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ISSN 2292-9754

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01.13.2016


धर्म का मौलिक स्वरूप

धर्म शब्द संस्कृत के ‘धृञ् धारणे’ धातु से मन् प्रत्यय करके बना है जिसका अर्थ है जो धारण करने वाले का पोषण करता है अथवा जो स्वयं सबको धारण कर पोषण करता है। अथवा वह जो धारण करने योग्य है जिसे धारण किया जाय वही धर्म है- धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः। धर्म की परिभाषा करते हुए कणाद कहते हैं- "यतोऽभ्युदयः निःश्रेयस् सिद्धिः स धर्मः"1

अर्थात् जिसके धारण करने से व्यक्ति और समाज का अभ्युदय हो और जीवन का श्रेष्ठतम प्राप्तव्य प्राप्त हो सके वह धर्म है। इस धर्म में मार्क्स के कथनानुसार धर्म शोषक का हथियार कैसे हो सकता है? सांप्रदायिकता का जड़पन भी धर्म कैसे हो सकता है? इसलिए मार्क्स जिसे धर्म कह रहे हैं वह धर्म तो कतई नहीं बल्कि धर्म की आड़ में किया जाने वाला अधर्म ही है। तो फिर पाश्चात्यों के मत में धर्म क्या है? यह यक्ष प्रश्न है।

अब धर्म को समझने के लिए मनुष्य की चेतना जिसका हम स्वयं मनुष्य होने के कारण अनुभव करते हैं पर थोड़ा विचार करते हैं। हम सबका यह सामान्य अनुभव है कि क्षुधा, तृष्णा, सुख, दुःख, हम सब अलग-अलग अनुभव करते हैं। किसी की तृष्णा या क्षुधा की शान्ति उसके स्वयं के पानी पीने या भोजन करने से ही होती है किसी अन्य के नहीं। ठंडी में ठिठुरते व्यक्ति की ठंड किसी और के गर्म कपड़े में होने से नहीं जाती जब तक स्वयं वह गर्म कपड़े न पहने। शरीर के तल पर यहाँ स्पष्ट अलग-अलग चेतना की अनुभूति होती है। किन्तु इसी चिन्तन क्रम में आगे बढ़ने पर हम देखते हैं कि एकाकी सड़क पर हमारे गुज़र रहे होने पर हमें यदि कोई आकस्मिक दुर्घटनाग्रस्त घायल जो सड़क के किनारे पड़ा है। कराहता है, हमारा ध्यान सद्यः उधर चला जाता है। उसकी कराह मेरे भीतर एक दर्द पैदा करती है और हमारा मन उसकी सहायता करने के लिए व्याकुल होने लगता है। यद्यपि इस व्यक्ति से हमारा कहीं कोई परिचय नहीं है। दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। हमने उसे छुआ भी नहीं। हमारे उसके बीच में काफ़ी अन्तराल भी है, पर उसकी दूर कराह मुझे स्पन्दित करती है। अनुभव अपना ही होता है यह अनुभव भी अपने को ही हो रहा है, पर अपने से अलग पड़े हुए दूसरे अन्य व्यक्ति का, तो क्या हमारे भीतर कुछ है, जो हमें इस अन्य व्यक्तियों के साथ अन्तराल में भी मौजूद होकर जोड़ रहा है। कुछ ऐसा है जो उस व्यक्ति में है। मेरे उसके बीच स्थित अन्तराल में है, और मेरे में भी है, और हम दोनों के पार भी है। कुछ ऐसा है, जो सर्वत्र है सबके आर-पार है। सब में है और मेरे भी हैं। अथवा जिसके होने से मुझे संवेदनाओं की अनुभूति होती है यही है व्यावहारिक धर्म।

वेदों में दो प्रकार की इसी चेतनात्मक अनुभूति को शरीर के तल पर व्यक्ति और समग्र के तल पर समष्टि की दृष्टि से, जीवात्मा और परमात्मा कहा गया है। तथ्यतः करुणा, दया, सहयोग प्रेम, रक्षा, सहायता, इस चेतनात्मक संवेदना के कारण ही है। चूँकि यह संवेदनात्मक चेतना ही (वेदों के अनुसार परमात्म चेतना ही) समाज भावना की जननी या धारक है। बिना इस चेतना के किसी उन्नत समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

