अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
11.30.2018


मंगलसूत्र
मूल लेखक: किशनसिंह चावड़ा
अनुवादक: डॉ. रजनीकान्त शाह

गुजराती कहानी का हिंदी अनुवाद

 पिताजी के दु:खद देहावसान के बाद बा बेहद उदास रहती थी। वे मुस्कुराती तो थी पर वह मुस्कान भी विषाद से युक्त मुस्कान थी। उनके काम में, उनके व्यवहार में, यहाँ तक कि हमारे प्रति उनके वात्सल्य में भी उदासी छायी रहती थी। मुझे बा का गला बहुत प्रिय था। वैसे भी बा अत्यंत लावण्यमयी और सुन्दर थी। उनके हृदय की निर्मलता का लावण्य उनके मुखार्विंद पर ऐसा झलकता था कि हम देखते ही रह जाएँ लेकिन उन सब में मुझे उनकी ग्रीवा बहुत अच्छी लगती थी। उस ग्रीवा से लिपटकर मैं बहुत प्यार करते हुए मैं कभी अघाता नहीं था। पाठशाला में कोई गुनाह हुआ हो, किसी लड़के से तकरार हुई हो, बापूजी ने आँख दिखाई हो, या बा का प्यार चाहिए होता हो तब मैं हमेशा उनकी गर्दन से लिपट जाता था। मंगलसूत्र से शोभित उस गले को चूमते रहने से मैं कभी थकता नहीं था और उसके बदले में मैं छककर उसका वात्सल्यपान करता रहता था। बापूजी के जाने के बाद बा का उदास चेहरा मंगलसूत्र रहित गले के कारण बहुत निस्संग लगता था। बा भी छत्र-रहिता अनाथ दिखती थी। मेरी दृष्टि जब बा के चहरे की ओर जाती थी तब वह अपने-आप उसकी निस्संग ग्रीवा से उतरकर सिसक लेती थी। इस दु:ख को सहन करने वाला मैं अकेला ही नहीं था। मेरी पार्वती बुआ भी थीं। बुआ स्वयं बहुत सुन्दर थीं लेकिन बा के स्वरूप की बड़ी चाहक थी। मुझे बराबर याद है- एक दिन बुआ, बा तथा मैं बैठे हुए थे। पिताजी के संस्मरणों की महफ़िल सजी हुई थी। अचानक बुआ की नज़र बा के गले पर जमी। उनसे रहा नहीं गया। इसलिए कहा, “भाभी! गले में तुलसी की माला तो रखिये ही। यह सूनी ग्रीवा मुझ से देखी नही जा रही।” और स्वाभाविक रूप से ही उनके हाथ ने बा के गले को छू लिया। बा ने माथा ऐसे ढँक लिया कि ग्रीवा की सुन्दरता छिप गई। बा कुछ भी बोली नहीं। बा बहुत प्रिय थी। बा का स्वरूप अच्छा लगता था। बा की आँखों से आँखें मिलाने से मैं थकता नहीं था परन्तु बा के गले को अंक में भरकर चूमना तो मेरे जीवन का परम ऐश्वर्य था। तथापि वह एकाकी गरदन मुझे रुला देती थी और बा के विगत सौभाग्य की याद ताज़ा करा कर पिताजी के स्मरणों की यात्रा कराती थी।

धनतेरस के दिन हमारे यहाँ धन की पूजा होती थी। पिताजी जब जीवित थे तब भी बा मेरे पास ही पूजा करवाती थी। बापूजी के जाने के बाद भी वही क्रम चल रहा था लेकिन बापूजी के जाने के बाद धनतेरस की पूजा में एक बदलाव छिपा नहीं रहा। मैं पूजा कर लूँ तत्पश्चात बा एक छोटी सी रेशमी पोटली में से मंगलसूत्र निकालकर पहले दूध से और बाद में जल से धोकर उसकी पूजा करती थी। बाद में जतनपूर्वक उसे रख कर एक चाँदी की डिबिया में रख देती थीं। ऐसी अनेक धनतेरसें आती थीं और चली जाती थीं। धीरे-धीरे वह मंगलसूत्र मेरे लिए बा तुल्य प्यारा हो गया।

सन्‌ १९२९ में मैं पोंडिचेरी से जब वापस लौटा तब मेरा पहला सुख था बा का मुस्कुराता हुआ चेहरा। मैं गया था तब उसके दिल को जो दु:ख पहुँचा था, उसे, जब मैं लौटा उसने मुस्कुराकर पिघला दिया। यहाँ सारे सुखी थे। आकर मैंने “नवगुजरात” साप्ताहिक में बतौर सह-संपादक का पद स्वीकार किया। बा बहुत ख़ुश हुई। उस काम के कारण मुझे सुबह, दोपहर, शाम देखे बिना कभी भी कहीं भी भटकना पड़ता था। एक बार गर्मियों का मौसम था। बैसाख माह चल रहा था। गर्मी अपने चरम पर थी। सिर फट पड़े; ऐसी लूएँ चल रही थीं। ऐसी तपती दुपहरी में मैं दो बजे मध्याह्न वेला में घर पहुँचा। बा भी भूखी-प्यासी मेरी राह निहारती, चिंता करती बैठी हुई थी। मैं जब आया तब उसका चेहरा कुम्हलाया हुआ था। हमने भोजन किया। खाना खाकर तनिक सुस्ताया। जब मैं उठा तब मुझे बुखार था। मेरा शरीर बुखार के कारण जल-तप रहा था। बा तो घबरा गई। उसने सारे घरेलू इलाज किये, पर बुखार था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। आख़िरकार डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर के सुझाव से मुझे अस्पताल पहुँचाया गया। मैं बा के आशीर्वाद और ईश्वर-कृपा से पुन: स्वस्थ हो गया।

