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ISSN 2292-9754

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06.06.2016


प्रमुख उपनिषदों में मानवीय मूल्यों की चर्चा

उपनिषद् शब्द की निष्पत्ति "उप" तथा "नि" उपसर्ग पूर्वक षद्लृ (सद्) धातु से क्विप् प्रत्यय लगकर हुई है। यहाँ पर उप समीपता का बोधक है, "नि" निश्चय और निष्ठा का द्योतक है तथा षद्लृ (सद्‌) धातु से विशरण अर्थात् अज्ञान का नाश अर्थ परिलक्षित होता है। उपनिषद् पद से "ब्रह्मविद्या" का बोध होता है, क्योंकि जब कोई वैराग्यसम्पन्न मुमुक्षु इस ब्रह्मविद्या के (उप) समीप जाकर (नि) निष्ठा पूर्वक और निश्चय के साथ इसका अनुशीलन करता है, तो यह विद्या उपनिषद् कहलाती है, अर्थात् उपनिषद् वह साहित्य है, जिसमें ब्रह्म के स्वरूप और उसकी प्राप्ति के उपाय, जीव और जगत् का रहस्योद्घाटन तथा आत्मादि गम्भीर विषयों का विस्तारपूर्वक निरूपण एवं विवेचन है। वैदिक साहित्य का अन्तिम भाग होने से उपनिषद् "वेदान्त" (वेद + अन्त) भी कहलाते हैं। मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार 108 उपनिषद् माने गये हैं, परन्तु शंकराचार्य ने जिन दस उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा है, वे प्राचीनतम और प्रामाणिक माने जाते हैं, जो इस प्रकार हैं -

ईशकेनकठप्रश्नमुण्डमाण्डूक्यतित्तिरः।
ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं दश॥

छान्दोग्योपनिषद् में मानव-शरीर को "ब्रह्मपुर" की संज्ञा दी गयी है।

"यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म
दहरोऽस्मिन्तन्तरा-काशस्तस्मिन्यदन्तस्तन्वेष्वत्यं तद्वाय विजिज्ञासितायमिति।"
1

ऋषि कहते हैं कि इस "ब्रह्मपुर" के भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है उसमें जो सूक्ष्म आकाश है, उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिए। इस प्रकार उपनिषदों में अपने स्वरूप को पहचानने का उपदेश प्राप्त होता है। बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णित है कि आत्मा का ही दर्शन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन श्रेयस्कर है।2 कठोपनिषद् में बताया गया है कि मानव जीवन केवल विषय उपभोग के लिए नहीं है। आत्मा शरीर रूपी रथ में बैठने वाला स्वामी है। मन लगाम, इन्द्रियाँ, घोड़े तथा सांसारिक विषय मार्ग है।

"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
3

विवेकहीन मनुष्य की इन्द्रियाँ उसके वश में न रहकर नटखट घोड़ों की तरह इधर-उधर निरुद्देश्य भटकती हैं किन्तु जो ज्ञानी हैं और मानसिक बल से युक्त हैं उनकी इन्द्रियाँ अच्छे घोड़ों की तरह वश में रहती हैं। जो मनुष्य जैसा कर्म करता है और जैसा उसका आचरण होता है वह वैसा ही फल प्राप्त करता है। पुण्य कर्म से जीव पुण्य करने वाला तथा पाप कर्म से पाप करने वाला होता है।4 पुण्य कर्मों से उत्तम लोक मिलते है तथा पाप-कर्मों से वह पाप-योनियों में जाता है।5 जो तपस्वी और पवित्र आचरण वाले हैं जिनमें कुटिलता, झूठ और कपट नहीं है उन्हीं को वह ब्रह्मलोक मिलता है6, परन्तु जिसका अन्तःकरण पवित्र हो चुका है वे जिस-जिस लोक की प्राप्ति का मन से संकल्प करते हैं तथा जिन-जिन भोगों की कामना करते हैं उन सभी भोगों और लोकों को प्राप्त कर लेते हैं।7 मुण्डकोपनिषद् में बतलाया गया है कि जिन भोगों को शुभतम् और पवित्रतम् मानता हुआ प्राणी अभिलाषा करता है वह उन अभिलाषाओं के अनुसार वहाँ-वहाँ जन्म लेता है जहाँ-जहाँ ये वस्तुयें उपलब्ध हो सकती हैं।8 इसी का समर्थन छान्दोग्योपनिषद् में भी मिलता है। वहाँ वर्णित है कि जो इस लोक में उत्तम कर्म वाले होते हैं वे निश्चित ही उत्तम योनियों को प्राप्त कर लेते हैं, वे ब्रह्मालोक, देवलोक आदि योनियों को प्राप्त करते हैं किन्तु जो लोग निन्दित कर्म वाले हैं उन्हें कुत्ते की योनि, सूकरयोनि या चाण्डालादि योनियाँ मिलती है। आत्मा की इस प्रकार की गतियों को बताते हुए ऋषियों ने उपनिषदों के माध्यम से मनुष्यों को शुभकर्म करने वाले अशुभ कर्मों को त्यागने का उपदेश दिया है। उपनिषद् यद्यपि ज्ञानकाण्ड है, जिसमें आध्यात्मिक जीवन का प्रतिपादन किया गया है तथापि साधारण मनुष्यों को कैसे कर्म करने चाहिए इसका भी उल्लेख उपनिषदों में प्राप्त होता है। तैत्तिरीयोपनिषद् में नीतिबोध का यह रूप अधिक स्पष्ट रूप से उपलब्ध होता है।9 इसमें अनेक सद्गुणों का उपदेश प्राप्त होता है- धर्म का आदर करने, सत्य बोलने, तप, संयम और शांति की साधना करने, नित्य और नैमित्तिक हवन करने, अतिथि सत्कार करने, मनुष्यता का पालन करने एवं संतान परम्परा आदि का पालन करने का उपदेश मनुष्य को दिया गया है। समावर्तन संस्कार के अवसर पर आचार्य द्वारा नैतिक शिक्षा का, सारगर्भित उपदेश दिया गया है "देव और पितृकार्य से विमुख न होना तथा माता, पिता, गुरु और अतिथि को देव तुल्य मानना।" सामान्य रूप से स्नातक को वही कर्म करने को कहा गया है जो निर्दोष हो। आचार्य कहते हैं कि जो अपने से ज्ञान में श्रेष्ठ हो उन्हें आसन देकर सम्मान करना चाहिए। अन्त में आचार्य कुछ विकल्प प्रस्तुत करते हैं अर्थात् प्रत्येक अवस्था में श्रेष्ठ करना चाहे आस्था हो अथवा न हो। दान श्रद्धा से, लज्जा से और उदारता से देना चाहिए।10 इस प्रकार लेने की प्रवृत्ति की अपेक्षा हमेशा देने का ही उपदेश किया गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् के इस विवेचन में सदाचार का भी उल्लेख प्राप्त होता है। सद्गुणों का उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् में भी अनेक स्थलों पर प्राप्त होता है। घोर आङ्गिरस मनुष्य के प्रधान सद्गुण तप, दान, ऋजुता, अहिंसा और सत्य को बताते है। वे कहते हैं कि यही आत्मयज्ञ की दक्षिणा है।

"अथ यन्तयो दानमार्णवमहिं सा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणा॥"11

निन्दित आचरण का निषेध करते हुए छान्दोग्योपनिषद् में पाँच पतितों का उल्लेख किया गया है जो वित्त की चोरी करता है, सुरापान करता है, गुरुपत्नी के साथ गमन करता है या ब्राह्मण की हत्या करता है वह नरक में जाता है। उसके साथी-सहयोगी भी वैसी ही अवस्था को प्राप्त होते हैं। बृहदोरण्योकपनिषद् में भी सदाचार का वर्णन उपलब्ध होता है। प्रजापति "द" अक्षर के द्वारा देव, मनुष्य और असुर को क्रमशः दमन, दान और दया का उपदेश देते हैं।12 उपनिषद् संसार से पलायन की दिशा नहीं देते अपितु वे यही रहते हुए सौ वर्षों तक कर्म करने का उपदेश देते हैं।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।13

