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ISSN 2292-9754

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07.10.2014


आदमी को शहर, आप कहते रहें

आदमी को शहर, आप कहते रहें
इन मकानों को घर, आप कहते रहें

बेड़ियाँ प्यार पर, बंदिशें साँस पर
पंछियों के हैं पर, आप कहते रहें

रास्ते में सभी रास्ते खो गए
ज़िन्दगी है सफ़र, आप कहते रहें

इसने देखीं बहुत पतझड़ें, बारिशें
इस नदी को लहर, आप कहते रहें

बस्तियों में कहीं साथ रहने लगे
प्यार से जानवर, आप कहते रहें

कोई नफ़रत की आकर फ़सल बो गया
प्यार कर, प्यार कर, आप कहते रहें

इस अँधेरी उमस से भरी रात में
हो गई है सहर, आप कहते रहें


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