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ISSN 2292-9754

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03.30.2017


आँख नहीं लगती

पंजाबी में "आखना" शब्द का अर्थ होता है कहना। इसके अनुसार जो कुछ भी हृदय का भाव होता है उसे कह देने वाले को "आँख" कहते हैं। आँख को चख, नयन, लोचन, नेत्र, नज़र आदि कई नामों से पुकारा जाता है। इसको चख कहने का भी एक कारण है –

अब मान लीजिए आपके सामने रसगुल्ले, गुलाब-जामुन, बर्फी, समोसे, पकौड़े आदि-आदि रखे हुए हैं। रसगुल्ले को देखते ही आपके मुँह में पानी आ जाता है। आप चम्मच को उठाने में भी अपना समय गँवाना नहीं चाहते। अंगूठे और तर्जनी की सहायता से एक रसगुल्ला उठा कर, उसके रस से अपने कपड़ों को बचाते हुए, थोड़ा-सा आगे की ओर झुक कर, झट से पूरा का पूरा रसगुल्ला मुँह में गड़प कर जाते हैं। और मुँह को गोल-मटोल करके अपने चेहरे के लगभग 35-36 कोण बनाकर रसगुल्ला खाते हुए कह देते हैं- "यह तो बहुत ही मीठा है।"

उसी प्रकार से समोसे आदि में भी नमक मिर्च की कम या अधिक मात्रा का ज्ञान आप उसे मुँह से चखकर कर सकते हैं। परंतु यदि कोई सौंदर्य प्रतियोगिता हो रही हो और आपको सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी का चयन करने के लिए कह दिया जाय तो आप उसके सौन्दर्य का स्वाद मुँह से चखकर तो नहीं बता पायेंगें। यदि ऐसा सम्भव होता तो लोग सौन्दर्य प्रतियोगितायों में चार-चार किलो के डालडा के खाली डिब्बे ले जाते और खुरजा के खुरचन की तरह अच्छे से अच्छा अपना मनपसन्द सौन्दर्य उसमें भर लाते और डिब्बा बन्द करके घर के एक कोने में रख देते। बस, जब तबियत मचलती एक चम्मच निकालते और मुँह मे रख लेते। परंतु सौन्दर्य का स्वाद मुँह से नहीं, आँख से ही चखा जा सकता है। इसी कारण लोग इसे "चख" (चखने वाला) कहने लगे।

नयन से तात्पर्य है "नय नहीं" अर्थात जिसमें "नय-नीति-न्याय" न हो। नयन में नीति नहीं होती। या यूँ कह लीजिए कि आँख नीति से काम नहीं लेती। जो कुछ भी ग़लत-सही यह सामने देखती है, आईने की तरह, साफ़-साफ़, वही झट से मस्तिष्क तक पहुँचा देती है। चाहे उस समय दिल कितना ही दुखी क्यों न हो। मस्तिष्क कितना ही अशांत क्यों न हो। इसमें इतनी नीति नहीं होती कि अशांत व दुखी हृदय को कष्टकारक घटना बताकर उसे और परेशान न करे। आँख की इसी आदत के कारण ही उसे लोग "नयन" या "नैन" कहने लगे।

परंतु आप धोखे में मत रहिएगा। ये नज़रें भी कई नज़ारे करती हैं। इसके भिन्न-भिन्न पोज़ों के अर्थ भी भिन्न ही होते हैं। आप स्वंय ही देख लीजिए –

"नज़र उठे तो कज़ा होती है,
नज़र झुके तो हया होती है।
नज़र तिरछी हो तो अदा होती है,
नज़र सीधी हो तो फ़िदा होती है।"

मैंने कई लोगों से यह प्रश्न किया कि यदि आँखें न होती तो क्या होता? सबका एक ही रटा-रटाया उत्तर मिला कि यदि हमारी आँखें न होतीं तो हम अन्धे हो जाते, हमें कुछ दिखाई न देता, हम चल-फिर नहीं सकते थे। आदि-आदि। लेकिन मैं इस उत्तर से संतुष्ट नहीं। इस संसार में कई लोग प्रज्ञाचक्षु हैं तथा अच्छे-अच्छे पदों पर आसीन हैं बिना किसी हिचकिचाहट के हाट-बज़ार हो आते हैं। तथा आँख वालों से अच्छे हैं। लेकिन जनाब मैं आपको एक राज़ की बात बता दूँ? सच मानिए, यदि नज़रें न होती तो सबसे अधिक नुकसान औरतों का होता। विशेषकर सुन्दर औरतों का। आपने नहीं सुना –

"यह नज़रें न होती तो नज़ारा भी न होता।
तब इस दुनिया में हसीनों का गुज़ारा भी न होता।!"

यह नयन केवल देखने-पढ़ने के काम ही नहीं आते। लेने वालों ने तो चुपके से इनसे कई काम ले लिए और आपको पता भी नहीं चला। "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी" को चरितार्थ करते हुए अपनी-अपनी भावनानुसार लोगों ने इनका कई कामों में प्रयोग किया है।

आधुनिक युग में गगनचुम्बी इमारतों को बनाने के लिए उससे दुगनी-तिगुनी उँचाई के नोटों के ढेर लगाने पड़ते हैं। तिस पर हालत यह है कि किराए पर एक कमरा तक नहीं मिलता। परंतु कदाचित आपका परिचय कबीर दास जी से नहीं हुआ होगा। उनके कथनानुसार आपको इतनी महँगी सीमेंट और ईंट लेने की आवश्यकता नहीं। लोहे-सरिए के झंझट में पड़ने की ज़रूरत नहीं। उन्होंने आँखों से बिना "लिंटल" की कोठरी तैयार कर दी। इतना ही नहीं उसमें फर्नीचर भी फिट कर दिया। कबीर दास जी कहते हैं –

"नैनों की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय,
पलकों की चिक डारि के, पिय को लिया रिझाय।"

परंतु यह आँखें बहुत चंचल हैं। कई बार इनके बोये हुए काँटों से दिल लहुलुहान हो जाता है। गुनाह यह करती हैं, सज़ा दिल को मिलती है –

तपन सूरज में होती है,
तपना ज़मीं को पड़ता है।
मुहब्बत आँखों से होती है,
तड़पना दिल को पड़ता है।!

लेकिन उस पर तुर्रा यह है कि निगाहें अपना क़सूर मानने को तैयार नहीं। वे अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि –

"फिर न कीजै मेरी गुस्ताख़ निगाहों का गिला।
देखिए आपने फिर प्यार से देखा मुझको।!"

इसका तात्पर्य यह नहीं है कि आँख पर इस तपन का कोई असर ही न पडता हो। जिस प्रकार से दूध में पानी मिल कर दूध के भाव बिक जाता है, परंतु जब दूध को गर्म करते हैं तो सबसे पहले पानी ही जल कर भाप बनता है। उसी प्रकार से दिल के तडपने की आँच आँख पर भी पहुँचती है। तभी लोगों को कहते सुना है "जब से आँख से आँख लगी है, आँख नहीं लगती।"

दशा यह होती है कि कई-कई रातें आँखों ही आँखों मे कट जाती हैं। हृदय प्रेम के हिंडोले में झूलने लगता है। तब आँख व दिल दोनों एक-दूसरे से शिकायत करने लगते है। मीर साहब ने कहा है –

"कहता है दिल कि आँख ने मुझको किया ख़राब,
कहती है आँख कि मुझे दिल ने खो दिया।
लगता नहीं पता कि सही कौन सी बात है,
दोनों ने मिल के "मीर" हमें तो डुबो दिया।!"


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