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ISSN 2292-9754

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05.31.2017


मुझको प्यार तुमसे है

प्यार की परिभाषा बहुत कठिन है। क्योंकि प्यार आदिकाल से चला आ रहा है और सभी ने इसकी अलग-अलग परिभाषा दी है। सबने इसे अपने अपने हिसाब से समझा और समझाया है। सभी अपने अपने अनुभव के अनुसार प्यार की व्याख्या करते हैं। आधे अक्षर से शुरू होने वाले इस शब्द में सारी दुनिया समाई हुई है। प्यार शाश्वत है। जब से यह दुनिया बनी है प्यार चलता आ रहा है। जब तक यह दुनिया रहेगी प्यार क़ायम रहेगा। इसका कोई अंत नहीं है। हाँ प्यार के इज़हार करने का ढंग बदलता रहा है। प्यार को जताने के तरीक़ों में फ़र्क होता रहा है। समय और परिस्थितियों के अनुसार "आई लव यू" कहने के तरीक़े बदलते रहे हैं। लेकिन प्यार आज भी क़ायम है। फिर भी प्यार को इस समाज ने कभी मान्यता नहीं दी। शायद इसीलिए लोग प्यार चोरी चोरी ही करते हैं। प्यार तो सभी करते हैं परंतु वही प्यार जब कोई दूसरा करता है तो उसका विरोध होता है। चारों तरफ थू-थू होने लगती है। लोग इसके अंजाम से डरने लगते हैं। तभी किसी ने कहा है -

मद भरे जाम से डर लगता है,
प्यार के नाम से डर लगता है।
जिस का आगाज़ चोरी-चोरी हो,
उसके अंजाम से डर लगता है।!

दुनिया में शायद ही कोई शख़्स ऐसा होगा जो प्यार के एहसास से अछूता होगा। प्यार, चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो, एक ऐसा सुखद एहसास देता है जिसे शब्दों में बयान कर पाना बहुत कठिन है। जब प्यार होता है तो बस प्यार ही होता है। प्रेम में आकंठ डूबे हुए लोगों के चेहरे पर ख़ुदाई नूर आ जाता है। फिर वो प्रेमी "जब प्यार किया तो डरना क्या" की भाषा बोलने लग जाते हैं। उनके लिए प्यार ख़ुदा बन जाता है। प्यार इबादत हो जाती है। "इश्क़ में जीना इश्क़ में मरना और हमें अब करना क्या" ही उनकी दिनचर्या बन जाती है। फिर रूठने मनाने का सिलसिला शुरू होता है। रूठने का भी एक अलग ही मज़ा होता है। प्रियतम के मनाने से, उसके मनाने के ढंग से पता चलता है कि वो अपने साथी को कितना प्यार करता है। इसीलिए बार-बार रूठने को मन करता है। आप भी देखिए -

सोई यादों को जगाये कोई,
दिल में फिर आग लगाये कोई।
जाने क्यों आज यह जी करता है,
रूठ जाऊँ तो मनाये कोई।!

लेकिन इसका दूसरा रूप भी है। रूठना इतना आसान नहीं है। रूठने के लिए भी कोई अधिकार होना चाहिए। रोने के लिए कोई कंधा होना चाहिए। बिना अधिकार के आप रूठ जायेंगे तो आपको मनाने कोई नहीं आयगा। यदि आपको किसी के आने की आस भी हो तो रूठने के लिए दिल भी तो होना चाहिए। इसीलिए किसी ने कहा है -

हम रूठें तो किसके भरोसे रूठें?
कौन है जो आयेगा हमें मनाने के लिए?
हो सकता है तरस आ भी जाये आपको,
पर दिल कहाँ से लायें आपसे रूठ जाने के लिये?

दुनिया की एक सम्पर्क भाषा है उसे "एसपरेंटों" कहते हैं। परंतु उस भाषा को विश्व में लगभग 100 व्यक्ति ही जानते हैं। परंतु प्यार की एक ही भाषा है जिसे दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति जानता है। इस भाषा को सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। इस भाषा को पढ़ाने के लिए कोई स्कूल कोई पाठशाला नहीं है। यह स्वाभाविक है। सबके दिलों में बसा हुआ है। प्यार में ज़बरदस्ती नहीं चल सकती। किसी को प्यार करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। प्यार हो जाता है। प्यार अपने आप होता है। इसीलिए प्रेमी प्यार में सब कुछ न्यौछावर करने को तत्पर रहता है। प्रेम में सब कुछ खो देना ही सब कुछ पाना है। प्यार में खो जाने के बाद फिर सब कुछ उल्टा होने लगता है। दिल बैचैन रहने लगता है। और लोग कहने लग जाते हैं कि -