इस संदर्भ में डॉ. राधाकृष्णन् महोदय कहते हैं कि "उउपनिषदों का निर्देश है कि कर्म करें किन्तु निर्लिप्त होकर करें। धार्मिक मनुष्य वह नही है जो संसार का त्याग करता है और एक निर्जन स्थान या मठ में विश्राम प्राप्त करता है बल्कि वह है जो संसार में रहते हुए सांसारिक पदार्थों से प्रेम करता है। केवल अपने लिए ही नहीं वरन् उस अनन्त के लिए भी जो उनमें निहित है एवं उस व्यापक विश्वात्मा के लिए जो उसके अंदर गुप्त है।14 डॉ. राधाकृष्णन् महोदय का पुनः कहना है कि "उपनिषदों में संसार को त्याग देने का आदेश कहीं नहीं है किन्तु उसकी पृथक् सत्ता मानने के स्वप्न को त्याग देने का आदेश अवश्य है। उपनिषदों में परदे के पीछे झाँक कर प्राकृतिक जगत् एवं मनुष्य समुदाय के अन्दर स्थित ईश्वर को ग्रहण करने का आदेश दिया गया है।15 यद्यपि जीवन को अमृतमय बनाने की समस्या का समाधान उपनिषद् में सर्वत्र उपलब्ध होता है तथापि संसार में रहते हुए ही त्यागपूर्वक भोग की शिक्षा दी गयी है।

"शावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥16

उपनिषदों में जहाँ आध्यात्मिकता का सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में वर्णन किया गया है वहीं सामान्य ज्ञान और परिवार सम्बन्धी समाजशास्त्र का भी वर्णन प्राप्त होता है। कठोपनिषद् में नचिकेता सर्वप्रथम पिता के क्रोध को शांत करना ही अपेक्षित समझता है-

शांतसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमोमाभिमृत्यो
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्र्याणां प्रथमं वरं वृणे॥17

इसी प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद् (4/22) में परिवार की सुरक्षा की प्रार्थना होती है। हे सबका संहार करने वाले रूद्रदेव! हम लोग नाना प्रकार की भेंट लेकर सदा ही आपको बुलाते रहते हैं। आप ही हमारी रक्षा करने में सर्वथा समर्थ है। आपसे प्रार्थना है कि आप हम पर कभी कुपित न हों तथा कुपित होकर हमारे पुत्र और पौत्रों का हमारी आयु को हमारे जो घोड़े आदि पशुओं को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचाएँ। हमारे जो वीर साहसी पुरुष हैं उनका भी नाश न करें अर्थात् सब प्रकार से हमारी और हमारे धन-जन की रक्षा करें।18

"मानस्तोके तनये मान आयुषि मान गोषु मानो अश्वेषु रीरिषः।
मा नोवीरान्रूद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्वा हवामहे॥"

सत्य आचरण पर उपनिषदों में विशेष बल दिया गया है। प्रायः सभी उपनिषदों में सत्य का उल्लेख किसी न किसी रूप में प्राप्त होता है। यदि कोई अपराध या अशुभ कर्म भी हो गया हो और उस व्यक्ति ने वैसा करके भी सत्य बोला हो तो उसे समाज ने या विद्वानों ने हेय दृष्टि से नहीं देखा। सत्यकाम जाबाल और उसकी माता जबाला का प्रसङ्ग इस विषय में समाज के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करते है। यह कथा यह बताती है कि किसी स्वैरिणी स्त्री का पुत्र भी सत्य बोलने के कारण ब्राह्मण पद और विद्या प्राप्त करने का अधिकारी हो सकता है। मुण्डकोपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। ऐसे ऋषि जिनकी समस्त कामनायें पूर्ण हो चुकी हैं, वे सत्य स्वरूप परमात्मा के लोक को प्राप्त करते हैं-

"सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयात्रः
येनाक्रमन्त्युषयो ह्यप्रकामा यत्र तत् सत्यस्यं परमंनिधानम्॥19

प्रश्नोपनिषद् में भी सत्य की महिमा का उल्लेख करते हुए ऋषि भारद्वाज का कहना है कि जो सत्य भाषण नहीं करता वह समूल नष्ट हो जाता है।20 इस प्रकार उपनिषद् आचारशास्त्र के उन सार्वभौम नियमों की माला प्रदान करते हैं, जिनकी किसी काल में उपेक्षा नहीं की जा सकती। ये नैतिक नियम भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि हैं। इस संसार में निःस्वार्थ निष्ठावाला जीवन ही विवेकपूर्ण जीवन है जो मनुष्य अपने जीवन में निजी हितों को सामाजिक हितों के अधीन कर देता है वह सज्जन एवं धर्मात्मा है एवं जो इसके विपरीत आचरण करता है, वह दुर्जन या दुरात्मा है। जीवात्मा स्वार्थपरक कर्मों को करती हुई अपने को बन्धन में बाँध लेती है। जो उसी अवस्था में कट सकते हैं जबकि वह पुनः अपने आप को परब्रह्म के साथ एकाकार कर लें। उपनिषदों में इस प्रकार के नैतिक चिन्तन का मार्ग सबके लिए खुला है, जो आत्मा के विस्तार की ओर ले जाता है। यदि मनुष्य पाप से दूर रहना चाहता है तो उसे स्वार्थ से बचना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य अपने आपको एक अनन्य इकाई एवं अपने भौतिक शरीर को सबसे पृथक और अहम् मानता है। वे सभी भाव जो नैतिक दृष्टि से दोषपूर्ण हैं इसी अहं भाव से उत्पन्न होते है। अतः मनुष्य को अपने जीवन एवं आचरण में इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि सब वस्तुएँ ईश्वर में है और ईश्वर के लिए हैं जो व्यक्ति इस तथ्य को समझ लेता है, वह अपने आचरण से परब्रह्म के विश्वव्यापी जीवन के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेता है। नैतिक जीवन ईश्वरोन्मुख या ईश्वरकेन्द्रित जीवन होता है। ऐसा जीवन मानवता के प्रति उत्कट् प्रेम और श्रद्धा से ओतप्रोत होता है और सान्त को साधन बनाकर अनन्त की साधना करता है। उपनिषदों में निर्देश दिया गया है कि स्वार्थमय प्रयत्नों का त्याग करना चाहिए किन्तु सब हितों का नहीं। "अहं भाव से पृथक् रहकर परब्रह्म के साथ संयुक्त होना ही उपनिषदों की नैतिक शिक्षा हैं।"

रामकेश्वर तिवारी
वरिष्ठ अनुसन्धाता, व्याकरण विभाग
स.वि.ध.वि.संकाय, का.हि.वि.वि.
वाराणसी

सन्दर्भ ग्रन्थ

1. छान्दोग्योपनिषद् (8/1/1)
2. वृह. उप. (2/4/5)
3. कठोपनिषद् (1/3/3)
4. बृह.उप. (3/2/13)
5. प्रश्न.उप. (.3/.3/.7)
6. प्रश्न.उप. (.1/.1/16)
7. मु.डक.उप. (.3/.1/1.)
8. मु.डक.उप. (.3/.2/.2)
9. तैत्तिरीयोपनिषद् 1/11
10. तैत्तिरीयोपनिषद् 1/11
11. छा.उप. (3/17/4)
12. बृहदार.यकोपनिषद् (5/2)
13. ईशावास्योपनिषद्-2
14. भारतीय दर्शन, पृ. 117
15. भारतीय दर्शन, पृ. 179
16. ईशावास्योपनिषद् 1
17. कठोप. (1/1/1.)
18. श्वेताश्वतरोपनिषद् (4/22)
19. मु.डक.उप. (.3/.1/6)
20. प्रश्नोपनिषद् (6/1)


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