अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.01.2017


अपनी बात

भाग - 1

वाराणसी और काशी! जी हाँ! एक ही शहर के दो नाम। यहीं से पूरब लगभग पचास कोस पर एक गाँव है - छाता। शायद बहुत-पहले छत्रपुर कहा जाता रहा हो। इस गाँव का एक और नाम भी है - लहुरी काशी। जी हाँ, अगर विश्वास न हो तो देखिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की पोथी "अशोक के फूल" को जिसके एक निबन्ध की शुरूआत ही होती है छाता उर्फ़ लहुरी काशी से। क़िस्सा-कोताह यह कि काशी की ही तरह इस गाँव में भी, पीढ़ी दर पीढ़ी कम से कम पाँच पीढि़यों तक, संस्कृत विद्या के पाण्डित्य की एक ऐसी पानीदार परम्परा रही है जिसका लोहा बड़े-बड़ों ने माना है। मेरे कुल के ही किरपाल बाबा, थे तो सनकी ही, पर अपने ब्राह्मण कुल के अतीत के बारे में जितना उन्हें मालूम था उतना शायद ही किसी और को मालूम हो। पाण्डित्य-परम्परा की धार, ब्राह्मणत्व का तप-तेज और अमरुक तथा वात्स्यायन का सुना-सुनाया ज्ञान जितना बाबा को था उतना शायद ही किसी और को हो। अमरुक और वात्स्यायन के मामले में तो बाबा चैलेंज के साथ बातें करते थे। उनका दावा था - सोलह के पार की कोई भी हो, दिखा भर दो सामने ही उसका बायस्कोप ख़ुलासा कर दूँगा।

किरपाल बाबा रिश्ते में मेरे बाबा लगते थे और इसीलिए मैं उनके आगे बहुत खुल भी नहीं पाता था। लेकिन बाबा सुर्ती खाते थे और उसके लिए उन्हें ज़रूरत होती थी पैसों की। घर से पैसे मिलने का सवाल ही नहीं उठता था। क्योंकि घरवाले उन्हें पहले ही पागल क़रार दे चुके थे - ई बुढ़वा बौराना! यहाँ इतना और बता दूँ कि बुढ़वा उमर के पच्चासी वसन्त पार कर चुका और मन से कभी-कभार भले ही चंगा न लगता हो तन से पूणर्तः स्वस्थ था। पैसे की ज़रूरत वाले किन्हीं ऐसे गाढ़े क्षणों में ही मैं बाबा के क़रीब आया। मुझे अपने गाँव और परिवार के बारे में जानना था और किरपाल बाबा को चाहिए था सुर्ती के लिए पैसा। यह सुर्ती ही हम लोगों को क़रीब लाई। जी हाँ, यह सुर्ती भी बड़ी ऊँची चीज़ है। बाबा इसकी प्रशंसा में सुनाते थे :

कृष्ण चले बैकुण्ठ को राधा पकड़ी बांहि।
इहाँ तमाखू खाइ लो उहाँ तमाखू नाहिं॥

तो ऐसा जस-परताप है सुर्ती का। बाबा कभी तरंग में होते तो इसे 'सुरतिय' कहते थे, और फिर इसके तथा भंग-भतार के बारे में कई चटपटे-चुटीले कवित्त सुना जाते। मै कभी-कभी उन्हें टोकता भी - ए बाबा, इस साली में बड़ी थुक्कम-फजीहत है। ऐसे ही मौक़ों पर बाबा का दाशर्निक जाग उठता : अरे जगजीतन! (बाबा मुझे प्यार में इसी नाम से पुकारते थे) बिना थुक्कम-फजीहत के ही चाहते हो कि बरम्ह-रन्धर में अमरित बरिसने लगे। ख़ैर, बाबा मुझे बहुत मानते थे, और मैं उनसे काफ़ी हद तक खुल भी चुका था। पर अमरुक और वात्स्यायन की बात उनसे कैसे करता? धीरे-धीरे यह समस्या भी हल हो गई। बाबा की एक कमज़ोरी यह थी कि वे अपनी बात को ही प्रमाण मानते थे। जी हाँ, बाबावाक्यं प्रमाणम्। पढ़े-लिखे तो थे नहीं। इसलिए उनका सारा ज्ञान सुना-सुनाया ही था। पर वे जो भी कहते साधिकार कहते। और जब कहते तो मजाल क्या कि कोई ज़रा भी शक़ कर ले। अगर ग़लती से कोई शक़ कर बैठे तो बाबा पहले उसकी सात पुश्तों की बखिया उधेड़ते और फिर सही-ग़लत सन्दर्भों और श्लोकों और विद्वानों का हवाला देकर यह साबित करने की भरपूर कोशिश करते कि जो वे कहते हैं वही सच है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जिन्हें वे डांकदर हजारीपरसाद दुवेदी कहा करते थे ऐसे उद्धृत होनेवाले विद्वानों के सिरमौर थे। द्विवेदीजी उनकी बहिन के देवर थे और बाबा उनके यहाँ कभी जब बनारस जाते तो द्विवेदी जी के पिता जी से मिलने ज़रूर जाते। मैं अनेक ऐसे अवसरों का साक्षी रहा हूँ जब द्विवेदी जी को, या कभी-कभी उनके पिता जी को, बाबा अपनी लोकप्रज्ञा का लोहा मनवाने के लिए जी-जान से कोशिश कर रहे होते थे। लेकिन मैं भी कहाँ भटक गया। चलिए वापस बाबा की ओर। मैं बाबा को छेड़ने के लिए बस इतना ही कहता कि फलां-फलां आपकी किसी बात पर विश्वास नहीं करते। लेकिन मैं सावधानी भी बरतता- मसलन कौन विश्वास नहीं करता - यह मैं उन्हें नहीं बताता। हाँ, किस चीज़ पर विश्वास नहीं - यह मैं उन्हें ज़रूर बता देता। मेरा काम इतने से ही बन जाता। बाबा की बात को प्रमाण न माननेवालों में आचार्य द्विवेदी का नाम भी मैंने एकाध-बार लिया, पर ऐसे मौक़ों पर बाबा पहले चौंकते, फिर हँसकर बोलते - जानते हो कि केतना मजाकिया हैं डांकदर हजारीपरसाद दुवेदी।

बाबा मेरे लिए एक खज़ाना साबित हुए। गाँव, घर, परिवार, और हाँ, इसी के साथ-साथ अमरुक तथा वात्स्यायन, के बारे में सही या ग़लत जो बाबा ने बताया वह कोई और नहीं बता सकता था। अगर बाबा अपनी ही बात को प्रमाण मानते हैं और चाहते हैं कि सभी ऐसा ही करें तो मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं नज़र आती। मैं बाबा को छेड़ने के लिए अक्सर कहता : बाबा, बात समझ में नहीं आती। कुछ ख़ुलासा कीजिए। या कभी-कभी यह भी - कि इस बात पर विश्वास नहीं होता। चूँकि मैं यह नहीं कहता कि आप सच नहीं कहते - इसलिए बाबा मुझ पर नाराज़ नहीं होते। बड़े आराम से समझाने की कोशिश करते कि कैसे वे जो कह रहे हैं वही सच है। इस प्रक्रिया में बाबा अपने तथा अमरुक-वात्स्यायन और दुनिया-जहान के बारे में क्या कुछ न बता जाते। यही तो मैं चाहता भी था। वैसे यह खेल काफ़ी ख़तरनाक भी था। बिना शंका किए बाबा बहुबाती नहीं होते थे और शंका उठाने में उनके ऊपर झूठ की तोहमत भी लग सकती थी। बाबा सच कहते थे और डंके की चोट कहते थे। उन्हीं के शब्दों में- कौन साला कह सकता है कि काना दोनों आँखों से देखता है।

मैं आपको यह बता ही चुका हूँ कि कैसे बाबा झूठ का इलज़ाम लगानेवालों का एक भी करम बाक़ी नहीं छोड़ते थे। अगर ग़ुस्सा सिर के ऊपर निकल गया तो बाबा इलज़ाम लगानेवाले की असलियत को भी चैलेंज कर डालते ¬- अरे, वह बूँद भी बेकार गई जिसने तुम्हें इस धरती पर उतारा। बाबा इस पर संस्कृत की मुहर भी चस्पां कर देते - जैसे रही-सही कमी भी पूरी कर रहे हों - येन बिन्दुना निपातितोऽसि तस्याऽपि वैयर्थ्यम्। धन्य हो बाबा। मेरी टेक्नीक काम कर रही थी। मैं तो बाबा से बार-बार कहता था - को नहिं जानत है जग में कपि संकट-मोचन नाम तिहारो। ऐसी बात नहीं कि मैं बाबा पर प्रहार नहीं करता था। पर मैं सीधे गोली नहीं दागता था। जब भी बाबा का ज्ञानगुमान अपनी गुरडमी काया में सिमटने को होता मैं उसके ऊपर अपनी शंकाओं के कीड़े छोड़ देता। नतीजतन बाबा अपनी बात मनवाने के लिए धरती-आकाश नापने लगते और मैं ऐसे अनगिनती क़िस्से पा जाता जो शायद हमेशा-हमेशा के लिए खो जाते।

