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07.02.2007
 

मकड़ी का जाला
डॉ. राम प्रकाश सक्सेना


मेडिकल कॉलेज के वार्ड नं. ३ के बेड नं. २८ के मरीज ने नर्स से कहा कि उसके बेड पर जो रॉड लगा है, उस पर मकड़ी का जाला लटक रहा है। उसे हटा दीजिए। नर्स ने उत्तर दिया कि बेड की सफाई की ज़िम्मेदारी मेरी है। मकड़ी के जाले को हटाने का काम स्वीपर का है। जब वह आए, तब उससे कहिए।

यह मरीज कोई और नहीं, दुर्भाग्य से स्वयं लेखक ही था, जिसे सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस के कारण चौबीसों घंटो के ट्रेक्शकन पर रखा गया था। इसमें हिलने-डुलने की सख्त मनाही थी। बेबसी की इस हालत में मैं इंतज़ार करने लगा कि कब स्वीपर आये। दो-तीन घंटों के बाद एक खुशनुमा नौजवान हाथ में झाड़ू लिये रूम में आया। मैंने उससे कहा, “स्वीपर जी। जरा मकड़ी का जाला हटा दो।”

उस नौजवान ने बिगड़ते हुए कहा, “मै स्वीपर नहीं, फर्राश हूँ। मेरा काम फर्श की सफाई करना है। अगर फर्श पर जाला हो, तो साफ कर दूँ।”

अब मैं स्वीपर के आगमन की प्रतीक्षा उसी आतुरता से करने लगा, जिस प्रकार एक प्रेमी अपनी प्रेमिका का करता है। आधे घंटे के बाद एक व्यक्ति आया, जो स्वीपर जैसा लग रहा था। मैंने उसे स्वीपर कहकर संबोधित किया। उसने नाराज होकर कहा, “मैं क्या तुम्हें स्वीपर दिखाई देता हूँ ? मैं तो यहाँ का अटेंडेंट हूँ।”

मैंने झट माफी माँग ली। मैं इतना डर गया कि उधर आते-जाते किसी भी व्यक्ति से मैंने स्वीपर का नाम नहीं लिया। थोड़ी देर के बाद एक व्यक्ति मेरे पास आया और कहने लगा, “मैं यहाँ का स्वीपर हूँ। आपसे पहले इस बेड पर जो साहब थे, वे बहुत भले आदमी थे। जाते समय इनाम में पाँच रुपये दे गये थे। मेरे लायक कोई सेवा हो, तो बता देना।” मैंने पिछले अनुभवों के आधार पर सहमते हुए कहा, “भैया ! जरा इस मकड़ी के जाले को साफ कर दो।”

स्वीपर ने गुंड्याई आवाज में कहा, “मेरा काम मकड़ी का जाला साफ करना नहीं।” मैं फिर घबड़ा गया। स्वीपर जाते-जाते मेरे ऊपर दया करते हुए यह सलाह दे गया, “थोड़ी देर में बड़ी सिस्टर राउंड पर आयेंगी। वह ही वार्ड की ओवरऑल इंचार्ज हैं। आप उनसे कहना !”

शिकायत के इसी क्रम में सारा दिन निकल गया। पर कहीं कोई आसार नजर नहीं आ रहा था। शाम होने लगी। रात आ गई पर जाला छुटाने कोई न आया।

दूसरे दिन भी कुछ न हुआ। इत्तिफाक से उसी दिन शाम को मेरे एक पत्रकार मित्र मुझसे मिलने आये। मैंने उनको यह सब हाल बताया। इसके दूसरे दिन शहर के लगभग सभी दैनिक पत्रों में यह ख़बर छपी। एक अख़बार ने तो सम्पादकीय ही छाप डाला। उसमें उन्होंने लिखा, “हमारे प्रजान्त्र की नौकरशाही में मकड़ी का जाला लग गया है।”