वास्तविकता यह है कि जब मार्क्स शोषितों की पीड़ा पर विचार कर रहे होते हैं तो उस समय वह चेतना के व्यापक तल से अभिभूत रहते हैं, किंतु उस समय वह जिस शोषण, सांप्रदायिकता को धर्म कह रहे होते हैं, या समझते हैं, वह तो धर्म की आड़ में छिपा हुआ अधर्म ही है। किन्तु उस अधर्म को धर्म मानकर वह उस चेतना को भी इन्कार कर जाते हैं जो स्वयं उसमें शोषितों के साथ आत्मभाव के कारण जागृत हुई है, और परिणामतः संवेदनाहीन उसकी समाज की परिकल्पना एक अत्यन्त क्रूर हृदयहीन तानाशाही को जन्म देती है। इतिहास साक्षी है एक कामरेड ने सत्ता प्राप्ति हेतु जितनी दूसरे कामरेडों की हत्यायें कीं उतना और कहीं नहीं मिलता। इसीलिए कम्यूनिज़म शासन ने आदमी के स्व को मिटाकर उसे निर्दयतापूर्वक मशीन समझने की कोशिश की तो असफल हो गया। समाज का प्राण निकालकर समाजवाद की कल्पना ही समाज की हत्या है।

वास्तव में करुणा, दया, प्रेम, सहयोग, संरक्षा जिस चेतना पर आधारित हैं जो चेतना हमें अन्याय, अपराध, शोषण का विरोध करने को प्रेरित करती है वह परमात्म चेतना ही धर्म है। यह कब से है? क्या यह प्रश्न बनता है। जबसे जीवन चेतना है तभी से धर्म है। या यो कहें कि धर्म ने ही इस जीवन चेतना को धारण कर रखा है। श्रुति के शब्दों में-

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।2

जिसने यहाँ इस लोक में ही इस परमात्मा का अनुभव कर लिया उसने जीवनसत्य को प्राप्त कर लिया, यदि यहाँ नहीं प्राप्त किया तो उसका जीवन व्यर्थ हो गया। प्राणी-प्राणी में विशिष्ट रूप से व्याप्त चेतना का अनुभव करता हुआ उस अमृत को प्राप्त कर लेता है, जो इस लोक में है और इस लोक के पार भी है। इस संबंध में एक वेदमंत्र और भी-

यस्मिन् सर्वाणि भूतानि, आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं, ततो न बिजुगुप्सते।।3

जो सभी प्राणियों को अपने में देखता है और सभी प्राणियों में अपने को देखता है तब वह किसी की निन्दा नहीं करता है।

इस प्रकार धर्म व्यक्ति का जीवन है और धर्म ही राष्ट्र का और समाज का प्राण है। धार्मिक चेतना में ही उद्गार फूटता है।

‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।4

इसीलिए श्रुति ने इस मानवता की समष्टि के लिए, सम्पूर्ण समाज की नैतिक रक्षा के करने के कारण इस धर्म को ही सबसे श्रेष्ठ, समाज की आन्तरिक शक्तिरूप शासक होने से शासकों का भी शासक माना है। श्रुति के शब्दों में-

स नैव व्यभवत्। तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मम्। तदेतत्क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मः। तस्माद् धर्मात् परं नास्ति। अथो अवलीयान्बलीयान् समाशंसते धर्मेण यथा राज्ञैवम्। यो वै स धर्मः सत्यम् वैतत्। तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति। धर्मं वावदन्तं सत्यमवदतीति।5

अर्थात् परमात्म चेतना का अनुभव करने वाला समस्त मानव को समाज के परम वैभव तक ले जाने के इच्छुक ज्ञानी समुदाय, ऋषि समुदाय विविधात्मक अजीविका कर्मों की सुव्यवस्था करने के बाद भी जब अपेक्षित वैभव को प्राप्त न कर सका तब उसने इस मानवता के श्रेष्ठतम रूप धर्म की रचना किया। वह यह धर्म शासक का भी शासक है। इसलिए धर्म से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। इसीलिए धार्मिक जीवन जीने वाला कमज़ोर व्यक्ति भी बहुत बलवान् वैसे ही होता है, जैसे राजा का आत्मीय ग़रीब आदमी भी बहुत शक्तिशाली होता है। जो यह धर्म है यह ही सत्य है। इसीलिए सत्य बोलने वाले को कहते हैं कि यह धर्म पर चलता है और धर्म पर चलने वाले कहते हैं कि यह सत्य बोलता है। इसीलिए यह दोनों सत्य और धर्म संयुक्त हैं, क्योंकि दोनों मूलतः परमात्म चेतना में संयुक्त हैं।

भगवान् राम के जीवन में इसका स्पष्ट दर्शन होता है। तभी तो महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं- "रामो विग्रहवान् धर्म"6 राम मूर्तिमान् धर्म हैं। प्रसंगवशात् राम के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करना उचित होगा।