मगर बाबा की बुझौवल बुझाने की आदत कभी-कभी बहुत दुखी कर देती। अब यही देखिए - एक बार मैं और बाबा सुबह हवाखोरी पर निकले। गाँव के बाहर आते ही बाबा चहक उठेः अरे जगजीतन जी, कुछ ईहाँ सभ के बारे में भी बताइए। हमारे आगे दो अहीरिनें जा रही थीं। एक के सिर पर दूध से भरे दो मटके थे। दूसरी का अकेला मटका कमर पर था। सिर पर उसने बेठन भर रख छोड़ा था। अब आप ही बताइए इनके बारे में क्या बताया जा सकता था। मैंने इतना ही कहा - अहीरिनें हैं; दूध बेचने जा रही हैं। बाबा ने चुटकी ली - आपका आंख अउर आलू में कवनों फरक नहीं। जरा देखिए तो ई सभ दूध कहाँ रखी हैं। "एक ने सिर पर रखा है और दूसरी ने कमर पर" मैंने कुछ ऊबते हुए कहा। बाबा ने जैसे नहले पर दहला दे मारा हो - क्यों? मैंने झुंझलाते हुए कहा - अब यह तो आप ही बताइए बाबा। बाबा जैसे अपना ज्ञान-गूदड़ खोलते हुए बोले- एक का कपार पर कोई चिन्ता नहीं है बच्चा। इसीलिए वह दो-दो घड़े सिर पर रखे बछेड़ी जैसी कदमताल मार रही है। दूसरी का कपार इस समय बहुत किचाइन में है इसीलिए तो वह बेठन भर ही ढो पा रही है। बात कुछ जमी नहीं तो मैंने पूछा - बाबा, इसका कपार किस किचाइन में है? जवाब में बाबा ने मेरी पीठ पर एक हलकी चपत मारी और बोले- डुबकी लगाओ बच्चा। जे डूबे से पा लिए कहते दास कबीर... मेरी नहीं मानो, बनारस जाना तो डांगदर हजारी परसाद से पूछना।

बाबा से ही सुना था कि मेरे एक पुरखे थे आचार्य चित्रधर। उनका तेज ऐसा था कि नहाने के बाद आकाश में धोती उछाल देते और बेचारे सूरज और हवा उसे सुखाते घूमते। आचार्य चित्रधर के ही पुत्र थे आचार्य राम - व्याकरण के अपर पतञ्जलि। रहते थे यहीं लहुरी काशी में - लेकिन यश दिगंतव्यापी था। तब यहाँ कपास की खेती होती थी। पण्डित राम की जीविका थी खेती और जजमानी। उनका व्यसन था व्याकरण का मनन और अध्यापन। बाबा बताते हैं कि एक बार बंगाल का एक वैयाकरण सांड़ हुंकार भरता, पूरब के सभी वैयाकरण-मल्लों को पटखनियाँ देता, अपनी यशःपताका काशी में फहराने चला जा रहा था। यहाँ से गुज़रने लगा तो किसी ने टोक दिया - पहिले लहुरी काशी तो फतह कर लो। अता-पता लेकर बंगाली पण्डित आ पहुँचा पण्डित राम के घर। मालूम हुआ - पण्डित जी तो कपास लोढ़ने के लिए खेत पर गए हैं। बंगाली हैरत में - पण्डित कपास लोढ़ रहा है? पर करता क्या। चल पड़ा खेतों की ओर। रास्ते में एक निहायत सीधे से दिखनेवाले किसान को सिर पर कपास का बोझा लिए गाँव की ओर आते देखा तो पूछा - मैं पण्डित राम से मिलना चाहता हूँ। क्या आप बता सकते हैं वे कहाँ मिलेंगे? किसान ने क्षण भर की चुप्पी के बाद कहा - आप मेरे साथ आइए। मैं आप को उनसे मिलवा दूँगा। जब बंगाली चलते-चलते फिर वहीं पहुँचा - जहाँ से चला था तो खीझ उठा - कहाँ हैं पण्डित राम? किसान ने सिर का बोझ पटका और बंगाली पण्डित की अगवानी की - आइए, मै ही राम हूँ। क्या सेवा करूँ? बंगाली चौंका, फिर सम्हला - मगर विस्मय की एक हलकी सी परत तो उसके चेहरे पर चढ़ ही गई थी। बड़े यत्न से बस इतना ही बोल पाया - मैं आपसे शास्त्रार्थ करना चाहता हूँ।

