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ISSN 2292-9754

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07.18.2014


ट्यूशन शरणम् गच्छामि

बेरोज़गारी की सड़क पर दिशाहीन होकर गश खा रहा था। अचानक एक दिन मेरा कॅालेजेटिया यार सत्यकाम टकरा गया। गले लगते ही वह मेरी सुकरातनुमा दाढ़ी और मातमी थोबड़ा देख फूट पड़ा- "ये कैसा हुलिया बना लिया? कैसी काट रहा है? दाल-रोटी में ब्रेक तो नहीं चल रहा?"

मैं भी अपनी परेशानी टपकाते हुए बोला- "अब क्या सुनाऊँ यार, देव ही हमसे मुँह फुलाए बैठे हैं। दुखों के आषाढ़ी बादल रह-रह कर मेरे ही ऊपर फट पड़ते हैं। हम भी कभी सोचते थे कि पूजनीय प्रेमचंद, निराला, प्रसाद की तरह साहित्य के किले फतह करेंगे। साहित्य की रणभूमि में हम भी कभी नामवर होंगे और साहित्य-शिरोमणि बन ठाठ से पाठकों के सिरों को धुनेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से घर को आर्थिक ग्रहण लगा और पी‐एच. डी. और पेट के द्वंद्व में पेट जीत गया। तब से किश्तों में इधर-उधर काम करके परिवार का खटारा खींच रहा हूँ। अच्छा तू अपनी सुना, देखकर तो लगता है पौ बारह हो रही है।"

वह गर्दन गिराते हुए निराश भाव से बोला- "क्या बताऊँ यार,शनि की वक्र दृष्टि पापा की नौकरी को छंटनी में निगल गई और एक घरेलू दुकान थी, जिसे सीलिंग का लकवा मार गया, लेकिन बच्चू मैंने भी शकुनी दिमाग से लिया और ठान लिया कि अब तो वहीं धंधा करेंगे, जिसमें घर बैठे-बैठे ही लक्ष्मी खुद-ब-खुद दौड़ती आए। जैसे घर बैठे लोग पत्राचार से बी.ए., एम.ए.,एम.फिल. वगैहरा-2 की डिग्रियाँ झटक लेते हैं। मैंने दिमाग की खिड़कियाँ खोलकर बाज़ार का रिसर्च किया तो पाया कि ट्यूशन का बाज़ार पिछले कई सालों से खूब फल-फूल रहा है। शहरों-कस्बों में कुकरमुत्तों की भाँति कोचिंग सेंटर पसरे पड़े हैं और इन सेंटरों के मालिक, बुद्धि के ठेकेदार बने खूब लाभ-शुभ कर रहे हैं। मैंने भी अपने खाली पड़े दो कमरों का मेकअप करके उन्हें ट्यूशनशाला में बदल डाला और एक सस्ता-सा बोर्ड टाँगा, उस पर खाँसी से कैंसर तक अर्थात् "पहली से बारहवीं तक ट्यूशन" लिख दिया। लक्ष्मी की कृपा से "हींग लगे न फिटकरी, माल चोखा" वाली कहावत सफल हो गई और तेरा भाई मजे से अब घर बैठे बीसेक हज़ार तोड़ लेता है। यह बारामासा चलने वाला धंधा है। सब माँ-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे पूरी क्लास के नंबर झटक लें। ज्ञान नाम की चिड़िया तो शिक्षा जगत से कब की फुर्र हो चुकी है। इसी का फायदा तो महानगर में फैले सरस्वती के टापू उठा रहे हैं। इनमें से अधिकांश पढ़ाने वाले तो ऐसे हैं जिनका अपने ज़माने में पढ़ाई से छत्तीस का आंकड़ा था और अब स्वयंभू "सर" बने बैठ, मजे लूट रहे हैं। अब तू मुझे ही देख, तुझसे तो कुछ छिपा नहीं है, अपनी बी.ए. भी सप्लीमेंटरी के हिंडोले में लटक-झटक कर किसी तरह किनारे लगी थी। और आज हम भी शान से "सर" कहला रहे हैं।

मोहल्ला ब्रांड अंग्रेज़ी स्कूलों ने तो इस ट्यूशन उद्योग को चढ़ाने में चार चाँद जड़ दिए हैं। उन्होंने तो अपने फायदे के लिए बच्चों पर इतनी किताबें लाद दी हैं कि वे गधे बने घूम रहे हैं। इनके पालक भी होमवर्क की चक्की में पिसकर जब बुरी तरह टूट जाते हैं तो अपने नौनिहालों को हारकर ट्यूशन के हवाले ही करते हैं। सुन तो तूने भी रखा होगा, आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी।"

मैंने उत्सुकतावश पूछा- "तूने राजनीति विज्ञान से विज्ञान के पाले में कैसे घुसपैठ कर ली?"

उसने हँसते हुए कहा- "तू भी निरा बेवकूफ है, अपने हिंदी साहित्य के कुएँ में झाँककर देख, इसके पानी में कितना घालमेल मचा हुआ है। कथाकार पर उपन्यास लिखने का भूत सवार है, उपन्यासकार आत्मकथा रचने में मग्न है और कवि पर कहानी लिखने की धुन सवार है।"

मैंने कहा- "यार, तो तुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती होगी।"

वह बोला- "अरे काहे की मेहनत। मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है जो अपना भेजा खराब करूँ। मैंने इन्हें न्यूटन बनाने का ठेका थोड़े ही ले रखा है। सब कुछ तो गाईड-कुंजियों में दबा हुआ है। जब तक बच्चा सेंटर में पड़ा है उसे कुछ न कुछ लिखवाते रहो और बीच-बीच में उसका टेस्ट भी लेते रहा ताकि माँ-बाप को नंबर देखकर लगे कि उनका बच्चा प्रोग्रेस कर रहा है। उसकी रचनात्मकता और विचार करने का दरवाज़ा तो स्कूल ही बंद कर देता है। कोचिंग सेंटर तो बच्चें को रटंत विद्या की संजीवनी देते है। इसमें एक बात का ख़ास ध्यान रखना पड़ता है कि कभी भी बच्चे को अपने से कोई प्रश्न पूछने का चांस मत दो। यूँ तो परीक्षा की चक्करघिन्नी में वह इस तरह फँसा होता है कि ऐसा साहस नहीं करेगा, यदि ज़्यादा ज़िद करे और महाजन की तरह अड़ा रहे तो झट से कहो, यह कोर्स से बाहर का है, पेपर में नहीं आएगा। यह सुनते ही वह तुरंत चुप हो जाएगा क्योंकि वह भी नंबरों की चूहा दौड़ में शामिल हो चुका है। इस धंधे का सिद्धांत है- "अहो रूपम, अहो ध्वनि।" माता-पिता के आगे सदा बच्चों की तारीफ के ऐसे पुल बाँधो और कहो कि बच्चे का सब कुछ अच्छा है लेकिन किलर इंस्टिंक्ट की कमी है। बच्चे भी अपनी तारीफ सुनकर फूले नहीं समाएँगे और भूले से भी सेंटर छोड़ने की बात मन में नहीं लाएँगे। अब सोच क्या रहा है? जब तक कहीं टिकाऊ नहीं होता, तू चाहे तो मेरे इस धंधे में आ सकता है और फिर देख तेरे चेहरे पर कैसी खुशहाली आएगी। उसने जेब से अपना विज़िटिंग कार्ड निकालकर मेरे हाथ पर धरा और फिर बोला-अभी तो मुझे देर हो रही है। कल ज़रूर मेरे सेंटर में आना। मैं राह देखूँगा।"


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