सारे प्राणियों का हित चाहने वाले राम वनवास काल में महर्षि शारंग के आश्रम में गये। वहीं निवास करते समय उनके पास ऋषि समुदाय आया और उनसे राक्षसों के अत्याचारों को बताया। वाल्मीकि के शब्दों में-

एहि पश्य शरीराणि, मुनीनां भवितात्मनाम्।
हतानां राक्षसैर्घोरैर्बहूनां बहुधावने।
पम्पानदीनिवासानाम् अनुमन्दाकिनीमपि।
चित्रकूटाचलानां च क्रियते कदनं महत्।।7

अर्थात् हे राम! शुद्धात्मा वाले मुनियों के कंकाल देखिए। जिन्हें क्रूर राक्षसों ने बहुत प्रकार से वनों में मार डाला। सब भला चाहने वाले ये ऋषि बहुत पम्पा नदी के किनारे रहने वाले और बहुत से मन्दाकिनी के तट पर विचरने व रहने वाले थे। आप जैसे नाथ रहते हुए भी हम अनाथ हो गये हैं। आप हमारी रक्षा करें। भगवान् राम ऋषियों की वह पीड़ा देखकर अत्यन्त दुखी हुए। ऋषियों की पीड़ा उनके नेत्रों से अश्रु के रूप में उतर आयी। उनकी करुणामय चेतना महाशक्ति के रूप में मुख से शब्दवती हो उठी।

तपस्वीनां रणेशत्रून्, हन्तुमिच्छामि राक्षसान्।
पश्यन्तु ऋृषयः वीर्यं सभ्रातुर्मे तपोधनाः।8

अर्थात् हे मुनिजन! तपस्वियों के शत्रु राक्षसों को मारना चाहता हूँ। हे तपोधनों! भाई के सहित आप मेरी इस धार्मिक संकल्प शक्ति का दर्शन करें।

इस प्रकार राम ने अपनी आध्यात्मिक संकल्प शक्ति से यह प्रतिज्ञा कर ली। दूसरे दिन वे सीता लक्ष्मण के साथ सशस्त्र ऋषियों के आश्रमों के भ्रमण के लिए चले तो सीता ने उनकी प्रतिज्ञा पर संवेदनात्मक, वैचारिक एवं धार्मिक प्रश्न उठाये।

उन्होंने कहा कि सूक्ष्मता से विचार करने पर आपके द्वारा की गई प्रतिज्ञा में अधर्म दिखाई देता है। तीन प्रकार के कर्म व्यसन हैं (अपराध है)। 1. असत्य भाषण 2. कामासक्त होकर स्त्रीसंगमन और 3. बिना किसी शत्रुता के हिंसाकारक रौद्र रूप। वाल्मीकि के शब्दों में-

कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम्।
तव नास्ति नृपेन्द्राणां न चाभूते कदाचन।।
मनस्यापि तथा राम न चैतद्विद्यते क्वचित्।
स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज!।
धर्मिष्ठः सत्य संधश्च, पितुर्निर्देशकारकः।
त्वयिधर्मं च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।।9

हे नृपेन्द्र। दूसरे के धर्म का नाश करने वाली परस्त्री की अभिलाषा न तो आप में है और न कभी थी। मन में भी इस प्रकार की सोच आप में कभी संभव नहीं। आप सदा अपनी पत्नी में ही वह निष्ठा रखते हैं। आप धर्मनिष्ठ, सत्यसंध और पिता के निर्देश का पालन करने वाले हैं। आप में धर्म, सत्य और सदाचरण प्रतिष्ठित हैं।

किन्तु आज आपने ऋषियों की रक्षा के लिए राक्षसों के वध की जो प्रतिज्ञा कर ली है वह मुझे उचित नहीं जान पड़ती। क्योंकि-

वुद्धिर्वैरं बिना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान्।
अपराधं बिना हन्तुं लोको वीरं न मन्यते।।10

बिना शत्रुता के और बिना विचार किये दण्डकारण्य में रहने वाले राक्षसों की मारने की प्रतिज्ञा उचित नहीं है। बिना किसी अपराध के किसी को मारना वीरता और धर्म नहीं है।

