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ISSN 2292-9754

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06.12.2014


क्या तुमको भी ऐसा लगा ?
जीवन की ऊष्मा से भरी कविताएँ

पुस्तक : क्या तुमको भी ऐसा लगा? (काव्य संग्रह)
लेखिका : डॉ. शैलजा सक्सेना
कैनेडियन प्रकाशक :हिन्दी राइटर्स गिल्ड
3577 नेबुलस गेट, मिसिसागा, ओंटेरियो, एल5बी 3जे9
मूल्य : $10.00 (कनाडा और यू.एस.ए.)
पृष्ठ संख्या : १२६ सजिल्द
भारतीय प्रकाशक : अयन प्रकाशन (प्रकाशनाधीन)

 

कविता किसी भी कवि के हृदय की गहन अनुभूति विचारों का मन्थन और कल्पना का अनुरंजन है। कवि का चिन्तन जितना गहन होगा,अनुभूति जितनी सान्द्र होगी, कल्पना जितनी बहुरंगी होगी, भाषा जितनी ज़मीन से जुड़ी और बहुआयामी होगी, कविता उतनी ही प्रभविष्णु और प्रामाणिक होगी। भर्तृहरि के अनुसार शब्द और वाक्य देशकाल में हैं,जबकि अर्थ देशकाल से परे है। उन्होंने अपने वाक्यपदीय ग्रन्थ में कहा भी है-

स्तुतिनिन्दा प्रधानेषु वाक्येष्वर्थो न तादृश:
पदानां प्रतिभागेन यादृश: परिकल्पयते ॥-2-247

शैलजा सक्सेना का काव्य- संग्रह इन सब कसौटियों पर खरा उतरता है। इनके संग्रह का आरम्भ ही ‘आज की कविता’ से होता है। वहाँ ‘अफ़गानिस्तान के पथरीले ढूहों की अजनबी मिट्टी पर संवेदनहीन आँखों के बीच अकेले मरते सैनिक की आह’ आज विश्व बिरादरी को सोचने पर मजबूर करती है। बेटे के बाद पोते को अपने हाथ से दफ़नाना दो पीढ़ियों के खात्मे की चिन्ता को समेटे है। काले कपड़े में लिपटी बुक्का फ़ाड़कर रोती बेवा की असीम व्यथा अहंकारी महाशक्ति के बहरे कानों तक नहीं पहुँचते। हेटी, नाइज़ीरिया, युगाण्डा से होती हुई पीड़ा की कविता चीन के बन्द तहख़ानों तक हो आती है। एक देश अपने ही देश वालों की रोटियाँ छीनने से भी नहीं हिचकता। ‘आवाज़ें’ कविता में प्रवास की पीड़ा उजागर होती है, तो उसे बाह्य उपादानों से दबाने की नाकाम कोशिश की जाती है। ‘एक साँस’ में व्यस्तता भरे जीवन का चित्रण है, तो ‘इण्टरनेट की सड़क पर’ बिन सूँघे बिन छुए बनते हवाई सम्बन्ध हैं, दोस्ती के पेड़ पर बातों के आधारहीन घोंसले हैं; जिनमें रहा नहीं जा सकता।

दूसरी ओर शैलजा की ‘कनाडा में बसन्त’ कविता है; जिसमें उस हवा का बिम्ब मन को मोह लेता है, जो-‘पेड़ों को जगाती हिमनिद्रा से, घास को मुस्कराने का आदेश देती, कलियों का मस्तक सूँघती’ है। यह महकती, छलकती हवा ‘पाहुन धूप’ के स्वागत की तैयारी में जुट जाती है। इस कविता का एक-एक शब्द मुखर है, अपनी नूतन भाव-भंगिमा के साथ।

‘दृश्य : सुबह’ की लयात्मकता और बिम्बविधान मन मोह लेते हैं, ‘सड़कें पानी पीकर लेटीं/ पत्ते सभी नहाए दिखते’; लेकिन इसके साथ भागमभाग की दिनचर्या लगता है सब आनन्द छीन लेने पर आमादा है। दूसरी ओर ‘दृश्य : वर्षा’ में झुग्गी में भीगते काँपते रामू, मुनिया और बुखार से पीड़ित मुनिया की माँ की चिन्ता अलग तरह की है, - ‘तकिया बिस्तर आन सुखाओ’ बुड़-बुड़ करते मुन्ना की प्रार्थना के रूप में।

‘कविता क्या दे सकती है?’ में शैलजा ने जो आत्म साक्षात्कार की बात कही है, वही काव्य का विशिष्ट गुण है। किताब के सीने पर हाथ रखकर उसमें निहित अर्थ के झरनों से आनन्द की रुलाई तक भीगने की प्रक्रिया जारी रहती है। कवयित्री की जीवन-आस्था – ‘कुछ है…’ कविता में बड़ी सादगी से अभिव्यक्त होती है-

