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08.24.2016


हिंदी परिष्कार और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

"संपादक" शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए होता है, जो किसी भी सूचनात्मक, साहित्यिक या कलात्मक कार्य को सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करे। इसलिए समाचार पत्र-पत्रिकाओं साहित्यिक, प्रकाशनों पिफल्मों आदि में संपादक का महत्व सर्वोपरि होता है। किसी भी पत्र-पत्रिका की नीति निर्धरित करने वाला संपादक ही होता है। दैनिक "आज" के यशस्वी संपादक बाबूराम विष्णु पराड़कर ने साहित्य संदेश के द्विवेदी अंक में "संपादक" की कल्पना एक मिस्त्री के रूप में की है "ईंट, पत्थर, चूना, लोहा-लक्कड़ सबका एक ढेर और उन्हीं पदार्थों से बनाया हुआ एक मंदिर इनमें अंतर है। ईंट बनाने वाले संगतराश, लुहार, बढ़ई, सबने अपनी-अपनी कला दिखा दी, पर वह ढेर-का ढेर ही रह गया, मंदिर न हो सका। यह काम मेमार (मिस्त्री) का है।"1 संपादक के बारे में अन्य विद्वानों ने अपने मतानुसार विचार प्रकट किए हैं। श्री बाँके बिहारी भटनागर ने लिखा है- "अच्छी भाषा और अच्छे साहित्य के माध्यम से अच्छे समाज के विकास में संपादक का बहुत बड़ा हाथ होता है और वह यह कहकर अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकता कि उसका कार्य साहित्य के उपवन से पुष्पों को एकत्र कर केवल एक स्थान पर अथवा एक पात्र में रख भर देना है। फूल सुंदर है या असुंदर उनकी गंध मानव-समाज के लिए कल्याणकर है अथवा अहितकर और फूल वास्तविक हैं या कृत्रिम- यह सब देखना भी संपादक का कार्य है और यदि इसे वह संपन्न नहीं कर पाता, तो निःसंदेह वह एक असफल अथवा अधूरा संपादक है।"2

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के प्रथम संपादकाचार्य थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी झाँसी के रहने वाले थे। द्विवेदी जी रेलवे में कार्य करते थे। साहित्य के प्रति उनकी रुचि देखते ही बनती थी। नौकरी के साथ-साथ वे पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाएँ भेजते रहते थे। उन सभी पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ छपती रहती थीं। उन्हीं दिनों वरिष्ठ लेखक लाला सीताराम ने महाकवि कालिदास की शकुन्तला की आलोचना तथा तत्सम्बन्धी साहित्य पर एक वृहत ग्रन्थ का प्रकाशन कराया। वह ग्रंथ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने पढ़ा। ग्रंथ को पढ़कर उसकी त्रुटियों का उल्लेख करते हुए एक उसकी कटु आलोचना "सरस्वती" पत्रिका में भेजी। द्विवेदी जी की इस निर्भीकता को देखते हुए सरस्वती के संचालक बाबु चिंतामणि घोष ने उन्हें सरस्वती पत्रिका के संपादक का पद सौंप दिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन् 1903 में सरस्वती पत्रिका के संपादक का दायित्व सँभाला।

1903 के बाद "सरस्वती" पत्रिका को एक नई पहचान मिली तथा उसका दिन-प्रतिदिन महत्त्व बढ़ता गया। धीरे-धीरे "सरस्वती" पत्रिका में रचना छपना किसी भी लेखक के बड़े ही गौरव की बात समझी जाने लगी। आचार्य शिवपूजन सहाय ने "सरस्वती" पत्रिका की महत्व का वर्णन करते हुए कहा है - "द्विवेदी जी के समय की "सरस्वती" में जान थी। जीवन की चहल-पहल थी। सत्य की पिपासा से व्याकुल वह दुर्गम पर्वतों और दुरूह गुफाओं में अमृत-सलिल को ढूँढने के लिए सदैव तत्पर थी। वह जीवन-संग्राम में शत्रुओं से मुक़ाबला करने के लिए सदैव खड्गहस्त रहती थी। बड़े-बड़े महारथियों ने उससे मोर्चा लिया, अपने तरह-तरह के दाँव-पेंच दिखाये, हर तरह से पैंतरे बदले और तलवार चलाने के अपने जौहर से देखने वालों को चकित भी कर दिया, लेकिन "सरस्वती" की महावीरी गदा के सामने उनकी एक न चली।"3