ऐसा लगता है कि बहुत समय से ऋषियों के साथ रहने के कारण आपको इन ऋषियों के प्रति मोह हो गया है। उसी मोह से ग्रस्त होकर आपने निरपराध राक्षसों को मार डालने की प्रतिज्ञा कर ली है। यदि ऐसा है तो आपको इस अधार्मिक प्रतिज्ञा का परित्याग कर देना चाहिए, क्योंकि धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है और यदि ऐसा नहीं है और आपकी प्रतिभा धर्मनिष्ठ है तो मुझे समझायें कि वह कैसे है। जिस पर राम ने सीता से कहा कि सीता आपने स्वयं कहा कि-

"क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दं भवेदिति।"11

अर्थात् क्षत्रिय धनुष बाण इसलिए धारण करते हैं कि कहीं आर्तनाद न सुनाई पड़े। यह ऋषि आर्त हैं। इन्होंने स्वयं आकर हमें अपनी सम्पूर्ण स्थिति से अवगत कराया है। हम स्वयं बारह वर्षों से इनके बीच रह रहे हैं। हमने देखा है कि यह ऋषि सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं। जो राक्षस इन ऋषियों के शत्रु हैं वे किसी के लिए हितकर नहीं हो सकते। सभी प्राणियों के हित में लगे इन महात्माओं के शत्रु राक्षसों में किसी के हित की भावना करने का भ्रम राम को नहीं है। राम बिना विचार किये कोई प्रतिज्ञा नहीं करता, और विचार पूर्वक की गई प्रतिज्ञा से कभी हट नहीं सकता। वाल्मीकि से प्राप्त राम के शब्दों में-

संश्रुत्य न सक्ष्यामि जीवमनः प्रतिश्रवम्
मुनीनामन्यथा कर्तुं सत्यमिष्टं हि में सदा।।12

अर्थात्- हे सीता! भलीभाँति विचारकर की गई अपनी इस प्रतिज्ञा को मैं जीते जी बदल नहीं सकता हूँ। वह भी मुनियों के विषय में जिन्हें मैंने भली भाँति जाना समझा है। सीता मुझे सदा सत्य धर्म इष्ट है। जहाँ सत्य है धर्म है वहाँ राम हैं। भगवान राम आगे अपनी प्रतिज्ञा पूर्णता के लिए कितने दृढ़ हैं यह देखें-

अप्यहं जीवितं जह्यं, त्वां च सीतेसलक्ष्मणाम्।
न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य, ब्राह्मणोभ्यो विशेषतः।।
तदवश्यं मया कार्यं ऋषीणां परिपालनम्।
अनुक्तेनापि वैदेही प्रतिज्ञाय कथं पुनः।।13

अर्थात- हे सीते! राक्षस बहुत भयंकर हैं हो सकता है मैं ही मारा जाऊँ अथवा कुटिल भयंकर राक्षसों से भावी संग्राम में अपने अत्यन्त आत्मीय तुम्हारे सहित लक्ष्मण को भी खोना पड़े, किन्तु यह प्रतिज्ञा अब नहीं बदलेगी वह भी इन ज्ञानवान् ऋषियों के लिए की गई प्रतिज्ञा। हे सीते! यदि यह ऋषि हमसे न कहते तो भी मैं यही करता। फिर प्रतिज्ञा करके बदलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

इससे स्पष्ट है कि धर्म संवेदनाओं में है। करुणा में है। दया में है। समाज की संरक्षा में है नैतिकता में है। सम्पूर्ण लोक के हित चिन्तन में है। तभी तो महर्षि कणाद कहते हैं-

"यतोऽभ्युदयः निःश्रेयस् सिद्धिः स धर्मः।"14

जिससे समाज का उदय हो, और श्रेष्ठतम की प्राप्ति हो वह धर्म है। तभी तो श्रुति उद्घोष करती है-

"धर्मात् परं नास्ति।" (धर्म से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं।)15

रामकेश्वर तिवारी
वरिष्ठ अनुसन्धाता (व्याकरण विभाग)
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

संदर्भ ग्रन्थ सूची:-

1. वैशेषिक सूत्र 1/3
2. केनोपनिषद्
3. यजुर्वेद माध्यन्दिन संहिता 40-6
4. ऋग्वेद संज्ञान सूक्त दशम मण्डल की पूर्णता
5. शतपथ ब्राह्मण 14/4/2/26, बृहदारण्यकोपनिषद् 1/4/14
6. वाल्मीकि रामायण
7. वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड 6-16,17
8. वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड 6/25।।
9. वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड 9-5,6
10. वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड 9-25
11. वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड 9-27
12. वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड 10-17
13. वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड 10-18,19
14. वैशेषिक सूत्र 1-3
15. शतपथ ब्राह्मण 14-4-2-26


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