जब से दिल से दिल लगा है दिल नहीं लगता।

दिल लगने के बाद प्यार के ढंग निराले हो जाते हैं। कहा भी है –

मकतबे इश्क़ का ढंग निराला देखा,
उसको छुट्टी न मिली जिसने सबक याद किया।

इसी बात को एक दूसरे कवि ने कुछ इस प्रकार कहा है –

ख़ुशी जिसने खोजी वो धन ले के लौटा,
हँसी जिसने खोजी चमन ले के लौटा।
मगर प्यार को खोजने चला जो वो,
न तन ले के लौटा न मन ले के लौटा ।!

मुंशी प्रेम चंद ने कहा है कि "जिस मनुष्य के हृदय से प्रेम निकल गया वह अस्थि-चर्म का एक ढेर रह जाता है।" सच्चा प्रेम नाप तौल नहीं करता। यह सिर्फ देता जाता है। जब किसी से प्यार हो जाता है तो वो ही सबसे अच्छा लगने लग जाता है। कोई भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। प्रेमी को अपने प्रिय में ही सारा संसार नज़र आता है उसे और कोई इतना प्यारा नहीं लगता। और वो कहने लगता है -

ज़िन्दगी की बहार तुमसे है,
मेरे दिल का क़रार तुमसे है।
यूँ तो दुनिया में लाखों हैं हसीं,
मगर क्या करूँ मुझको प्यार तुमसे है।

प्रेम अन्धा होता है। इसी लिए वह स्पर्श से ही आगे बढता है। कहते हैं कि नारी का शरीर ब्याज होता है। प्रेम की पूँजी तभी सार्थक है कि ब्याज मिलता रहे। लेकिन प्रेम भी ख़तरों का छत्ता होता है। उसमें से शहद तो भाग्यवानों को ही मिलता है। अधिकांश का तो बर्रों से ही पाला पडता है। जिनको प्यार नहीं मिल पाता या जिनके सजना दूर चले जाते हैं उनके लिए समय काटना भी मुश्किल हो जाता है। प्रेमी के दूर जाने पर प्रेमिका का सजने-सँवरने का मन भी नहीं करता। उसका हार-शृंगार सब धरा का धरा रह जाता है। पंजाबी के गायक गुरदास मान ने पंजाबी में इस व्यथा को कुछ इस प्रकार कहा है –

टंग्गे रहदें किल्ली दे नाल परांदे,
जिन्ना दे राती यार बिछुडे।

अर्थात जिनके साजन बिछुड जाते हैं, और जो रात को अकेले ही सोने के लिए मजबूर होते हैं उनके परांदे, उनकी चोटियाँ खूँटी के साथ ही टँगी रह जाती हैं। उनके मेकअप का सामान उनके डिब्बों में ही बंद हो कर रह जाता है। उनके कपड़े अलमारियों में ही पड़े रह जाते हैं। क्योंकि उनके सजने सँवरने की इच्छा ही मर जाती है। सजना के लिए सजने वालियाँ अब किसके लिए सजें? इस बिछुड़न को एक प्रेमिका इस प्रकार व्यक्त करती है -

अब हम बिछुड़े तो शायद ख़्वाबों मे मिलें,
जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।

यह ठीक है कि सूखे हुए फूलों की कोमलता समाप्त हो जाती है। उनकी अपनी ख़ुशबू ख़त्म हो जाती है। लेकिन उन यादों की, एक साथ बिताए पलों की महक हमेशा हमेशा बनी रहती है। और प्रेमी सारा जीवन उन्हीं यादों के सहारे बिता देते हैं। लेकिन आजकल बेवफ़ाई के क़िस्से आम हो गए हैं। जीवन भर साथ निभाने का वादा करने वाले समय की धार देखकर बदल जाते हैं। लोग पहले से ज़्यादा समझदार हो गए हैं। उनका कहना हैं -

मैंने प्यार किया बड़े होश के साथ।
मैंने प्यार किया बड़े जोश के साथ।
पर हम अब प्यार करेंगे बड़ी सोच के साथ।
क्योंकि कल उसे देखा मैंने किसी और के साथ।

बात परिभाषा से शुरू हुई थी। मेरा मानना है कि प्यार को किसी एक परिभाषा में बाँधना कठिन है। हरि कथा कि तरह प्यार की परिभाषायें भी अनन्त हैं। प्यार तो बहता हुआ एक सागर है। जिसके बहने में ही प्यार की महत्ता है, सुंदरता है, प्राण हैं, जीवन है।


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