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ISSN 2292-9754

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05.29.2017


घर से भागी हुई लड़कियाँ

घर से भागी हुई लड़कियाँ
नहीं रखती समाज में सर उठाकर जीने का हक़
होती है कानाफूसियाँ
देखो बेशर्म को माँ बाप की इज़्ज़त कैसे मिट्टी में मिला दी
लड़कियाँ सुनकर सोचते हुए बढ़ जाती हैं आगे
कि कब उससे बिना पूछे
लाद दिया उसपर
इज़्ज़त का भारी टोकरा और क्यों
जिसने सिखाया है उसे
नासमझ उम्र से ही मन मसोसना, तर्कविहीन रहना
भला अपनी ख़ुशियों के लिए दूसरों की मोहताज़ी
इज़्ज़त का पर्याय कैसे हो सकती है?
टटोलती है बीत हुए कल को
जब कितनी ही रातें गवाह बनी थी उसके गहरे अवसाद की
पुरुषवादी सोच को न भेद पाने की हार की
शायद आज वह भी होती एक लायक़ बेटी
गर वह न चुनती अपनी उड़ान
क़ैद रहती समाज के नियमों के पिंजरें में
चलती पितृसत्तात्मकता की चाभी से
सीख लिया होता चुप्पी की चादर ओढ़ना
अंतत: उसने चुना
त्याग की देवी बनने के बदले अपने लिए जीना
और इन बंदिशों से तोड़ कर निकल जाना
गर अपने लिए जीना बेशर्म होना जाना है
तो अब मंजूर है उसे बेशर्म कहलाना..


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