उक्त समाचार पूरे मेडिकल कॉलेज में फैल गया। फलस्वरूप सुपरिंटेंडेंट को एक इमरजेंसी मीटिंग बुलानी पड़ी, जिसमें इस प्रश्न पर गम्भीरता से विचार किया गया। जब सुपरिंटेंडेंट ने वार्ड नं. ३ के हाउससर्जन को ज़िम्मेदार ठहराना चाहा, तब उसने सफाई में कहा, “सर, यह बेड हमारे यूनिट का नहीं हैं।”

इस बात पर मीटिंग में तू-तू मैं-मैं हो गई। अतः यह सभा शीघ्र ही समाप्त करनी पड़ी। चूंकि यह राजधानी का मेडिकल कॉलेज था, इसलिए यह सम्पूर्ण राज्य में चर्चा का विषय बन गया। एक विरोधी पक्ष के सदस्य ने इसका फायदा उठाया। उसने विधानसभा में इस घटना पर स्वास्थ्य मंत्री से वक्तव्य देने को कहा। मंत्री महोदय ने बताया कि वे शीघ्र ही मेडिकल कॉलेज का दौरा करेंगे और इस सम्बन्ध में अपना वक्तव्य देंगे।

समाचार-पत्रों में जब यह खबर छपी, तब सुपरिंटेंडेंट महोदय को पुनः इस घटना पर विचार करने के लिए मीटिंग बुलानी पड़ी। मीटिंग में सुपरिंटेंडेंट ने इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त की और लोगों से सुझाव माँगे। काफी विचार-विमर्श के बाद भी जब कोई नतीजा नजर नहीं आया, तब सुपरिंटेंडेंट महोदय ने खीज कर कहा, “मकड़ी का जाला मैं ही हटा दूँगा।”

इस बात पर सुपरिटेंडेंट के एक चमचे को बहुत बुरा लगा और उसने कहा, “सर आप चिंता न करें, मकड़ी का जाला मैं हटा दूँगा। “इस कथन पर एक नर्स ने, जिसका रिकार्ड बहुत खराब था और जिसका प्रमोशन ड्यू था, यह सोचा कि ऐसा अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। ऐसा विचार मन में आते ही उस नर्स ने मधुर स्वर में घोषणा की, “आप डॉक्टरों को यह शोभा नहीं देता। इस कार्य को करने के लिए आप मुझे अवसर दीजिए। यदि आप आज्ञा दें, तो मैं अभी यह कार्य करके आती हूँ।”

एक जूनियर डॉक्टर ने, जो उस सुन्दर नर्स पर मरता था, सोचा कि क्यूँ न इस अवसर का लाभ उठाया जाए। अतः उसने सुपरिंटडेंट से कहा, “सर, आप इनको तकलीफ मत दीजिए। यह काम मैं कर दूँगा।” सुपरिंटेंडेंट उस जूनियर डॉक्टर के मन की बात को भाँप गया, इसलिए उसने इस विचार से कि यहाँ डॉक्टर की दाल न गलने दी जाए, यह निर्णय लिया- “क्यूँकि इस काम को करने की पहल सिस्टर निर्मल ने की है, अतः यह अवसर उन्हीं को प्रदान किया जाए।” सुपरिटेंडेंट का अंतिम वाक्य समाप्त होते ही नर्स मीटिंग से उठ ली और वार्ड नं. ३ की और चल दी। यह दृश्य देखकर लोग हक्के-बक्के रह गए और नर्स के पीछे चल दिए।”

जब यह मीटिंग चल रही थी, उसी समय वार्ड नं. ३ के बेड नं. २८ के मरीज यानी मुझको मकड़ी का जाला हटाने की एक नई योजना सूझी। मैंने फर्राश से कहा, “मकड़ी का जाला कई दिनों से लगा हैं। मैं तुम्ह दो रुपये दूँगा। तुम्ही हटा दो।”

इतना सुनते ही फर्राश की बाछें खिल गई। उसने जैसे ही मकड़ी का जाला हटाने को हाथ बढ़ाया, पीछे से स्वीपर ने, जो दो रुपये की बात सुन चुका था, फर्राश को धक्का दिया और बोला, “साले, दो रुपये का लालच करता है। चल हट, यह काम मैं अकेला कर देता हूँ।” इस बात पर दोनों में गुत्थम-गुत्था हो गई। इसका लाभ उठाते हुए पास में खड़े अटंडेंट ने मरीज से कहा, “साहब! ये दोनों साले बदमाश हैं। आप मुझे एक रुपया दे देना।” इतना कहकर उसने जाला छुटा दिया।

वार्ड में जब यह हंगामा हो रहा था, तभी वहाँ नर्स, सुपरिंटंडेट व अन्य डॉक्टरों ने भी प्रवेश किया। सुपरिंटेंडट ने समझा-बुझा कर इस हंगामे को शांत किया।

वार्ड में हुए गुत्थम-गुत्था जैसी अनियमितताओं के विरुद्ध कार्रवाई करने हेतु सुपरिटेंडेंट ने पुनः मीटिंग बुलाई। जब यह मीटिंग चल रही थी, तभी सुपरिंटेंडट को स्वास्थ-मंत्री के सचिव का फोन मिला। फोन पर सचिव ने बताया, “अभी-अभी मंत्री महोदय ने नगर के पत्रकारों के समक्ष यह घोषणा की है कि वह कल अस्पताल का दौरा करेंगे और इस गाँधी सप्ताह में सफाई-अभियान के अंतर्गत मकड़ी का जाला वह स्वयं साफ करेंगे। मंत्री महोदय के साथ कुछ पत्रकार तथा फोटोग्राफर भी होंगे। आप मकड़ी का जाला ज्यों का त्यों लगा रहने दीजिए। बाकी अस्पताल की अच्छी साफ-सफाई करा दीजिए। बीस-पच्चीस लोगों के नाश्ते-पानी का भी प्रबन्ध अस्पताल में करा दीजिए।”

जब सुपरिंटेंडेंट ने सचिव का यह कथन मीटिंग में सुनाया तब यह चिंता होने लगी कि मकड़ी का जाला तो पहले ही हटा दिया गया है, फिर मंत्री महोदय क्या हटाएँगे ?

इस पर सुपरिंटेंडेंट के चेले ने सुझाव दिया, “सर, आप चिंता क्यों करते हैं। अपने मेडिकल कॉलेज में बहुत मकड़ी के जाले हैं। जिस अटेंडेंट ने मकड़ी का जाला हटाया है, उसे आदेश दिया जाए कि वह मकड़ी का जाला फिर उसी स्थान पर लगा दे।” इस सुझाव पर सभी ने एक मत से समर्थन किया। अटेंडेंट के द्वारा मकड़ी का जाला उसी स्थान पर पुनः लगा दिया गया।

रात भर मकड़ी का जाला अपने भाग्य को सराहता हुआ मंत्री महोदय के कर-कमलों का इंतजार करता रहा और नासमझी का उपहास भी।

दूसरे दिन प्रातः मंत्री महोदय के आगमन की सभी तैयारियाँ मेडिकल कॉलेज में कर ली गईं। ऐन मौके पर सुपरिंटेंडेंट साहब को मंत्री महोदय के सचिव द्वारा फोन पर यह सूचना मिली, “खेद है कि मंत्री महोदय आज न आ सकेंगे। उनके चुनाव क्षेत्र में सूखा-ग्रस्त इलाके का दौरा करने हेलिकॉप्टर से मुख्यमंत्री आ रहे है। अतः मंत्री महोदय भी उनके साथ दौरे पर रहेंगे।”

मंत्री महोदय के अगले दौरे का इंतजार करता हुआ, मकड़ी का जाला जहाँ था, वहीं है।


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