथर्व वेद के कुछ मंत्र संकेत करते हैं कि पशुओं के रहने का स्थान घर के साथ ही सम्बद्ध होता था। यथा – अथर्व. 3।12।3
29. अथर्व. 9।37
30. अथर्व. 9।3।21
31. ऋ. 1।51।14
32. वाज. 21।5
33. सेठ पीटर्सबुर्ग कोश के अनुसार छर्दिस-शब्द का अर्थ छाजन के अतिरिक्त सुरक्षित निवास स्थल या प्राकार (चहार दिवारी) भी है । पृ. 1083, भाग 2, 1858
34. ऋग्वेद 1।51।5; 1।53।8; 7।21।4 इत्यादि
35. अथर्व. 12।1।43 ।
36. ऋ. 1।53।7, 1।55।6; 1।112।14; 7।19।5; सामवेद 4।3।10।3, स्वाध्यायमण्डल, पारडी, 1957
37. इसका समर्थन इतिहास पुराण में भी पाया जाता है
38. ग्रिफिथ, हिम्स आफ दि ऋग्वेद, भाग 1, पृ. 71 एवं पृ. 482; ऋ. 1।51।11, 5।19।3।
39. ऋ. 4।3।20 अश्मन्मयीनां पुरम्
40. ऋ. 6।47।2; 7।6।5
41. हिम्स आफ दि ऋग्वेद, भाग 1, पृ. 334 (ऋ. 3।15।4)
42. ऋ. 1।166।8 ।
43. वैदिक इण्डेक्स, भाग 1, पृ. 614
44. ऋ. 1।131।4। एवं ऋ. 1।184।2; 2।12।11
45. ग्रिफिथ, हिम्स आफ दि ऋग्वेद, भाग 1, (ऋ. 1।121।4, 1।174।2, एवं 2।12।11) ।
46. वैदिक इण्डेक्स, भाग 1, पृ. 614


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