जो रूढ़ियों से नहीं डरा / न सूखे में सूखा / न पतझर मे झरा /--जो अब भी नहीं मरा।

‘क्या पहचानते हो?’ में व्यक्तित्व की तलाश विभिन्न रूपों में होती है। वह साये की तरह है, हाथ की लकीरों की तरह है और इससे भी आगे बढ़कर एक सहज मुद्रा – ‘नींद में गाल के नीचे रखी हथेली’ बन जाती है। ‘खुशफ़हमियाँ’ व्यक्ति की विशिष्टता का सन्धान है। इस कविता की लय इन पंक्तियों में देखी जा सकती है-

‘समझ में बड़ा है/ संघर्ष की दौड़ में/ सबके साथ / बराबर में खड़ा है।’

अस्तित्व की यही तलाश ‘अपनी पहचान’ में मुखर हुई है। ‘तुम’ कविता में भी वह नज़र आती है - ‘मैं तुमसे नहीं/ तुम्हारे साथ स्वतन्त्र होना चाहती हूँ।’ ‘पीठ पर हाथ’ कविता में पीठ पर हाथ रखने की ऊष्मा की संवेदनात्मक गहराई से लगता है- प्यार छलककर बाहर आ गया है। ‘एक प्यार ऐसा भी!’ में प्यार का मर्मस्पर्शी रूप हमारे सामने आता है। चले जाने के बाद कसक और आँसुओं का प्रवाह- ‘कि उसमें डूबने-डूबने को हो आती हूँ’ जैसी विवशता मथ देती है। ‘तुम्हारी आँखों का सूरज’ प्रेम की गहन और उदात्त प्रस्तुति इस कविता को प्रेम का स्यापा लिखने वालों से अलग करती है। ‘हमारा प्यार’ में एक प्रेम-भरा घर है, भिन्न होकर भी अभिन्न। ‘कितने दर्द उठाए तुमने’ की आत्मीय अभिव्यक्ति - ‘तब मैं तुम्हारे दिल की आग/ बाहों में बाँध लूँगा’ की नूतनता मोह लेती है। ‘हमारे हाथ’ में – खुरदुरे पोरों से / झर रही है कोमलता’ एकदम अभिव्यक्ति बेजोड़ है।

स्व की इस तलाश के साथ सामाजिक उथलपुथल को ‘उम्रक़ैद’ कविता की चिट्ठी के प्रश्न सामाजिक क्षेत्र में हो रही क्रूर एवं अमानवीय उथलपुथल को बेनकाब करते हैं।

पारिवारिक गर्माहट आपकी कविताओं में माँ–पिता, पति–पत्नी / प्रेयसी के बहाने मर्मस्पर्शी बन जाती है। पिछली रोटी, बूढ़ी यादें (चाह रहा हूँ देश पराया/ छोड़ देहरी घर को आजा /--मतलब जीने का समझा जा’), पिता के लिए (मन की चट्टानों से टपकता है दु:ख), अम्मा, माँ आदि कविताएँ द्रवित कर देती हैं। कभी जो टोकने पर अटकती थी, वही आज टोके जाने को तरसती है।

कवयित्री की दृष्टि समाज के कई अँधेरे कोनों की भी पड़ताल करती है। ‘घर-बेघर’ की वेश्याएँ सभ्य समाज को बेनकाब करके कई बींध देने वाले प्रश्न छोड़ जाती हैं। ‘बच्चा पिटता है’ में सत्ता के अन्याय और शोषण को शृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत किया है। ‘सोया हुआ आदमी’ भी शोषण की ही कथा कहती है। ‘श…श---श…’ तन्त्र की क्रूरता से उपजी चुप्पी की नियति और चुप्पी से गढ़ी गई वह मानसिक स्थिति है; जो स्वतन्त्र सोच को अपना ग्रास बना लेती है। एक अन्य कविता ‘बच्चे की हँसी’ कविता में बच्चे की हँसी के छिन जाने की चिन्ता उजागर हुई है।

आपकी कविताओं में नारी को विभिन्न रूपों में चित्रित करते हुए भी उसके स्वतन्त्र चेता रूप को प्रधानता दी गई है। ‘पुरुष और स्त्री’, ‘सर्व परित्यक्तान’ से ‘बरसों बाद’ तक की यात्रा खुलकर जीने की यात्रा ही नहीं वरन् स्व को पहचानने की भी है। ‘एक किशोरी का पत्र’ भी उसी स्वतन्त्र चेतना की स्वीकृति है। ‘घर आई मैं’ की लयात्मकता इसे लोकधुन की गीत माधुरी से सिक्त कर देती है।

शैलजा की कविताएँ आरोपित नहीं, जीवन अनुभव के मौसम में अनुकूल वर्ष में फूटे अँखुएँ है, जो धूप, छाँह, पानी सबकी संगति हैं। आपकी कविता में कहीं भी भाषा का सायास संयोजन नहीं वरन्, अनायास उमड़ा उत्स्रुत कूप है। यह कहीं आँसुओं से भीगी है, कहीं मुस्कान –सी खिली है, कहीं धूप से धुली है और कहीं जीवन के खुरदुरे यथार्थ से जूझती हैं।

इस तरह के काव्य–संग्रह बहुत ही कम नज़र आते हैं। आशा करते हैं कि शीघ्र ही आपके और संग्रह भी सामने आएँगे।


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