उसके बाद की धनतेरस के दिन हम पूजा करने बैठे। पूजा में केवल पाँच ही रुपये थे। एक भी जेवर नहीं था। मुझे अचम्भा हुआ। धन की पूजा के बाद नित्यक्रमानुसार अपने मंगलसूत्र की भी पूजा की। बाद में मैंने बा से पूछा तब पता चला कि मेरे पोंडिचेरी के निवास दरमियान बा ने ज़ेवर बेचकर घर को चलाया था। उस दिन मैं बा की एकाकी ग्रीवा से लिपटकर बहुत रोया।

सर्दियाँ बीतीं और गर्मियाँ आयीं। मेरी बहुत चाह थी कि एक साईकिल ले लूँ, लेकिन इतनी बचत कहाँ से लाऊँ? एक रात हम सब बतिया रहे थे कि मेरे मुँह से साईकिल की बात छिड़ गई। साईकिल के बिना कितनी तकलीफ़ होती है, यह सुनकर बा को बहुत दु:ख हुआ। दूसरे दिन पुन: मुझे देर हो गई। बा तो बेचारी हर बार की तरह मेरी बाट जोह रही थी। मुझे खिलाने के बाद भी उसकी एक ही चिंता थी कि मैं बीमार न हो जाऊँ। दोपहर के खाने के बाद जब मैं काम पर निकला तब बा ने पूछा, “बेटा, साईकिल हो तो तुम्हें कष्ट कम होगा ना?”

मैंने चलते-चलते हँस कर कहा, “बा, ऐसा तो कबीरजी कह गए हैं।”

जब जब भी मुझे बा को हँसाना हो तब मैं उपरोक्त वाक्य का प्रयोग करता था।

मैं शाम को घर लौटा तब चौकी पर एक नयी साईकिल पड़ी थी। मुझे लगा कि कोई मिलने के लिए आया होगा। मेरी आवाज़ सुनकर बा बाहर दौड़ी चली आई। उसके मुख पर अवर्णनीय आनंद था। कई बरसों के बाद मैंने उसका इतना प्रफुल्लित चेहरा देखा। उसने कहा, “किशन, तुम्हारे लिए साईकिल आ गई।”

आनंद और आश्चर्य की मिश्रित भावना से डूबा मैं कुछ पूछूँ, उससे पूर्व मीठी मुस्कान का तोहफ़ा देकर बा ने कहा, “मैं ले आई गोपल काका के यहाँ से। पसंद आई ना? उन्होंने कहा, “आजकल लड़के इसे बहुत शौक से चलाते हैं”। अच्छी है ना?”

मैंने कहा, “पर बा मुझे अभी नहीं चाहिए थी।” और इससे पहले कि मैं आगे बढ़ूँ, उससे पहले तो वह कह उठीं, “चलाकर तो देख। मैं भी तो देखूँ कि तुम्हें कैसी चलानी आती है?” और मैंने नयी साईकिल ऊपर सवार होकर एक चक्कर काटा तब हम दोनों बहुत ख़ुश हो गए।

उसके बाद की धनतेरस के रोज़ पूजा करने के लिए बैठे। बा ने मेरे पास पाँच रुपये की पूजा करवाई और पूजा संपन्न हुई। बा ने मंगलसूत्र की पूजा नहीं की। अत: मैंने पूछा, “बा, आप पूजा क्यों नहीं कर रहीं?”

बा ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब ज़रूरत नहीं है। तुम साईकिल पर बैठोगे और मैं देखूँगी –यही मेरी पूजा है।” मेरे दिल को धक्का लगा। मैंने कहा, “बा,आप मंगलसूत्र बेचकर साईकिल ले आईं?” और मेरे उदास मुख को बा ने अपने गले पर रख दिया। मैं उन्हें अंक में नहीं भर सका और न ही चूम सका।

दूसरे दिन मैं अपने एक मित्र से एक सौ दस रुपये लेकर गोपाल काका के घर गया। काका तो घर में नहीं थे, पर गुलाब काकी थीं। वे घर से बाहर आईं और मैंने उनके गले में बा का मंगलसूत्र देखा। रुपये मेरी जेब में ही रह गए। काका का हालचाल पूछ कर मैं चल पड़ा। लौट कर बा से कहा, “गुलाबकाकी के गले में आपका मंगलसूत्र देखकर मैं एक भी शब्द बोल नहीं पाया।”

बा ने हँस कर कहा, “बेटा, उसका सौभाग्य अखण्ड रहे।”

बा का वह मुख आज भी, जब-जब मैं अपनी साईकिल को छूता हूँ तब मेरी नज़रों के समक्ष आ जाता है और दिल को छूता है। साइकिलें तो कई बदली गईं हैं पर बा का चेहरा नहीं बदला है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें