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07.29.2014


मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में संघर्ष और द्वंद्व

कथा साहित्य में मैत्रेयी पुष्पा का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपने उपन्यासों में वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, दार्शनिक और नैतिक समस्याओं को नवीन दृष्टि से देखा और चित्रित किया है। मैत्रेयी पुष्पा ने मध्य वर्गीय परिवार में जूझती नारी के संघर्ष और द्वंद्व को नवीन रूप में प्रस्तुत ही नहीं किया अपितु उसमें नयी दिशा भी दी है। मैत्रेयी पुष्पा ने उपन्यासों में विद्रोह के साथ सामन्तीय संस्कारों, आर्थिक, पारिवारिक संबंधों में नवीन वैचारिक दृष्टि को अपनाया है। मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में लोक संस्कृति, संस्कार आदि का अंकन भी किया गया है।

मैत्रेयी पुष्पा ने अपने उपन्यासों में समय को ध्यान में रखते हुए उसमें उत्पन्न संघर्ष और द्वंद्व को चित्रित किया है। इनकी रचनाओं ‘स्मृति दंश’(1990), ‘बेतवा बहती रही’ (1993), ‘इदंन्मम’ (1994), ‘चाक’ (1997), ‘झूलानट’ (1999), ‘अल्मा-कबूतरी’ (2000)। ‘अगनपाखी विजन’ (2002), ‘कबूतरी कंडुल बसै’ (2002), ‘कही ईसुरी फाग’ (2006) मैत्रेयी पुष्पा ने अपने उपन्यासों में स्त्रियाँ विषम परिस्थितियों में सफलतापूर्वक संघर्ष करके अपने वर्चस्व को स्थापित करती है। ये स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति संघर्ष और द्वंद्व के प्रति पूर्ण रूप से सजग हैं।

इस सृष्टि का शाश्वत सत्य है। प्रकृति में विभिन्न स्तरों पर यह संघर्ष निरंतर चलता रहता है। प्रकृति के अनमोल रत्न मानव का जीवन भी संघर्ष का ही दूसरा नाम है। मानव जीवन में संघर्ष विभिन्न रूपों पर दिखाई देता है। इसे हम भीतरी एवं बाहरी, शारीरिक एवं मानसिक आदि वर्गों विभक्त कर सकते हैं। बाहरी एवं शारीरिक संघर्ष के अंतर्गत मनुष्य सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, भाषिक आदि जैसे विभिन्न स्थितियों से जूझता रहता है। वहीं दूसरी ओर उस के मन के भीतर ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, स्वार्थ जैसे नकारात्मक भावों और दया, प्रेम, करुणा, परोपकार सहयोग जैसे सकारात्मक भावों में निरंतर संघर्ष चलता रहता है।

नयी कविता प्रमुख हस्ताक्षर श्री जगदीश गुप्त के शब्दों में -

"सच हम नहीं, सच तुम नहीं
सच है महज संघर्ष ही।"

द्ंवद्व भी मानव जीवन की एक अनिवार्य स्थिति है। द्ंवद्व का संबंध अवसरों पर मानव द्ंवद्व या दुविधा ग्रस्त हो जाता है। वह सही-गलत, उचित-अनुचित सार्थक-निरर्थक कर्ण करणीय-अकरणीय का निर्णय नहीं कर पाता। वह दो पाट के बीच फंसे गूँहे के दाने के समान हो जाता है। जो चाहकर भी साबुत नहीं बच पाता।

उपन्यास ‘अगनपाखी’ में मैत्रेयी पुष्पा ने नायिका भुवनमोहिनी के माध्यम से संघर्ष की स्थिति को उभारा है। भुवन मोहिनी का विवाह आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मानसिक रूप से पागल लड़के के साथ करवा दिया जाता है। भुवन मोहिनी के पिता की मृत्यु के बाद माँ अपनी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए विक्षिप्त लड़के से भुवन-मोहिनी का विवाह तय कर देती है। इस बात का पता भुवन को नहीं था ना ही उस से पूछा गया। सुसराल जाने के बाद उसे इस बात का पता चलता है तो वह दोबारा सुसराल जाने से मना कर देती है। यही से उस के संघर्ष की स्थिति जन्म लेती है। नायिका कहती है कि "ये गहने धरो चाहे लौटा दो, लाखों के होगें। पर एक खरी बात सुन लो, भले टका की सही। मैं वहाँ जाने वाली नहीं।"

तेरी नानी सकते में आ गयी, बोली-काए, काए नहीं जाएगी सासरे?

भुवन ने माँ की आँखों में आँखें डालकर कहा – "पता है तुम्हें, पर मेरे मुँह से सुन लो, वह सिर्री है, पागल।"1

भुवन मोहिनी शुरू से ही हिम्मती, जागरूक लड़की के रूप में प्रस्तुत की है। लड़की होने का उसे कोई अफसोस नहीं है। वह अपने सभी कार्य आत्मविश्वास से पूर्णतः पूर्ण कर लेती है। मैत्रेयी पुष्पा ने नायिका भुवनमोहिनी में जो आत्मविश्वास को दिखाया है। भुवनमोहिनी का विश्वास से पूर्ण रूप देखते ही बनता है। जब वह कहती है कि "वह आगे बढ़ आई। सफेद दांत निकालकर हँस ती हुई बोली – बढ़ आगे, मैं तेरे बैलों को रोक लूँगी। कहकर भुवन ने दोनों बैलों के सींग पकड़ लिए । और ऐसे देखा जैसे गाड़ी न रोकी हो, हमें रोक दिया हो।"2

उपन्यास में भुवनमोहिनी अपने अधिकारों के प्रति समर्थन को व्यक्त करती दिखाई देती है। वह विवाह को भी प्रमुख अधिकारों में से एक अधिकार मानती है। शारीरिक व मानसिक रूप से सही व्यक्ति से विवाह करना उसका अधिकार है। अयोग्य पुरुष के साथ विवाह करने से अच्छा उसे छोड़ देना ही स्त्री के हित में है। भुवन भी पागल पति के साथ अपना जीवन खराब करने से अच्छा उसे छुटकारा पा लेना ज्यादा बेहतर मानती है।

"और भुवन पूछ रही थी", "अम्मा ब्याह करना पाप नहीं तो ब्याह छोड़ना क्यों पाप है? तुम अपने ऊपर पाप मत चढ़ाओ, तुम्हें तो वर के बारे में कुछ पता ही नहीं था। अब मैं अपनी अक्ल के हिसाब से जो भी करूँ। नरक स्वर्ग मेरे लिए बनेगा।"3

(भुवन) वह किसी बात से घबराती नहीं है। हर बात, वह कार्य करने की क्षमता व जिज्ञासा उसमें पूर्णतः है। शक्ति और साहस में लड़कों के समान है। वह इसीलिए दबकर नहीं रह सकती क्योंकि वह स्त्री है। उसे कोई कुछ भी कहता है तो उस के प्रति वह अपनी प्रतिक्रिया दिखाए बिना नहीं रहती है।

"अपनी भुवन कैसी ताकतवर बेटी थी। वह यहाँ बाग के मालिक और मुखिया के नाती बेटा उस से थर्राते थे। याद है वह किस्सा मुखिया के नाती की छाती पर लात...."4

स्त्री को मात्र जरूरत की वस्तु न मानकर, उसे इन्सान समझना ही स्त्री का समर्थन करता है।
‘अगनपाखी’ में नायिका भुवन अपने हक के लिए भी लड़की हुई दिखाई पड़ती है। अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए वह जमीन-जायदाद में भी अपनी दावेदारी के लिए अर्जी दे देती है -
"कचहरी से अर्ज है कि अपने पति की जायदाद का हक मुझे सौंपा जाए । मैं कुँवर अजय सिंह की हकदारी पर सख्त एतराज करती हूँ।"5
उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ में मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री को अनेक प्रकार के संघर्षों के गुजरना पड़ता है, पीड़ाएँ सहनी पड़ती है, इतना सब होने पर भी वह अपने पुत्र को शिक्षा दिलवाती है।

"विद्या का दामन थामा है तो बेबसी और बदंरगतों (विद्या) से गुजरना होगा। माँ के घावों पर जैसे रामसिंह की छोटी-छोटी उँगलियों ने स्याही लेप दी हो। कटे-फटे बदन के चलते भी मोरनी-सी नाची फिरती। समय जाँच रहा था - औरत में कितनी ताकत है। भूरी समझ रही थी, बेटे का उजाले-भरा रास्ता माँ की देह से गुजर रहा है।"6

नायिका ‘अल्मा’ अपने पिता की इच्छा पूरी करते-करते निरन्तर शोषित और पीड़ित होती गई। पिता के सपने के कारण वह अपने आपको अपने अस्तित्व को मिटाती-बर्बाद करती चली गई।

उपन्यास ‘इदन्नमम्’ में पात्र कुसुमा अपनी वैवाहिक जीवन से खुश न होकर स्वयं अपने ससुर को अपने जीवन साथी के रूप में चुनती है। कुसुमा तर्क देती हुई कहती है कि पति के घर में यशपाल से संबंध बना ही नहीं तो फिर इस घर में कोई भी संबंध किसी से नहीं मेरा। वह पूर्ण रूप से अपने संघर्ष को दर्शाती हुई कि उस ने जो भी किया ठीक किया है।

"रही हिस्सा-बाँट की बात, सो निसाखातिर रहां, हम तुम्हारा कुछ नहीं बँटायेंगे। हमारे कुँवर के पिता का तो तुम्हारे हिस्से से कई गुना बड़ा हिस्सा है, घर मैं और खेत मैं। फिर छोटे हिस्से पर क्यों जायेंगे हम?"

"कस्तूरी कुण्डल बसै", मैत्रेयी पुष्पा का आत्मकथात्मक उपन्यास है। इसमें लेखिका ने अपनी जीवन से जुड़ी हुई घटनाओं को प्रस्तुत किया है। लेखिका ने इस उपन्यास में अपनी माँ कस्तूरी के जीवन संघर्ष को दिखाया है। यह उस समय की बात है जब स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। उन्हें धान का पौधा कहा जाता था कहने का तात्पर्य स्त्री का जहाँ जन्म होता है और दूसरी जगह जहाँ उसे शादी कर भेज दिया जाता है। तब उसे वहाँ पूर्ण रूप से अपने आप को व्यवस्थित करना पड़ता है। कस्तूरी इन बातों से सहमत नहीं थी कि स्त्री का जीवन का आधार यही है कि शादी करे, बच्चे पैदा करे, खाये-पीये और पूर्ण रूप से अपने आप को उस वातावरण में ढाल लें।

"मैं धान का पौधा हूँ" सोचकर वह हँस पड़ी। अनपढ़ अज्ञान भाभी खुद धान का पौधा बन गई है। यहाँ रुपने की शर्त में चाँदी-सोना माँगती है। यही है औरत की जिंदगी का सार।"7

उपन्यास में लेखिका ने अपने दृष्टिकोण से स्त्री की इच्छा का कोई महत्व नहीं है? कस्तूरी की इच्छा के विरुद्ध उसका विवाह कर दिया जाता है। जब उसे इस बात पर पता चलता है कि उसका विवाह विक्रय करके हुआ है तो वह आक्रोश और पीड़ा से भर जाती है।

"हम तो सोच रहे थे नई छोरी की तरह शरमा रही है, पर तू तो जोर आजमा रही है। तेरे भइया ने खनखनाते चाँदी के कलदार वसूले हैं, मुफ्त में नहीं आई सो नखरे पसार रही है।"8

कस्तूरी ने समाज की परवाह करे बिना अपने ससुर से बातचीत आरम्भ कर दी। नए से अपनी पढ़ाई आरम्भ की। कस्तूरी प्रतिदिन बैग लेकर गाँव से ढाई कोस दूर इगलास के स्कूल में जाने लगी।

"स्कूल जानेवाली झोला लटकाए औरत को भौंचक होकर सबने देखा। वह इस कदर परेशान हुई कि किसी को तो क्या, रास्ते के कंकड़-पत्थर और चढ़ाव-उतार तक न देख पाती।"9

लेखिका ने स्त्री की सुरक्षा को महत्व दिया है। लेखिका ने असुरक्षा के भाव को स्वयं अनुभव किया है। इसे स्वीकार भी किया है कि स्त्री के अनेक संघर्षों में एक संघर्ष अपनी सुरक्षा के लिए होता है।

"भागते-भागते, बचते-बचते सारी ताकत छिन गई, अब वह निखालिस थकान पर है।"10

कस्तूरी अपनी बेटी को समझाती है कि अनपढ़ औरतों की तरह सोना-चांदी आदि जेवरों पर विश्वास व लालस मत दिखाना विद्या ही असल में पूंजी है।

"लिखा है - जेवर मत लाना, उनकी रखवाली कौन करेगा? चाँदी-सोने के छल्ला-चेन अनपढ़ औरतों के लालच होते हैं, उसे ही पूँजी समझती है। तू पढ़ी-लिखी है। सनद सर्टिफिकेटों की मालकिन। विद्या का खजाना तेरे हाथ है।"11

‘कहीं ईसुरी फाग’ उपन्यास की नायिका ऋतु के पिता की मृत्यु के पश्चात् भी वह इतना पढ़ लिख पायी। ऋतु और उसकी माँ ने कभी भी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया अपितु सदैव संघर्ष ही किया। वह अपनी बेटी को शिक्षा दिलवाकर उसे उच्च शिखर पर देखना चाहती थी।

"मेरी बेटी तो रिसर्च कर रही है। पीएच.डी. के लिए रिसर्च"12

उपन्यास ‘चाक’ मैं न्याय के लिए संघर्ष की कथा है। नायिका रेशम और उस की फुफेरी बहन का रिश्ता एक ही जगह होता है। किन्हीं कारणों से रेशम के पति की मृत्यु हो जाती है। और रेशम विधवा होने के बाद गर्भवती होती है। सास के सभी आग्रहों को ठुकराने के बाद उस की बहन अपने घर आने को कहती है। किन्तु वह मना कर देती है। रेशम की मृत्यु करवा दी जाती है। सारंग उसे न्याय दिलवाना चाहती है उसे पता है कि वह मृत्यु नहीं हत्या है।

"काश यह मौत होती। मगर यह हत्या। पतित स्त्री, गर्भिणी औरत की हत्या।"13

‘चाक’ उपन्यास की नायिका सारंग की बहन की हत्या ससुराल वाले कर देते हैं। सारंग उन सबको सजा दिलवाने के लिए संघर्ष करती है। वह यह भी चाहती है इस सब मैं गाँव वाले उसका साथ दें। "मेरे ससुर गजाधर सिंह, चचिया ससुर खूबराम, ग्राम प्रधान फतेसिंह, पुराने जमींदार नंबरदार, ग्रामसेवक भवानदास, पंडित चरनसिंह से लेकर ऊंची-नीची कौमों के तमाम बूढ़े-बड़े मासूम क्यों रह गए? इनकी जिह्वा क्यों लकड़ा गई? "14

‘झूलानट’ में मैत्रेयी पुष्पा ने उपन्यास की नायिका शीलो साधारण स्त्री है जो गाँव में रहती है। नायिका शीलो परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकती बल्कि उसका सामना करती है। शीलो अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं है क्योंकि उसका पति हमेशा उस की उपेक्षा करता रहता है। पति का मन परिवर्तित करने के लिए निरन्तर संघर्ष करती है। वह अनेक तप, जप करके उस के मन में अपना स्थान बनाना चाहती है लेकिन सभी प्रयास विफल हो जाते हैं। धीरे-धीरे वह अपने आपको घर के अन्य कार्यों में मन रमा लेती है। अब वह पति के प्रति प्रेम-भाव न होकर बल्कि अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करती है। अब वह घर के पूरे कर्तव्य व अधिकार को अपने हाथ में ले लेना चाहती है।

"बछिया करा देतीं, तो यह सींग पैना कर खड़ी हो आती! छोटा सा पशु ही इस को बेदखल कर देता सारे हक से। पूरा गाँव गवाह होता ---- पर अम्मा, दो-चार हजार रुपय का लोभ करके तुमने हमें चित्त कर दिया। अरे! मुझसे सवाल करतीं, तो मैं भेज देता। अब भुगत लो, लाखों की जायदाद पर दाँत गाड़े बैठी है"15

उपन्यास ‘विजन’ में नायिका नेहा शिक्षित युवती है। नेहा आँखों की डॉक्टर है। परिवार में पति और ससुर भी इसी व्यवसाय से संबंधित है। पति और सुसर ने मिलकर अपना ‘आई सेंटर’ भी खोल रखा है जिसका महत्व केवल अपनी जेबें भरना है। नेहा इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है तो वह उस के लिए अनेक रूकावटें पैदा करते हैं। नेहा अपनी परिस्थितियों से समझौता तो कर लेती है पर उसका संघर्ष जारी रहता है -

"मैं अकेली रह गई, निपट अकेली ---- इस घर में न मुड़ने वाले कानून, इस घर की मालकिन के मितभाषी, कठोर नियम, इस घर के बेटे का संस्कारित व्यक्तित्व शौर शरण आई सेंटर को वारिस के वारिस की जरूरत, एक चक्रव्यूह बन गया आभा दी, नेहा ने सजर्री के कितने ही दाँवपेंच, स्टैप्स और रुल्स सीखे हों, इस व्यूह के भेदन में अभिमन्यु की तरह ही मारी गई।"16

मैत्रेयी पुष्पा ने अपने सभी उपन्यासों में स्त्री पात्र के जीवन में आई स्थिति-परिस्थिति, घटनाओं में द्ंवद्व को चित्रित किया है।

उपन्यास ‘अगनपाखी’ में चंदर की नौकरी ठाकुर अजय सिंह के सतत प्रयास द्वारा लग जाती है। इसके बदले वह अपने भुवन का विवाह अजय सिंह के भाई से करवा देते हैं। माँ बड़े पैसों के चक्कर में भी आकर भुवन का विवाह करवा देती है। भुवन भीतर ही भीतर इस द्ंवद्व से जूझ रही है। अपनी किस्मत को कोसते हुए कहती है कि जिससे प्यार करती थी उससे शादी नहीं हुई और जिससे शादी हुई है उससे मैं प्यार नहीं करती। वह अपने ससुराल में खुश नहीं है ना ही उनसे किसी भी प्रकार का समझौता नहीं कर पा रही है। ससुराल में सभी भुवन को समझाते हैं कि वह इस पागल को एक बच्चे की तरह समझ कर पाल लें, किन्तु भुवन को इस विषय में सभी बातें खोखली प्रतीत होती है।

"अम्मा ब्याह के बाद बच्चा होने में भी नौ महीने लगते हैं, कोई पहले ही दिन से ही पूरे मर्द को अपना बच्चे कैसे मान ले? तुम लोगों की बातें मेरी समझ में नहीं आती। कैसे प्रतिव्रता धरम सिखाती हो? और इस धरम का मतलब मेरी समझ में क्यों नहीं आता?"17

उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ की नायिका अल्मा का द्ंवद्व घर की परिस्थितियों से संबंधित है। पिता का मृत्यु और प्रेमी से दूर हो जाने के कारण माँ अल्मा को समाज में रहने के लिए सभ्य व सुशिक्षित बनाना चाहती है। पिता की कामना थी कि वह अल्मा को पढ़ा-लिखाकर अपने जीवन को सही दिशा दें।

अल्मा के पिता की मृत्यु पुलिस व सहयोगी कम्रचारियों ने की। अल्मा के मन में पुलिस व कर्मचारियों के प्रति घृणा व आक्रोश भरा हुआ था। अल्मा कहती है कि कबूतर होना कोई अपराध तो नहीं है पर इस अपराध की सजा मेरे पिता को क्यों मिली। अल्मां के मन में क्रोध ही उसका द्वंद्व बन गया है। वह अपने परिवार के प्रति हुए अन्याय के लिए प्रतिश् शोध लेना चाहती है जो सम्भवतः उस के लिए उत्तरदायी है -

"आप जानते हैं मैं यहाँ क्यों रुकी हुई हूँ? आप समझते हैं कि मैं जिंदा भी क्यों हूँ? बड़ी सीधी बात है, आप लोगों ने मेरी दुनियाँ उजाड़ी है, मैं आप को उजाड़े बिना नहीं मरूँगी। मैं सबको बता दूंगी कि पाप कहाँ पलता है? अपराध कौन लोग करते हैं? सातने और मारने ठेकेदार कौन हैं? मेरे पिता ने इन्हीं बातों से समझौता नहीं करना चाहा था, पर इतना तो समझती हूँ कि हमारे लिए क्या गलत है, क्या सही? "18

मैत्रेयी पुष्पा ने अपने उपन्यास ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ में अपने जीवन में घटी घटनाओं का चित्रण किया है। लेखिका जब 18 दिन की थी, पिता की मृत्यु हो गई। माँ कस्तूरी इस सदमे से उभर कर अपने आप को व्यवस्थित करने में निरन्तर प्रयास करती रहती।

"अब मैं अपनी जिंदगी और बेटी की नन्हीं जान को लेकर ही सोच पाती हूँ मुझे लोग धिक्कार रहे हैं, जानती हूँ धिक्कार किसे अच्छी लगती है? पर कैसे समझाऊँ कि मेरे सामने आने वाले दिन बाघ की तरह मुँह फाड़े खड़े हैं। मैं आने वाली घड़ियों से छुटकारा पाकर बच जाऊँगी? हर हाल में सामना करना पड़ेगा...."19

‘झूलानट’ की नायिका शीलो का द्ंवद्व इस प्रकार से है। वह अपने मन में जिसे पति रूप में देखती है उस से उसका विवाह नहीं होता। जिससे विवाह होता है वह पति उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं करता है।

शीलो का पति पेशे से पुलिस में है। शीलो का रूप-सौन्दर्य साधारण है तथा दायें हाथ में छः अंगुलियाँ हैं सास के समझाने पर वह अपने पति को खुश रखने की कोशिश भी करती है। बार-बार उपेक्षा झेलते हुए वह द्ंवद्व में घिरी रहती है।

पति सुमेरु के दूसरे विवाह का सुनकर वह आक्रोश व द्ंवद्व में आकर अपनी छठी उंगली काट लेती है।

"वो पता नहीं, मन-ही-मन किन भावनाओं से लड़ रही थीं? क्या मालूम कि क्या इतने गहरे खंदक में फँसी, अपने-आप से ही लड़ रही थी? चेहरा उठाया, तो अनकही मुठभेड़ दर्ज थी होंठों पर, नाक पर, आँखों में। अंग-इन्द्रियाँ थक-हार गए हों जैसे।"20

मैत्रेयी पुष्पा ने उपन्यासों के माध्यम से मध्य वर्गीय परिवारों में मूल्य-विघटन की स्थिति को चित्रित किया है। उपन्यासों में नारी अनेक संघर्ष व द्वंद्व से जूझती नजर आती है। मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में नारी के वर्चस्व के साथ-साथ नवीन सोच, विचार, संघर्ष, द्वंद्व को दृष्टिगत किया है।

1 अगनपाखी, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 71
2 वही, पृ. 20
3 अगनपाखी, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 77
4 वही, पृ. 82
5 अगनपाखी, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 7
6 ‘अल्माकबुतरी’ ‘मैत्रेयी पुष्पा’, पृ. 75
7 कस्तूरी कुण्डल बसै, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 16
8 वही, पृ. 17
9 वही, पृ. 32
10 कस्तूरी कुण्डल बसै, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 330
11 वही, पृ. 259
12 वही, पृ. 287
13 ‘चाक’, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 22
14 वही, पृ. 14
15 झूलानट, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 113
16 विजन, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 133
17 अगनपाखी, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 77
18 अल्मा कबूतरी, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 370
19 कस्तुरी कुण्डल बसै, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 26
20 झूलानट, मैत्रेयी पुष्पा, पृ. 69

(डॉ. राज कुमारी शर्मा)
सहायक प्रोफेसर (अतिथि)
हिंदी विभाग
आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज
धौला कुआँ, नई दिल्ली-110021
निवास:
आर-जेड- 505ए/92, राजनगर
पालम कॉलोनी
नई दिल्ली-110045


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