अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.15.2015


तसल्लियाँ ही झूठी दे के

तसल्लियाँ ही झूठी दे के न बहलाया करो।
ये चोट खाया दिल है, इस पे तरस खाया करो।

ये क्या कि धूप की तरह जलाते रहते हो,
कभी तो अब्र बन के हम पे बरस जाया करो।

सुबह से शाम, शाम से सुबह, तन्हाई है,
ज़रा सा वक़्त मेरे साथ भी बिताया करो।

ये चटके आईने, ये अक्स बिखरे-बिखरे से,
नज़ारा ये भी कभी देखने को आया करो।

हमें तो हो गई आदत फरेब खाने की,
ये दुनिया क्या है, अब हमें नहीं समझाया करो।

तुम्हारा एक भी ख़त भूल से नहीं आता,
कसम से, कोई एक वादा तो निभाया करो।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें