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ISSN 2292-9754

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09.07.2017


अपनी बात

भाग - 3

छत्रपुर, छाता उर्फ लहुरी काशी - सरजू और गंगा के बीच, सुरहा (सौरभ) झील से दो कोस दक्षिण-पूर्व में पाँच हज़ार की आबादीवाला एक गाँव है। वैसे तो यह गाँव है ठाकुरों का - पर पूर्वी छोर पर ब्राह्मण परिवारों का एक लम्बा सिलसिला है। गाँव की बाक़ी आबादी में अहीर, बनिया, हरिजन, नोनियाँ, कलवार, भर आदि जातियों के साथ ही साथ कुछ मुसलमान भी हैं। गाँव के उत्तर में एक नदी है जो इसकी पश्चिमी सीमा से दो मील दूर कटहर नाले से फूटती है। कटहर नाला गंगा नदी को सुरहा झील से जोड़ता है। यह नदी हमें इसी बहाने गंगा से जोड़ती है। यह क्षुद्रनीरा है। क्योकि गाँव से पूरब थोड़ी दूर पर खेतों में जाकर सूख जाती है। इसका कोई ख़ास नाम भी नहीं है। बस यह एक नदी है जो बरसात में अचानक पूरे उफान पर आती है और गर्मी आते-आते अपनी ख़ुद की प्यास बुझा पाने की असमर्थता लिए मर जाती है। इतना ही क्या कम है कि यह नदी अब तक ज़िन्दा है। लेकिन सारे गाँव का कचरा ढोनेवाली यह नदी कब तक ज़िन्दा रह पाएगी यह बता पाना कठिन है। इसी का कलेजा खोद-खोदकर लोगों ने अपने घरों के पास के इसके किनारे पाट लिए। बीच में भी कई द्वीप जैसे उभरते आ रहे हैं इसमें। बुरा हो लखिया बाभन का जिसने इस गाँव को दो रोग लगाएः एक जलकुंभी जो नदी की छाती पर मूँग दलती धीरे-धीरे काफी पसर गई है। अब नदी का भगवान ही मालिक है। यह लखिया भी काफ़ी ऊँची चीज़ था। पहले इसने अपने घर के पीछे सालों तक नदी को पाटा। फिर लाया भरी ज़मीन का कटान रोकने का उपाय। एक ऐसा उपाय जो इस गाँव को लगाया गया लखिया का रोग नम्बर दो साबित हुआ। न जाने कहाँ से लाया एक अनाम सा पौधा - जिसे पानी, बेपानी, गर्मी-बरसात, सिर्फ एक रट लगी थी- ऊपर-नीचे, अगल-बगल, पसरो, पसरो, दख़ल बेदख़ल करो। पौधे की इस बेख़ौफ़ पसरनी प्रवृत्ति पर कोई भी अंकुश काम नहीं कर पाया है। दूसरे लोगों ने भी इसे यहीं से ले जाकर लगाया। वहाँ भी ऐसी ही बेपनाह बाढ़। आज यह पौधा अनाम नहीं है। पर लोगों ने नाम भी क्या चस्पां चुना है बेहया। लखिया के लगाए ये दो रोग गाँव के लिए कैंसर से कम नहीं। लखिया अपने-आप में भी तो एक कैंसर ही था। कौन नहीं जानता कि थोड़ी सी ज़मीन पर काबिज़ बन कर उसने चार ग़रीब परिवारों की नौ बीघे ज़मीन हड़प ली। अभी कुछ दिन पहले तक बड़े ठाट से रेलवे लाइन के उस पार गाँव के खेतों की सरहद पर केले के झुरमुट में झोपड़ी लगाए अलख जगा रहा था। पर सावधान! उसने वहाँ भी बेहया लगा रखा है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक लखिया ज़िन्दा नहीं है। पर काफ़ी लम्बी उमर पाई उसने। वैसे बहुत झुक गया था - चलता था तो ज़मीन भर ही देख पाता था अपने अन्त के दिनों में।

भाग - 4

जी हाँ, गाँव के दक्षिण रेलवे-लाइन के उस पार इस गाँव के खेत हैं। कई बग़ीचे-तालाब और नए-पुराने मन्दिर भी हैं। एक हाई स्कूल भी है। रेल लाइन के समांतर ही पक्की सड़क है जो इस गाँव को पश्चिम में बलिया से जोड़ती है और पूरब में सहतवार होते हुए रेवती से। पहले गाँव में रेलवे स्टेशन नहीं था - ट्रेन पकड़ने के लिए लोग या तो पूरब में सहतवार जाते थे या फिर पश्चिम में बांसडीह रोड। अब जब से हाल्ट स्टेशन बना है काफ़ी राहत है। गाहे-बेगाहे मौक़ा पाकर गाँव की नई-नवेलियाँ भी बलिया जाकर अमिताभ बच्चन का बायस्कोप देख आती हैं। पर हाल्ट हाल्ट ही है। वह बात कहाँ जो परमानेन्ट स्टेशन में होती है। इमारत के नाम पर बस एक कोठरी है और प्लेटफार्म भी कच्चा है। छाँह से बचने के लिए अभी हाल में ही कुछ पेड़ लगाए गए हैं। स्टेशन ठीके पर है। ठीकेदार ही स्टेशन-मास्टर से लेकर बुकिंगक्लर्क- पानी पाँडे सब कुछ है। एक लतमरुआ थे रामजी सिंह जो शराब के लिए चन्द सिक्के जुटा पाने की इच्छा में दिन रात यहीं लटके रहते थे। स्टेशन-मास्टर इतना मोटा है कि हिलने-डुलने में भी उसे काफ़ी कोशिश करनी पड़ती है। राम जी उसका सारा काम करते थे। टिकट-चेकिंग बड़ी ही मुस्तैदी से करते थे। क्यों न करते - लालपरी के लिए लाल-लाल पैसे भी तो यहीं से मिलते थे। पर राम जी सारा पैसा हज़म नहीं करते थे। खाने-पीने के लिए जितना ज़रूरी होता उतना लेकर बाकी स्टेशन-मास्टर को लौटा देते। स्टेशन मास्टर इस चोरी के बारे में न जानता हो ऐसी बात नहीं। भला दाई से भी कहीं पेट छिपा है? और वह भी कब तक। मामला जब उठान पर आता है तो बिना पूछे ही मालूम होने लगता है।

रामजी सिंह जब स्टेशन पर न दीखते तभी लोगों को शक़ होना शुरू हो जाता। शाम के धुँधलके में जब बगल में लालपरी दबाए स्टेशन पहुँचते तो सब जान जाते। डींगे मारना तो कोई रामजी सिंह से सीखे। पर इसके लिए अनुकूल मौसम का होना ज़रूरी था। वह तब होता जब हलक तर हो। हलक तर होने के बाद जब रामजी सिंह नशे के घोड़े पर सवार होते तो सारा ख़लक़ ही उन्हें अपना गुलाम नज़र आता। जब तक हलक की नली से बोतल की राह उतर कर लालपरी उनके दिल पर क़ाबू-बेक़ाबू न हो जाती-रामजी सिंह अपने आप को इस स्टेशन का सब कुछ समझते थे - यही उनकी अहमियत के गुब्बारे के फूलने की सीमा थी। जब लालपरी बोलने लगती तो वे अपने आप को उत्तर-रेलवे के कण्ट्रोलर से कम नहीं समझते। आख़िर सारी उमर रेलों में बिना टिकट घूमते जो काटी थी। कहते हैं कि एक दिन नशे का घोड़ा सचमुच ही बेक़ाबू हो गया। स्टेशनमास्टर ने रामजी सिंह की जमकर पिटाई कर दी। रात भर नंग-धड़ंग पेट के बल गिरे प्लैटफार्म की धूल सूँघते रहे। स्टेशन की (चाय-पान-धोबी-मोची-नाई- सभी) दुकानवाले एक ही बात कहते हैं - रामजी सिंह ने उस रात प्लैटफार्म की धूल क्या सूँघी उनका तो काया-कल्प ही हो गया। इस गाँव की माटी में ज़रूर कुछ अजूबा है। अगर न होता तो रामजी जैसा पियक्कड़ शराब से तौबा कर विजयदास की मठिया पर रामजी दास बना हुआ धूनी क्यों रमा रहा होता। अब तो लोग-बाग सचमुच ही उन्हें साधु मानने लगे हैं। मैं रामजी सिंह से अलग-थलग ही रहा। एकाध बार लालपरी के लिए चन्द सिक्कों की टोह में मेरे यहाँ आए भी पर मैंने उन्हें सटने नहीं दिया। जब अपने बेटे को लेकर हम लोग गाँव लौटे थे तो रामजी फिर आए थे। मैंने कहा था-- खाने-पहनने के लिए पैसे माँगो तो कुछ दे सकता हूँ मगर ...। रामजी जैसे जानते हों कि इसके बाद मैं क्या कहनेवाला हूँ- बीच में ही उबल पड़े - अरे तो कौन बेटीचो... कोठी उठाने के लिए आप से कुछ माँग रहा है। नाराजी में रामजी चले गए अगर रहते तो शायद वह भी कुछ पा जाते। मैंने पीछे से बुलवाया भी पर वे नहीं आए - बोला था- अब तो कोठी उठानी हुई तभी माँगने आऊँगा। साधू बन जाने के बाद सचमुच एक बार रामजी फिर आए। बोले- इस बार शराब के लिए नहीं भगवान की कोठी के लिए पैसा चाहिए। हाँ, रामजी मठिया बनवा रहे थे। इस बार मैंने उन्हे भरपूर मदद दी। क्या अब भी आप मानने से इनकार करते हैं कि इस गाँव की माटी में कुछ अजूबा नहीं हैं।

प्राइमरी स्कूल में मेरे एक मास्टर थे भाट साहब- यहीं पास में मैरीटार के रहनेवाले। पढ़ाते थे हिन्दी, इतिहास और भूगोल। भाट साहब ठेठ देसी व्यक्तित्व वाले पैनेदार मास्टर थे। हर बात पर कोई न कोई कहावत लागू कर देना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल था। घर में दिया जलाने के बाद ही मस्जिद में दिया जलाया जाता है - यह एक कहावत तो उनकी क्लास में रोज़ ही कही जाती। इसी का परिणाम था कि भाट साहब जो भी पढ़ाते उसमें स्थानीय रंग ज़रूर होता। भाषा ऐसी बोलते जिसमें क्रिया तो हिन्दी की ही होती पर बाकी सब भोजपुरी में रँगा हुआ। कहते - हिन्दी सीखने से पहिले भोजपुरी सीखिए। बीछी का मन्तरे नहीं जानते अउर चले हैं साँप का बीलि में हाथ डालने। मुझे याद है कि कैसे भाट साहब हिन्दी शब्दों का सही प्रयोग और मतलब समझाने के लिए पहले उनके भोजपुरी रूप की चर्चा करते। चौहद्दी पूछने में उन्हें बड़ा मज़ा आता था। लीजिए सुनिए स्कूल की चौहद्दी- अरे! देस की चउहद्दी का नम्बर एतना जल्दी कइसे आ जाएगा साहब? हाँ तिरलोचन बबुआ, जरा बताइए तो इस्कूल का चारो तरफ क्या है? दक्खिन में खेत, खेत का बाद पक्की सड़क, उसका बाद रेलवे लाइन और तब फिर...। अच्छा आप थोड़ा आराम कीजिए। कुछ दूसरों के लिए भी तो छोड़िए। अरे सिसंकर जी, जरा आपो जागिए भाई! बताइए तो कि उत्तर में क्या है? जी, उत्तर में बाजार, बाजार में गदहा और फिर खेत। खेत का बाद गाँव। भाट साहब जैसे सोते से जाग उठे : ई आपने बाजार में गदहा खूब देखा। अबे गदहा तुम्हारा बाप है कि उसे चौहद्दी में रखना ही होगा। साले, पचास बार कहा कि कोई भी ऐसी चीज जो परमामिण्ट नहीं, चौहद्दी में नहीं जाएगी। लेकिन दिमाग तो साले बेच के खा गए हैं। बाप को देखते ही रेंकने लगते हैं। अउर अगर बाप को रखना ही था तो ईहो काहें नहीं बताया कि तुम्हारा बाप तीन टांगों पर खड़ा बीच-बाजार में मूत रहा था।

भाट साहब अब मेरी ओर मुखातिब होते- का हो पंडित कुलबोरन परसाद! ई पच्छिम ओर क्या है? जी, सड़क। स्पष्ट ही भाट साहब को इससे संतोष नहीं मिलता। पूछते - ई सड़क कहाँ से आती है अउर कहाँ जाती है - ई बताने के लिए क्या बनारस से लोग आएँगे? मैं बोलता- दक्खिन में पक्की सड़क तक और उत्तर में गाँव के बीचोंबीच होती नदी किनारे तक। नदी किनारे से क्या मतलब? गढ़ पर, मेरा संक्षिप्त सा जवाब होता। भाट साहब मुझे छोड़ देते और किसी दूसरे मुवक्किल की तलाश में लग जाते। विषय भी भूगोल से इतिहास में बदल जाताः कहो जी, लल्लू सींघ, ई जो गढ़ है ऊ गढ़ क्यों कहा जाता है? लल्लू सिंह अपनी नेकर ऊपर चढ़ाता, नाक सुड़कता और बताता- कांहें किं ईंहाँ गंढ़ रंहाँ। कब? ईं तों माँस्सांब माँलूंम नंहीं। मास्साब जांघ पर बैठी मक्खी पर किताब का एक भरपूर वार करते और फिर एक भरपूर चांटा लल्लू सिंह को। अब भाट साहब उसी की नकसुरी आवाज में बोलते - बंहुंत पंहंलें सांयंद हंजांर-दों हंजांर बंरिंस पंहिंलें। भाट साहब अब बड़े ही अच्छे मूड में आ जाते। इतिहास उनका प्रिय विषय था और लीक से हटकर चलना वे सायर, सिंह, और सपूत तीनों ही के लिए ज़रूरी समझते थे। लिहाजा गाँव का इतिहास पढ़ाते प्रागैतिहासिक काल से। मेरी और भाट साहब की कभी नहीं बनी। वे मुझे कुलबोरन कहते थे क्योंकि उनकी राय में मैं क्लास का सबसे बदमाश लड़का था। मुझे इस मूल्यांकन से कोई चिढ़ नहीं - बदमाश तो मैं था ही। मेरा और भाट साहब का विरोध तो इसी बात पर था कि क्लास में कोई भी गड़बड़ हो तो वे मुझे ही पकड़ते। चूँकि मैं उनकी निगाह में नेता था इसीलिए सबसे ज़्यादा छड़ियाँ मेरी ही पीठ पर टूटतीं। मैं भाट साहब से घृणा करता था और यही कारण है कि मैं उन्हें अक्सर ही परेशान करता। जब वे मुझे झेल पाने में असमर्थ हो गए तो उन्होंने अपना तबादला कहीं और करा लिया। पर यह क़िस्सा कभी बाद में। अभी तो बस इतना ही कि इस गाँव के इतिहास की बहुत सी जानकारी मुझे भाट साहब की क्लास से ही हासिल हुई।

गाँव की यह क्षुद्रनीरा नदी कभी गंगा थी। जो आज बस नाम भर का गढ़ है वहाँ सचमुच का गढ़ था - गढ़-छत्रप। यहाँ के राजे देव-द्विजपूजक, प्रजा-पालक और निराली शान-बान वाले हुआ करते थे। ब्राह्मण भी ऐसे जिनके तप-तेज के सामने सूरज भी संकुचित होने लगे, और जहाँ तक विद्या की बात है - लगता है सरस्वती एक बार यहाँ आई तो फिर वापस जाना ही भूल गई। पर ये बात और भी पहले की है। मेरी कथा आपको शायद उतनी दूर न ले जा सके। यह तो शुरू होती है किसी ऐसे काल से - किसी बहुत बाद के काल से - जब राजे तो नहीं रहे पर गढ़ अभी भी था और राजाओं के वंशज भी अपने आप में ठीक ही थे। मेरी कथा अक्सर सौ- सवा सौ सालों के काल-चक्र में ही घूमती है। जहाँ तक देश का सवाल है - रेलें आ चुकी थीं और भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम भी समाप्त हो चुका था। लगभग उसी काल से शुरू होकर मेरी कथा मौजूदा कल तक पहुँचती है। मुझे अफ़सोस है कि कथा पढ़ने के बाद आपकी प्रतिक्रिया शायद अच्छी न होगी। आप यही कहेंगे कि यह तो ऊँचाई से लगातार गिरते हुए किसी अभिशप्त गाँव की कथा है। आप यह भी कह सकते हैं कि यह कथा तो “हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी” जैसी लगती है। बात काफ़ी हद तक सही है। वैसे भी यह कलियुग है। इसका असर भी तो होना ही चाहिए। पहले और आज के लोगों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। आज गाँवों पर नागर सभ्यता बड़ी तेज़ी से हावी होती जा रही है। बात कह कर मुकर जाना फ़ैशन सा हो गया है। दिन में गाँव-घर की बेटी अपनी ही बहन-बेटी भले ही लग जाय रात में उसे खेतों में उड़ा ले जाने की हवस रखनेवाले कुछ ज़्यादा ही दीखने लगे हैं। तंग मोहरी की पतलून वाले लौण्डे दिखाते ऐसा हैं जैसे वे बुद्धि में आइंस्टाइन और बल में रुस्तमे हिन्द दारा सिंह के भी बाप हों। पर एक असली मौक़ा आ जाय तो ये कंकाल-काठी लौण्डे तंग पायंचों की राह हगते भी नज़र आएँगे।

ले-देकर गाँव अब गाँव नहीं रहा। मेरी समझ तो यह कहती है कि मेरा गाँव आज़ादी मिलने के दस-पन्द्रह सालों के भीतर ही मर गया। ऐसे मरने वाले गाँव और न हों ऐसी बात नहीं। पर बात तो मेरे गाँव की हो रही है। अब वे पुरानेवाले लोग भी नहीं रहे। जो गाँवों में रह रहे हैं वे यहाँ रहने के लिए विवश हैं। पहले झुलनी का धक्का लगने पर ही बालम कलकत्ता पहुँच पाता था। लौटकर आता था तो काला-सूखा चेहरा देखकर झुलनी वाली का जिया बेहाल हो जाता। क्यों न हो? आखिर गोरा बालम कलकत्ते के कल का पानी पीकर काला जो पड़ गया। नहीं, नहीं, रेल या जहाज़ दुश्मन नहीं। असली दुश्मन तो पैसा है। आज का बालम कलकत्ते पहुँचने के लिए झुलनी के धक्के का इंतज़ार नहीं करता। वह तो झुलनी वाली को भी साथ लेकर ही जाता है। यह झुलनी वाली की सेहत के लिए भी अच्छा है। सास के तानों से और परदेसी बालम की याद में बिसूरकर गाए जाने वाले बारहमासों से तो निजात मिली। अब पैसा ही सबसे बड़ा दोस्त है। गाँव में थोड़ा-बहुत पढ़े लड़के बेकारी में आवारागर्दी कर रहे हैं। जो पढ़-लिख नहीं सके वे खेती या गाँजे-भांग की तस्करी कर रहे हैं। बाक़ी के जवान या अधेड़ खेती या मज़दूरी कुछ न कुछ कर रहे हैं। जो बूढ़े हैं वह बीते कल का दिवा-स्वप्न जीते ज़िन्दगी की गाड़ी ठेले जा रहे हैं। जी हाँ, यहीं आकर यह गाँव ठहर गया है। वैसे कहने वाले यह कहते नहीं अघाते कि गाँव का कितना विकास हो गया है। यहाँ बिजली, सड़क, रेलवे स्टेशन, हाई-स्कूल, अस्पताल - न जाने क्या-क्या नहीं बन गया। अरे साहब, दुनिया मून पर चली गई और आप आज भी दकियानूसी से चिपके हुए हैं। ऐसी बातों पर रोना आता है - गाँव का विकास होना चाहिए पर उसकी आत्मा को मारकर नहीं। ख़ैर छो़इए, मैं भी कहाँ बहक गया। आप अब कथा की ओर चलें। लेकिन उसके पहले एक बात यह कि इस गाँव का बहुत सा इतिहास या भूगोल जो आप पढ़ेंगे भाट साहब का पढ़ाया हुआ है। किरपाल बाबा, तारा भाई, और दसईं बो का दाय भी मैंने स्वीकार ही किया है। लेकिन आप इससे यह न समझें कि मैंने अपनी कल्पना का उपयोग ही नहीं किया। जी हाँ, अधिकांश घटनाएँ सच हैं। बहुतों को मैंने कुछ तोड़ा-मरोड़ा भी है। कुछ मेरी कल्पना की उपज भी हैं। वैसे बहुतेरी मेरी अपनी आँखों के सामने से भी गुज़री हैं। कुल मिलाकर आप से एक ही अनुरोध है - आप उपन्यास पढ़ रहे हैं, उपन्यास पढ़ें। अगर इतिहास मिलता है तो उसे भी एक नज़र देख लें। बस सबूत न ढूँढ़ें। इसी में आपको ज़्यादा आनन्द भी मिलेगा।

और अब अन्त में-

*इस उपन्यास के लिए आवश्यक शोध सन् 1960-1965 के बीच किया गया। उस समय मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हिन्दी तथा भाषाविज्ञान का असिस्टेण्ट प्रोफेसर था। इसके कथानक की रूपरेखा लगभग उसी समय बन गई थी लेकिन लेखन बस शुरू ही हुआ था। तदनन्तर मेरे अमरीका प्रवास, अध्ययन और अध्यापन के दौरान अपेक्षित अथ च रेंगता- घसीटता यह उपन्यास अपनी समाप्ति के बहुत निकट अभी कुछ दिन पहले ही आ पाया है। शायद 2020 तक लेखन समाप्त हो जाय। अभी तो सबसे विकट काम इसके हस्तलेख को कम्प्यूटर पर लिखना है। पर अब मेरी गति बहुत अच्छी हो गई है और शास्त्रीय लेखन का जहाज़ 40 वर्षों के बाद उपलब्धियों के एक निश्चित गन्तव्य पर पहुँच गया है। यही वह समय है जब मेरे हिन्दी लेखन को प्रकाशन तक पहुँचाया जा सकता है। उपन्यास के पात्रों के नाम सभी अभी तक तो असली हैं लेकिन उपन्यास की प्रकाशन पाण्डुलिपि में अधिकांश शीघ्र ही बदल दिए जाएँगे।


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