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ISSN 2292-9754

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12.23.2018


छोटा सा गाँव हमारा

स्वर्ग से भी सुन्दर है 
छोटा सा गाँव हमारा
राकेश रवि दीपक जलते 
ओझल होता अँधियारा  

मुँडेरों पर मोर सवेरे 
आकर करतब दिखाते 
दादी दाना डाल रही
बच्चों को बहुत सुहाते 

आसमान सा खुला हुआ 
खेतों तक पाँव पसारा 
मिट्टी के पन्नों में लिखता 
क़िस्मत का लेखन सारा

हर दिल में निश्छलता सुन्दर -
महल बनाकर बसती है 
रग-रग में यहाँ नर-नारी के 
फागुन जैसी मस्ती है 

शाम सवेरे ने रोली 
रंगों से रूप सँवारा 
रजनी ने डिब्बा खोल दिया 
हीरों सा चमके तारा 

पनघट के हैं मधुर स्वर 
रहटों  के गीत निराले हैं 
संशय की चादर को दिल से 
दूर हटाने वाले हैं 

जलाशीश तरु डाल रहे 
खग बहा रहे रस धारा 
सक्षम परकोटा टीलों का 
मंगल से मंडित द्वारा 


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