द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के संपादन के दौरान अनेक महत्वपूर्ण बिदुओं को उठाया, और उसमें उन्हें सफलता भी मिली। उनके संपादन काल (1903-1920 ई.) में "सरस्वती" पत्रिका दिन दुगनी रात चौगुनी फली-फूली।

"सरस्वती" पत्रिका में विषयों की विविधता थी- वस्तुयोजना, संपादकीय टिप्पणियाँ, पुस्तक समीक्षा, चित्र, साहित्य-समाचार के व्यंग्य-चित्र, प्रूफ़ संशोधन आदि में द्विवेदी जी की लगन और कर्मठता दिखाई पड़ती है। उस समय "सरस्वती" पत्रिका बंगला भाषा के अतिरिक्त शेष सभी देशी भाषाओं में सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मानी जाती थी। द्विवेदी जी अपने समय की अन्य पत्र-पत्रिकाओं को भी पढ़ते रहते थे। अन्य पत्रिकाओं से तुलना करते हुए श्री बाबुराव विष्णु पराड़कर कहते है। "आचार्य द्विवेदी के समय "सरस्वती" का कोई अंक निकाल देखिए, मालूम होगा कि प्रत्येक लेख कविता और नोट का स्थान पहले से ही निश्चित कर लिया था। बाद में वे उसी क्रम से मुद्रक के पास भेजे गये। एक भी लेख ऐसा ना मिलेगा जो बीच में डाल दिया गया-सा मालूम हो। संपादन की यह कला बहुत ही कठिन है और एक आध को ही सिद्ध होती है। द्विवेदी जी को सिद्ध हुई थी, इसी से "सरस्वती" का प्रत्येक अंक अपने रचयिता के व्यक्तित्व की घोषणा अपने अंग-प्रत्यंग के सामंजस्य से करता है। मैंने अन्य भाषाओं के मासिकों में यह विशेषता बहुत कम पाई है, और विशेषकर इसी के लिए मैं स्वर्गवासी पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी को संपादकाचार्य मानता हूँ।"4

द्विवेदी जी ने केवल संपादन या भाषा-व्याकरण संबंधी त्रुटियाँ में ही नहीं सुधार किया, बल्कि गद्य और पद्य की अनेक विधओं में भी कवियों और लेखकों का ध्यान आकृष्ट किया। द्विवेदी जी ने भाषा विषयक बातों पर अधिक ध्यान दिया गया। 1903 में जब द्विवेदी जी "सरस्वती" पत्रिका से जुड़े, उस समय भाषा के संदर्भ में मनमाना प्रयोग चल रहा था। भाषा की शुद्धता पर कोई ध्यान नहीं देता था। एकरूपता का अभाव था। आचार्य द्विवेदी ने भाषा संबंधी सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। द्विवेदी जी के सतत् प्रयास से हिंदी भाषा में अत्यधिक परिष्कार हुआ।

द्विवेदी जी के संदर्भ में श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा का यह कथन सर्वमान्य है- "पूर्वकाल में भाषा की जो साधारण शिथिलता थी अथवा व्याकरण संबंधी जो निर्बलता थी, उसका परिहार द्विवेदी जी के मत्थे पड़ा। अभी तक जो जैसा चाहता था, लिखता रहा। कोई उसकी आलोचना करने वाला न था। अतएव, इन लेखकों की दृष्टि भी अपनी त्रुटियाँ की ओर नहीं गई थी। द्विवेदी जी जैसे सतर्क लेखक इसकी अवहेलना न कर सके, अतएव इन्होंने उन लेखकों की रचना-शैली की आलोचना प्रारम्भ की, जो व्याकरणगत दोषों का विचार अपनी रचनाओं में नहीं करते थे।"5 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरल-सहज शब्दावली का प्रयोग करके क्लिष्ट एवं निर्जीव भाषा का परिष्कार किया। द्विवेदी जी का भाषा की शुद्धता के प्रति अत्यधिक लगाव था। भाषा के संदर्भ में वे किसी भी प्रकार की त्रुटियाँ सहन नहीं कर सकते थे। द्विवेदी जी ने भाषा-संबंधी समस्याओं का दूर करने के लिए अथक प्रयास किए, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली। श्री सुरेन्दनाथ सिंह ने उनके विषय में लिखा- "आधुनिक गद्य और पद्य की भाषा खड़ी बोली के परिमार्जन, संस्कार और परिष्कार का इतिहास पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी की सूक्ष्म दृष्टि, प्रखर पाण्डित्य और कर्मठता का इतिहास है।"6 जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, द्विवेदी जी भाषा के प्रति अत्यधिक सचेत थे। वे भाषा में किसी भी प्रकार की अशुद्धि को अनदेखा नहीं करते थे। द्विवेदी जी ने हिंदी के लेखकों और पाठकों को भाषा का सूक्ष्म ज्ञान करवाया। सन् 1905 से 1906 ई. में "भाषा और व्याकरण" से संबंधित लेख प्रकशित हुए। इसमें द्विवेदी ने भाषा में व्याकरण की महत्ता भी बताई। द्विवेदी जी कहते है "जिस भाषा में बड़े-बड़े इतिहास, काव्य, नाटक, दर्शन, विज्ञान और कला कौशल से संबंध रखने वाले महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे जाते हैं, उसका शृंखलाबद्ध होना बहुत ज़रूरी है। उसका व्याकरण बनाना चाहिए। लिखित भाषा ही में ग्रंथकार अपने कीर्तिकलाप को रखकर अपना नश्वर शरीर छोड़ जाते हैं। व्याकरण ही उस कीर्ति का प्रधान रक्षक है।"7

द्विवेदी जी ने 1903 से 1920 तक "सरस्वती" पत्रिका के संपादन से अपने युग का नेतृत्व किया। द्विवेदी जी ने भाषा व्याकरण संबंधी जो नियम लागू किए, उन्हें बड़ी कठोरता से निभाया भी। द्विवेदी जी के संपादन के दौरान अगर रचना को वापस लौटाया जाता तो साथ में एक निर्देश भी दिया जाता "संपादन के संबंध में किसी प्रकार की कोई शर्त स्वीकार नहीं करता" इस कथन से स्पष्ट होता है कि द्विवेदी ने अपने सिद्धांतों का बड़ी दृढ़ता से पालन किया। धीरे-धीरे "सरस्वती" पत्रिका में अनेक प्रकार के सुधार होते गए। "सरस्वती" पत्रिका के हर पृष्ठ पर मनोरंजक शैली में चित्र छपने लगे। इन चित्रों के माध्यम से संपादक अपनी अभिव्यक्ति देने लगे। चित्रों का यह सिलसिला अधिक समय तक नहीं चला। पाठकों ने इसे बंद करवाने का आग्रह किया। द्विवेदी जी ने इस विषय पर ज़्यादा सोच-विचार नहीं किया और चित्र शैली को रुकवा दिया। कुछ कवियों और लेखकों का मानना था कि "सरस्वती" पत्रिका में चित्रों के माध्यम से उसे अलग पहचान मिली थी। जिसे किसी कारणवश हटाना पड़ा। "सरस्वती" पत्रिका में भी अनेक पड़ाव आए। अनेक स्थितियों-पारस्थितियों से उसे गुज़रना पड़ा। द्विवेदी जी अपने दायित्व का निर्वाह करके "सरस्वती" पत्रिका को उच्च कोटि की पत्रिका तक ले आए।

समग्रतः कहा जा सकता है कि सरस्वती पत्रिका के संपादक के रूप में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को अपने युग के साहित्यकारों को प्ररेणा प्रोत्साहन तथा मार्ग-दर्शन प्रदान किया। यदि यूँ कहें कि उन्होंने अँगुली पकड़कर चलाया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिंदी साहित्य में कथ्य और शिल्प का मानक एवं आदर्श रूप प्रस्तुत किया। द्विवेदी जी सच्चे अर्थों में हिंदी के प्रथम संपादकाचार्य कहे जा सकते हैं और उनका कार्य हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में मील का पत्थर कहा जा सकता है।

संदर्भ:

1. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी- व्यक्तित्व एवं कृतित्व, पृ. 75
2. डॉ. हरिवंश राय बच्चन- पत्रकारिता के गौरवः बाँके बिहारी भटनागर, पृष्ठ- 107
3. आचार्य शिवपूजन सहाय - शिवपूजन-रचनावली-खण्ड-4 पृष्ठ-86
4. महावीर प्रसाद द्विवेदी- व्यक्तित्व-कृतित्व, पृ. 86
5. श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा- हिंदी की गद्यशैली का विकास, द्विवेदी-अभिनंद ग्रंथ, पृष्ठ 55
6. श्री सुरेन्द्रनाथ सिंह, "भाषा सुधरक आचार्य द्विवेदी", भाषा-द्विवेदी स्मृति अंक, पृष्ठ 105
7. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी- विवेचनात्मक ग्रंथ, पृष्ठ 194

डॉ. राजकुमारी शर्मा
असिस्टेंट प्रोपफेसर, हिंदी विभाग
श्री राम कॉलेज कॉमर्स, दिल्ली-7
मोबाईल 9953281181
Email: sharmanitu465@gmail.com


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