किरपाल बाबा के अनुसार पण्डित राम ने बंगाली को ऐसा चित्त किया कि वह चेला बनकर यहीं रह गया। तो ऐसा है परताप लहुरी काशी का। कि यहाँ तो भास (पतञ्जलिकृत व्याकरण - महाभाष्य ) भी कपास लोढ़ता है। जानते हैं इस भास-कपास शौर्य-गाथा में शास्त्रार्थ का विषय क्या था - विष खाते ही कारक (असरदार) होते हैं। बाबा का भण्डार अक्षय था। पर जीवन ने उन्हें औरों की तुलना में कहीं अधिक विष दे रखा था। इसीलिए वह असरदार भी हुआ। बाबा अपनी असली उमर से कुछ साल पहले ही मर गए। लेकिन मेरी फ़ाइलों में वे आज भी जीवित हैं। जी हाँ, उनके सारे संस्मरणों को मैंने लिख रखा है। यह दूसरी बात है कि उनके बहुतेरे सुभाषित अभी भी कूट-काव्य की पंक्ति बने मुझे कोंचते रहते हैं। उदाहरण के लिए पण्डित राम और बंगाली बाबू के शास्त्रार्थ के विषय को ही लीजिए। व्याकरण का शास्त्रार्थ और विषय- विष खाते ही....। अब बूझते रहिए पहेली। इस पंक्ति का सही मतलब मुझे किरपाल बाबा के मरने के बहुत बाद समझ में आया। बाबा से बीसियों बार पूछा होगा - बाबा, इसका मतलब क्या है? हर बार एक ही जवाब - डुबकी लगाओ बच्चा! आज पाणिनीय व्याकरण की गहराइयों में डुबकी लगा कर ही समझ पाया हूँ कि जो बाबा कहते थे वह सचमुच था- विवक्षातः कारकाणि भवन्ति (कारक बोलनेवाले की इच्छा के अधीन होते हैं)। अब 'विवक्षातः' कैसे 'विष खाते ही' में बदल गया यह बात तो बाबा बता सकते हैं। शायद द्विवेदी जी से पूछा होता तो भी पता चल जाता। बाबा ने तो कहा भी था और पचीसों बार पर पंडितजी से मिला हूँगा पर मैं पूछ नहीं पाया। ऐसा नहीं है कि द्विवेदीजी से किरपाल बाबा के बारे में मैंने कभी बात न की हो। कई बार बातें हुईं उनको लेकर। द्विवेदीजी कहते भी थे - अधिकतर विद्वान वेद ही जानते हैं पर तुम्हारे किरपाल बाबा वेद और लबेद दोनों के पण्डित हैं। लबेद तो द्विवेदी जी भी जानते थे। बकौल किरपाल बाबा के, मेरे गाँव की क्षुद्र-नीरा नदी के किनारे बैठ अपने बचपन के दिनों में उन्होंने भी लबेदी मकड़जाल के कुछ ताने-बाने ज़रूर ही बुने होंगे।

एक बार बाबा द्विवेदी जी से मिलने गए तो देखा कुछ लिख रहे थे। जिज्ञासावश पूछ बैठे - का लिख रहे हैं। उत्तर में द्विवेदी जी बोले - कुछ नहीं, ईहे नउनियाँ के बारे में लिख रहे हैं। बाबा ने ही बाद में बताया था कि दुबेदी जी आज कल नउनियाँ के बारे में लिख रहे हैं। वताओ अब ईहे लिखने को रह गया है। वाह रे बाबा, तुम्हारा लोहा तो डांकदर हजारीपरसाद दुवेदी भी मानते थे। मुझे भी बहुत बाद में पता चला कि जिसे बाबा नउनियाँ समझ रहे थे वह (चारुचन्द्र लेख की) निउनियाँ या निपुणिका थी। बहुत बाद में जब वे हिन्दू विश्वविद्यालय में रेक्टर थे तो अमरीका से बनारस आने पर मिलने गया, उन्होंने मुझी से पूछा था - पाणिनीय व्याकरण के पण्डित हो बताओ, पाणिनि चाय पीते थे। मेरे नहीं कहने पर बोले - फिर उन्होंने अपना चायःकी का सूत्र वचन क्यों बोला। फिर दूसरा- पाणिनि ईसा के बाद हुए। मेरे नहीं कहने पर बोले -- तो अभ्यासे चर्च क्यों बोले। द्विवेदी जी के अनगिनती बेदों-लबेदों के बहुतेरे संस्मरण हैं जो कभी बाद में।

बहरहाल, मैं अपनी उन्हीं पुरानी फाइलों में डुबकी लगा रहा हूँ। इनमें कथाओं और संस्मरणों के ऐसे ताने-बाने हैं जिनको आधार मानकर कई उपन्यास लिखे जा सकते हैं। मैंने इसी ललक में इन्हें लिपिबद्ध भी किया था। एक उपन्यास बहुत पहले शुरू किया था जो अधूरा ही रह गया। बाद में किसी परचूनिए की भेंट चढ़ा या चूल्हे की - पता नहीं चला। सौभाग्य यही है कि मैंने इन फ़ाइलों को बड़े ही जतन से रखा है। विदेश में जब भी जी उचाट हुआ, या गाँव की याद ने कचोटा, इन फ़ाइलों ने बड़ा सुकून दिया है।

- क्रमशः


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें